योगी आदित्यनाथ 37 साल बाद 84 के सिख दंगा पीड़ितों को इंसाफ़ दिलवा पाएंगे?- ग्राउंड रिपोर्ट

कानपुर का एक दृश्य
    • Author, अनंत झणाणे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फ़रवरी 2019 में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 1984 के सिख दंगों में कानपुर में हुई हत्याओं, लूटपाट और आगज़नी की घटनाओं की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया था.

एसआईटी की अध्यक्षता पुलिस के एक डीजी स्तर के अधिकारी को सौंपी गई और एक रिटायर्ड जज, एक रिटायर्ड अतिरिक्त ज़िला अभियोजन अधिकारी और एक एसएसपी स्तर के पुलिस अधिकारी को एसआईटी का सदस्य बनाया गया.

एसआईटी ने 40 जघन्य मामलों की जांच शुरू की जिसमें 127 लोग मारे गए थे. इन 40 मामलों में से जिसमें 11 में चार्ज़शीट लगाई गई थी उनमें एसआईटी ने चार मामले में हाई कोर्ट में अपील दाख़िल करने की सरकार से सिफ़ारिश की है.

बचे 29 मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी गई थी. 29 में से 20 मामलों में एसआईटी ने 96 अभियुक्तों को चिह्नित किया. एसआईटी टीम ने अपनी जांच में अब तक 40 लोगों को गिरफ़्तार किया है जिसमें से तीन गिरफ़्तारियां इसी महीने 12 अक्टूबर को हुई हैं.

वहीं गिरफ़्तार किए गए लोगों में से एक अभियुक्त धीरेंद्र तिवारी की तबीयत ख़राब होने से मौत हो गई. धीरेंद्र तिवारी की उम्र 70 साल थी.

बीबीसी ने कानपुर में जानने की कोशिश की कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पहले शासनकाल में शुरू हुई इस जांच के क्या मायने हैं और 37 साल से ज़्यादा अरसे बाद हो रही इन गिरफ़्तारियों के बारे में क्या कहना है पीड़ितों और अभियुक्तों के परिवारों का.

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अवतार सिंह
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मेरे चार भाइयों को मेरे सामने मार डाला- अवतार सिंह

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एसआईटी ने अवतार सिंह के परिवार वालों की हत्या के मामले में 70 वर्षीया कैलाश पाल को गिरफ़्तार किया है.

65 साल के अवतार सिंह 1984 में 27 साल थे, जब एक नवंबर को सबेरे आठ बजे दंगाइयों ने उनके मकान को घेर लिया.

वो ख़ौफ़नाक मंज़र उन्हें आज भी याद है. अवतार सिंह बताते हैं, "हम लोगों ने सब गेट बंद कर लिए, अपनी पूरी खिड़कियां बंद कर लीं. लेकिन जब कमरों में आग लग गई उसके बाद एक-एक करके सब खिड़की तोड़ कर निकलते चले गए. और जैसे-जैसे निकलते गए वैसे-वैसे उनको मारते चले गए."

अवतार के चार भाइयों को उनकी आँखों के सामने मार दिया गया और उनकी माता जी, पिता जी और बहन को मकान के ठीक सामने वाले घर में जला दिया गया. उनकी बहन की शादी 28 नवंबर को होने वाले थी, लेकिन एक नवम्बर को उसकी हत्या कर दी गई.

अवतार सिंह एक खंडहरनुमा मकान में चार से पींच घंटे तक छिपे रहे और शाम को सेना के जवान उन्हें बचा कर छावनी ले आए.

परिवार वालों की हत्या के मामले में अभियुक्त कैलाश पाल की गिरफ़्तारी के बारे में अवतार सिंह कहते हैं, "हमारे वाले मुक़दमे में तो सबसे ज़्यादा गिरफ़्तारियां हुई हैं. और जो ख़ास-ख़ास हैं सब वही पकड़े भी जा रहे हैं."

अवतार सिंह कहते हैं कि फ़िलहाल उन्होंने अपनी गवाही नहीं दी है, लेकिन जब उनका केस खुलेगा तब वो गवाही देंगे.

27 साल बाद भी अवतार सिंह के घाव भर नहीं पाए हैं. "जब तक ज़िंदा रहेंगे इस चीज़ को न भूलना है, न भूल सकते हैं."

अवतार सिंह
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अपने फ़ोन में अपने परिवार वालों की तस्वीरें दिखाते हुए अवतार सिंह कहते हैं, "कोई दिन ऐसा नहीं है जिस दिन वे उन्हें याद न करते हों, जिस दिन अपने माता- पिता को मत्था न टेकते हों."

अब वो एक छोटी-सी परचून की दुकान चलाते हैं. कहते हैं, "ये न हो तो आज हम ऐसे ही पागल हो जाते."

क्या इससे पहले दूसरी सरकारों के शासन में अवतार सिंह को इंसाफ़ की उम्मीद थी? वो कहते हैं, "एक बार भी उम्मीद नहीं हुई. क्लेम भी भाजपा सरकार में मिला."

हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार कौन है, इस सवाल पर अवतार सिंह कहते हैं, "अब ये तो कांग्रेस वाले ही हैं. उस टाइम तो कांग्रेस की ही सरकार थी. एनडी तिवारी उस टाइम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे."

लेकिन क्या इसमें अवतार सिंह को कोई राजनीति भी नज़र आती है? वो कहते हैं, "नहीं नहीं. इसको इंसाफ़ की नज़र से देखते हैं. बिल्कुल योगी जी सरदारों के लिए इतने मिलनसार हैं कि कुछ पूछिए नहीं."

अवतार सिंह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात की तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं, "हमको पूरा आश्वासन दिया उन्होंने (योगी आदित्यनाथ ने) कि आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए, पूरी कार्रवाई होगी."

'मेरे पति को कनपटी पर गोली लगी, पुलिस ने मदद नहीं की'- सुरिंदर कौर

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84 के सिख दंगों में कानपुर के रामबाग इलाके में रहने वाली 68 साल की सुरिंदर कौर के परिवार पर भी दंगाइयों की भीड़ ने हमला किया.

उस दिन को याद करते हुए वो कहती हैं, "मेरे पति को कनपटी पर गोली लगी थी और सिर के ऊपर डंडे मारे गए थे. मेरे जेठ को दंगाइयों ने पीठ और पेट पर चाकू मारा था. उनकी अंतड़ियां बाहर आ गई थीं.

दंगाई हमारे घर पर हमला कर रहे थे. पास में पुलिस खड़ी थी, लेकिन उसने कोई मदद नहीं की. मगर कोई जान पहचान का एक लड़का था जो पास में रहता था. वो जीप लेकर आया और उसने हम सबको निकाला."

इस हिंसा में सुरिंदर कौर ने अपने पति और उनके बड़े भाई दोनों को खोया था.

एसआईटी की जांच के बारे में सुरिंदर कौर कहती हैं, "कार्रवाई कर रहे हैं, अच्छी बात है. मगर देर से मिला न्याय और न्याय न मिलना एक बराबर है."

गिरफ़्तारियों के बारे में वो सवाल पूछती हैं, "जिन लोगों को आप पकड़ रहे हो, अच्छी बात है, लेकिन जो लोग 30-35 साल आज़ाद घूम लिए, अब उनकी वैसे ही उम्र बीत चुकी है. अब उनको पकड़ के आप जेल में डालोगे या कुछ करोगे तो क्या न्याय मिला है?"

सुरिंदर कौर यह भी कहती हैं कि सरकार को लोगों को जब पकड़ना था, जब कुछ करना था, तब तो किया कुछ नहीं.

कमलजीत कौर
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मुझे अपने पति की लाश तक नहीं मिली- कमलजीत कौर

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गुरदयाल सिंह की पत्नी कमलजीत कौर की शादी हुए एक साल से कम वक्त हुआ था जब दंगों की हिंसा में कमलजीत ने अपने पति को खोया.

कमलजीत कौर बताती हैं, "गुरदयाल गुरुद्वारे पाठ करने गए थे. ख़बर आई कि हमला हुआ है. हम वहां पर किसी को जानते नहीं थे और ना ही किसी को पहचानते थे."

कमलजीत कौर को पति की हत्या के बारे में आठ दिन बाद क़र्फ्यू खुलने के बाद पता चला और उन्हें पति का शव भी नहीं मिला.

एसआईटी की कार्रवाई के बारे में वो कहती हैं, "सभी लोग चाहते हैं कि जिन लोगों ने गुनाह किया है उनको सज़ा मिलनी चाहिए. लेकिन मैंने किसी को देखा नहीं है तो मैं किसको कह दूँ कि यह गुनहगार है."

इंसाफ़ के सवाल पर कमलजीत कौर कहती हैं, "इतने साल बाद कौन किसी को पहचान पाता है, कहां कौन रहता है, कोई नहीं जानता. तो कैसे उम्मीद लगाएं कि अब हमें इंसाफ़ मिलेगा."

कमलजीत कौर बताती हैं कि अब तक आठ लाख मुआवज़ा मिला है.

मनवीन सिंह
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लगता है कि रोज़ पिता की लाश से होकर गुज़रते हैं- मनवीन सिंह

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मनवीन सिंह कानपुर की ऑर्डिनेंस फ़ैक्ट्री में काम करते हैं. उनके पिता कुलवंत सिंह भी इस फ़ैक्ट्री में काम करते थे. ठीक इसी फ़ैक्ट्री के बाहर कुलवंत सिंह की दंगाइयों ने हत्या कर दी थी. उस वक्त मनवीन सिर्फ़ 14 साल के थे.

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के दो दिन बाद कुलवंत सिंह रोज़ की तरह फ़ैक्ट्री में काम करने पहुंचे. हालांकि सरकार की ओर से छुट्टी का आदेश आ चुका था. उस समय फ़ैक्ट्री में तीन से चार लोग ही थे.

मनवीन कहते हैं, "तभी आस-पास की फ़ैक्ट्री से आए लोगों ने हमला कर दिया और हमारे पिता जी और बाक़ी तीनों लोगों को ज़िंदा जला दिया."

37 साल पुरानी इस दर्दनाक घटना को याद करते हुए मनवीन कहते हैं, "ना ही हमें उनकी डेड बॉडी मिली, ना ही उनके साथ ऐसा किया कि उनको कोई ट्रीटमेंट मिल जाता तो वो बच भी सकते थे. हमें कुछ पता नहीं था कि कौन ले कर गया और किसने क्या कुछ किया."

बात करते-करते मनवीन की आँखें भर आती हैं. वो कहते हैं, "रोज़ आते समय वो याद आते हैं. लगता है कि रोज़ पिता की लाश से होकर गुज़रते हैं. उनको आंखें ढूंढती थीं, कहां पर वो पड़े थे. कम से कम बॉडी ही दे देते तो भी सुकून हो जाता."

मानवीन के मुताबिक़ उनके पिता कुलवंत सिंह की हत्या के मामले में उस समय फ़ैक्ट्री के एक कर्नल की तरफ़ से एफ़आईआर लिखवाई गई थी जिसकी कॉपी उनको काफ़ी समय बाद मिली.

वो कहते हैं, "आज हमारे पिता के क़ातिल ना मिले, लेकिन इस मामले के लोगों को जो पकड़ना शुरू किया गया है, गिरफ़्तारियां हो रही हैं, इसके लिए योगी जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं."

डीआईजी बालेंदु भूषण, सदस्य, एसआईटी कानपुर सिख दंगा जांच टीम
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कितना बड़ा है एसआईटी की जांच का दायरा?

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40 मामलों में चार केस एसआईटी ने अपील लायक पाए जिसमें उत्तर प्रदेश शासन से अनुमति प्राप्त होते ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील दाख़िल की जाएगी. इस पूरे मामले की जांच के पहलुओं पर पिछले दिनों बीबीसी की टीम ने कानपुर कोतवाली स्थित एसआईटी दफ़्तर में डीआईजी बालेंदु भूषण से मुलाकात की.

अपराधों की जघन्यता के बारे में डीआईजी बालेंदु भूषण कहते हैं, "इन 40 मामलों में कुल मिलाकर 127 लोगों की हत्या की गई थी, उनकी संपत्तियां लूटी गईं, और उनके घर को जलाया गया. इसमें से जो चार मुक़दमे अपील लायक छांटे गए हैं, उसमें एक ही परिवार के 13 लोगों की हत्या का केस भी शामिल है."

38 साल पुराने मामलों की कैसे की गई जांच?

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इन जघन्य हत्या के मामलों में एसआईटी को सबूत और दस्तावेज़ हासिल करने के लिए पीड़ितों से संपर्क करना पड़ा क्योंकि कानपुर पुलिस के पास कोई सबूत मौजूद नहीं थे.

बालेंदु भूषण कहते हैं, "29 फ़ाइनल रिपोर्ट वाले मामलों में जब एसआईटी ने जांच शुरू की तो कानपुर पुलिस ऑफ़िस से हमें कोई रिकॉर्ड नहीं मिल पाया. हमारे पास संबंधित पीड़ितों के पक्ष से संपर्क करने के अलावा और कोई चारा नहीं था."

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तो नहीं मिली, लेकिन बालेंदु भूषण कहते हैं, "एफ़आईआर क़रीब-क़रीब सब की मिल गई."

एसआईटी को कानपुर के सरकारी अस्पतालों के रिकॉर्ड से भी मदद मिली. बालेंदु भूषण कहते हैं, "हमने हैलट और उर्सला (अस्पताल) से 31 अक्टूबर 1984 से लेकर 15 नवंबर 1984 दंगे से संबंधित डॉक्टरी के रिकॉर्ड लिए."

गवाहों के बयानों से बंधी है इंसाफ़ की उम्मीद

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वैसे 37 साल पुराने हत्या के मामलों को साबित करना काफ़ी चुनौतीपूर्ण है.

डीआईजी बालेंदु भूषण कहते हैं, "हत्या साबित करने के लिए डायरेक्ट एविडेंस हैं. और वो मौखिक एविडेंस भी जो पुलिस 161 (पुलिस के सामने गवाहों के बयान) में लिखती है और लोगों ने 164 के बयान में भी बोला था."

बालेंदु भूषण बताते हैं कि अभी फ़िलहाल 11 मुक़दमे हैं जिनमें चार्ज़शीट होने जा रही है जिसमें 23 लोगों के 164 सीआरपीसी में कलम बंद बयान अदालत में कराए गए हैं.

11 मुकदमों की जांच में 96 अभियुक्त सामने आए हैं. इनमें 23 लोग मृत पाए गए जबकि 73 अभियुक्त ज़िंदा बचे हैं. 73 में से कुछ लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित भी हैं.

लेकिन बालेंदु भूषण कहते हैं कि एसआईटी की कोशिश है कि, "जो ज़रा भी ठीक-ठाक हैं, चलने लायक हैं, चाहे भले ही गंभीर बीमारी से पीड़ित हों, सबको गिरफ़्तार करना है."

एसआईटी का कार्यालय

एसआईटी डीआईजी का निष्पक्ष कार्रवाई का दावा

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एसआईटी कार्रवाई को निष्पक्ष बताते हुए डीआईजी बालेंदु भूषण कहते हैं, "एक भी आदमी अभी तक ये नहीं कह पाया है हमलोग ग़लत जा रहे हैं. लोग खुश हैं कि बिल्कुल सही कार्रवाई है."

जब अभियुक्तों के वकीलों की तरफ़ से दलील आएगी कि इन घटनाओं में इतना वक्त बीत चुका है तब एसआईटी उसका क्या जवाब देगी? बालेंदु भूषण कहते हैं, "इसमें टाइम बाउंड का कोई रोल नहीं है. सरकार ने इस समय जांच कराई है तो इस समय हम लोग कर रहे हैं. हमारे पास पर्याप्त सबूत हैं. हमारे पास इतने सबूत हैं कि कोई भी हमारी जांच को डिफ़ेम नहीं कर सकता है."

अगर इस जांच को लेकर राजनीति होगी तो एसआईटी क्या करेगी? बालेंदु भूषण कहते हैं, "ये सीधे-सीधे जघन्यतम अपराध है. सरकार ने बंद हुए हत्या के केस को खोलने का दायित्व दिया था वो हम लोगों ने बड़ी निष्ठा और ईमानदारी से पूरा किया है."

14 जुलाई को बीबीसी हिंदी से बालेंदु भूषण ने दावा किया था कि अगले डेढ़ महीने के अंदर सबको अवश्य गिरफ़्तार कर लेंगे. हालांकि 12 अक्टूबर तक एसआईटी ने 40 लोगों को गिरफ़्तार किया है.

वैसे जिन अभियुक्तों की तबीयत ख़राब है, उन्हें गिरफ़्तार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.

विश्व हिंदू परिषद

कौन हैं 'एसआईटी वाले सरदार जी'?

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इन मामलों को जांच तक पहुंचाने में कानपुर के सुरजीत ओबेरॉय की अहम भूमिका है. उनकी पहचान एसआईटी वाले सरदार जी के तौर पर बन चुकी है.

उनके घर के बाहर नेम प्लेट के अलावा "विभागाध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद, कानपुर महानगर" का बोर्ड भी लगा था.

एसआईटी वाले सरदार जी की पहचान के बारे में सुरजीत ओबेरॉय कहते हैं कि उन्होंने मामलों में गवाहों को तैयार करने में मदद की है.

12 साल की उम्र में सुरजीत ओबेरॉय ने ख़ुद दंगों की दहशत देखी थी. वो कहते हैं, "दंगाई मेरे घर पर आ गए थे और मुझे जलाना चाहते थे. उन्होंने घर का दरवाज़ा भी तोड़ दिया था. हमारे भाई थे जिन्होंने हमें बचाया."

बिखरे हुए मामलों और मुकदमों को समेटने में हुई मशक्कत के बारे में सुरजीत ओबेरॉय कहते हैं, "एक ही दिन की घटना होने के कारण कई एफ़आईआर एक ही में लिख ली गई थीं."

ऐसे में पीड़ित परिवारों को गवाही देने के लिए कैसे मनाया गया? सुरजीत ओबेरॉय कहते हैं, "पुलिस को सीधे देखकर आदमी घबरा जाता था. तो हम सिख कमेटी के मेंबरों को लेकर आगे जाते थे. उनको आश्वासन मिलता था. फिर वो हमें अपने मन की बात बताते थे. उसके बाद हम लोग भी धीरे-धीरे आगे बढ़े."

सुरजीत ओबेरॉय विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुए हैं. लेकिन अपनी मुलाकात में उन्होंने बीबीसी से कहा था कि उनका यह काम वीएचपी में शामिल होने के काफ़ी समय पहले से चला आ रहा है.

वो बताते हैं, "वीएचपी का दायित्व मुझे जुलाई महीने में ही मिला है. लेकिन उससे पहले से ही मैं दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का प्रबंधक था. जब सिरसा साहब थे, उन्होंने मुझे इस काम के लिए चुना था. इसमें पूरी तरह दिल्ली की सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी हमारी मदद करती है."

सुरजीत ओबरॉय योगी आदित्यनाथ के साथ
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सुरजीत ओबेरॉय बताते हैं कि जब वो मुआवज़े का चेक देने जाते थे तो मांएं उनसे कहती थीं, "मेरे बेटे को ज़िंदा जला दिया. मेरे पति को मेरी आंखों के सामने ज़िंदा जला दिया, मेरी बेटी खींच ले गए, तो आंसू आ जाते थे. मैंने कहा मैं कौम का क़र्ज़ चुकाऊंगा. और आज हम लोग यहां तक पहुंच गए हैं. मुझे संतुष्टि है कि अभियुक्त जेल जा रहे हैं."

सुरजीत ओबेरॉय कहते हैं कि इस मामले में ये पहली बार हो रहा है जब अभियुक्तों को जेल भेजा जा रहा है.

दंगों की जांच में क्या कांग्रेस पार्टी का भी कोई कनेक्शन निकल कर सामने आया है? इस बारे में सुरजीत ओबेरॉय कहते हैं, "जिस समय 1984 का सिख नरसंहार हुआ था उस समय ना भारतीय जनता पार्टी थी, सपा बसपा तो थी ही नहीं. इंदिरा गांधी का उस समय एक पूरा प्रोटोकॉल था. सरकार भी वही थीं पार्टी भी वही थीं. तो ज़्यादातर लोग उस समय कांग्रेस में ही थे."

सरदार अजीत सिंह छाबड़ा योगी आदित्यनाथ से सम्मान प्राप्त करते हुए
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क्या कहना है कानपुर के भाजपा नेताओं का?

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भाजपा के कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के अल्पसंख्यक मोर्चे के क्षेत्रीय अध्यक्ष सरदार अजीत सिंह छाबड़ा इस मामले में गिरफ़्तार किए गए अभियुक्त, 70 साल के कैलाश पाल के कांग्रेस से ताल्लुकात के बारे में कहते हैं, "कैलाश पाल कांग्रेस से जुड़े हुए थे. वे कांग्रेस के छुट-भैया नेता थे."

क्या वो इस कार्रवाई से ख़ुश हैं? छाबड़ा कहते हैं, "एसआईटी वालों ने वास्तव में मेहनत की. 37 साल बाद किसी को खोजना बड़ा मुश्किल का काम है. इसे इन्होंने साकार कर दिखाया और ऐसे-ऐसे अपराधी पकड़ कर जनता के सामने लाए, यह कोई नए अपराधी नहीं हैं. 37 साल से लोग चिल्ला रहे थे कि यही अपराधी हैं."

ललित पाल, दंगा अभियुक्त कैलाश पाल के बेटे
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क्या कहना है गिरफ़्तार किए गए दंगा अभियुक्तों के परिवार वालों का?

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सिख दंगों की जांच कर रही एसआईटी ने 70 साल के कैलाश पाल को हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया है. कैलाश पाल के बेटे ललित पाल पिता की गिरफ़्तारी पर कहते हैं, "पिताजी सरल स्वभाव के रहे हैं. सबसे जुड़े रहे हैं. तभी चार बार सभासद बने क्योंकि लोगों के बीच में रहे हैं. कोई यह नहीं कह सकता है कि वो इतने बड़े मामले में किसी भी तरह से शामिल हो सकते हैं."

ललित पाल कहते हैं, "जांच होनी चाहिए और सिखों के साथ जो ग़लत व्यवहार हुआ है, उसका सच सामने आना चाहिए."

ललित पाल के मुताबिक़ उनके पिता कैलाश पाल कुल चार बार सभासद रहे हैं जिसमें दो बार कांग्रेस से सभासद रहे. लेकिन फ़र्क समझाते हुए वो कहते हैं कि उनके पिता 1989 में पहली बार सभासद बने.

ललित पाल कहते हैं, "मेरे पिता के पॉलिटिकल करियर में ना किसी चौकी न थाने में एक भी रिपोर्ट दर्ज नहीं होगी. आप उनको इतने बड़े दंगे में सम्मिलित कर दे रहे हैं, इतने बड़े-बड़े मुकदमे दाख़िल कर दे रहे हैं, तो इसका मतलब है इसमें कुछ कमियां हैं."

क्या यह आरोप अदालत में साबित हो पाएंगे? इस बारे में ललित पाल कहते हैं, "यह न्यायालय की बात है. मैं अभी कैसे कह दूँ कि यह टिकेगा कि नहीं टिकेगा. मुझे न्यायालय पर विश्वास है कि वो सही को सही और ग़लत को ग़लत साबित करेगी."

ललित पाल बताते हैं कि ''70 साल के कैलाश पाल को 15 साल से डायबटीज़ की बीमारी है, हृदय रोग है और किडनी की समस्या भी है और उन्हें कोविड भी हो चुका है, उनका इम्यून सिस्टम कमज़ोर है.''

ललित पाल कहते हैं, "यह मामला 37 साल पुराना है. एक उम्र के तहत 60 के बाद तो मुझे लगता है कि अगर किसी को उम्र क़ैद होती है तो न्यायालय भी उसे छूट दे देता है. लोगों को चलने-फिरने में भी दिक़्क़त होने लगती है. मैं चाहता हूँ कि सबको न्याय मिले, लेकिन अगर कोई घटना हो जाती है तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा?"

सरदार कुलदीप सिंह
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कानपुर दंगों में इंसाफ़ और कांग्रेस

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कानपुर में कांग्रेस के पूर्व एमएलसी और 1984 के सिख दंगों के पीड़ितों को इंसाफ़ दिलाने के लिए पिछले 37 सालों से काम कर रहे सरदार कुलदीप सिंह से बीबीसी ने मुलाकात की.

कुलदीप सिंह अपने द्वारा छापी गई एक किताब में तस्वीरों और आर्टिकल्स में दिखाते हैं कि उन्होंने इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और सोनिया गांधी के साथ काम किया है. और साथ ही वो कहते हैं कि कांग्रेस से पहले वो अकाली दल में थे.

सरदार कुलदीप सिंह पूर्व की कांग्रेस की सरकारों के प्रयासों को लेकर कहते हैं, "अब तक जो कार्रवाई हुई है उसमें कमी रही है."

वो याद दिलाते हैं कि 1989 की मुलायम सिंह सरकार के शासनकाल में भी उन्होंने कई बार कानपुर ज़िला प्रशासन के दंगों के समय ज़िले के अधिकारियों के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की जांच की मांग की. जांच हुई, लेकिन अधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया गया.

योगी सरकार की इस पहल के बारे में कुलदीप सिंह कहते हैं, "इसके लिए हम इस सरकार के आभारी हैं. कुछ केसों को ये सामने लाए. मेरा सिर्फ़ एक निवेदन है कि इस केस को पार्टी पॉलिटिक्स की लाइन से ऊपर उठ कर मज़बूती से आगे बढ़ाया जाए. चुनाव के हिसाब से, एक पॉलिटिकल पार्टी को टारगेट ना किया जाए."

कुलदीप सिंह ये भी दावा करते हैं कि 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने मुआवज़े की रक़म को 10 गुना बढ़ाकर देने को कहा था जिसे मायावती सरकार के समय से अब तक दंगा पीड़ितों को नहीं दिया गया. वो कहते हैं कि अदालत ने भी इस मुआवज़े को बांटने का आदेश दिया है, लेकिन दंगा पीड़ितों को अब तक ये रक़म नहीं मिल पाई है.

अभी तक इंसाफ़ न मिलने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कुलदीप सिंह कहते हैं, "जो दंगों के दोषियों को सज़ा न दे पाईं और जो दंगे के पीड़ितों की मदद न कर पाईं, वो सभी सरकारें ज़िम्मेदार हैं."

मुकदमों में इंसाफ़ मिले या ना मिले, लेकिन कुलदीप सिंह एक बार फिर दोहराते हैं, "ये सरकार पीड़ितों को कम से कम मुआवज़ा तो दे दे. ये तो इनके हाथ में है."

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