चीन के भारत में राजदूत रहे सुन वेइदोंग ने जाते-जाते कही ये बात

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भारत में चीन के राजदूत रहे सुन वेइदोंग का तीन साल का कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा है. शनिवार को उन्होंने इसकी जानकारी देते हुए कहा था कि भारत में उनका ये समय 'अविस्मरणीय' रहा.
वेइदोंग का कार्यकाल ऐसे वक्त में खत्म हो रहा है, जब भारत और चीन के बीच सीमा पर सैन्य गतिरोध बरकरार है.
सुन वेइदोंग ने ट्वीट करते हुए कहा, ''चीन में भारत के राजदूत के तौर काम करना मेरी ज़िंदगी का कभी न भुलाया जाना समय रहा है. पिछले तीन साल से अधिक समय के यहां की यादों को मैंने संजो रखा है. आपके समर्थन और मिली-जुली कोशिश से दोनों देशों के बीच की दोस्ती सदाबहार बनी रहेगी.''
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वेइदोंग ऐसे वक्त भारत से विदा हो रहे हैं, जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल पर मुहर लग चुकी है.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस के प्रस्ताव में जिनपिंग ने देश की तमाम चुनौतियों का ज़िक्र करते हुए सेना को और मज़बूत करने का संकल्प दोहराया है.
लिहाज़ा इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के साथ इसके तनाव में और तेज़ी देखी जा सकती है.

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चीनी राजदूत के बयान के मायने

भारत में चीनी राजदूत सुन वेइदोंग ने जुलाई 2010 में कामकाज संभाला था. लेकिन 11 महीने बाद गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच संघर्ष में दोनों ओर से कई सैनिकों की मौत हो गई थी. हालांकि चीन अपने सैनिकों की मौत के बात नहीं स्वीकारी थी.
इसके बाद से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है. हालांकि सुन ने पिछले दिनों कहा था कि भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालात अब सामान्य होने की ओर बढ़ रहे हैं.
उनका ये बयान वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूद पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 पर दोनों ओर से सैनिक हटाने की रज़ामंदी के बाद आया था.
सुन वेइदोंग ने कहा था कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूदा हालात का हल बातचीत और विचार-विमर्श के ज़रिये निकालना चाहता है. लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई थी कि भारत भी चीन के 'प्रमुख हितों' पर ध्यान देगा. इनमें ताइवान और तिब्बत के मामले शामिल है.
भारत में वेइदोंग का समय काफी व्यस्त रहा क्योंकि उनका कार्यकाल चीन और भारत के बीच रिश्तों में भारी तनातनी के बीच गुजरा.
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'वन चाइना पॉलिसी'

'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीनी राजदूत ने भारत से 'वन चाइना' पॉलिसी को समर्थन देने की अपील की थी. लेकिन 2010 से भारत ने इस मामले में चीन का समर्थन नहीं किया है.
माना जाता है कि लद्दाख और अरुणाचल पर अपने दावे के समर्थन में भारत ने चीन की 'वन चाइना पॉलिसी' का समर्थन नहीं किया है.
चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र मानता है. इसे वह दक्षिण तिब्बत कहता है. जबकि भारत का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश उसका अविभाज्य हिस्सा है. सुन वेइदोंग ने भारत और चीन के लोगों के बीच ज़्यादा से ज़्यादा संपर्क का समर्थन किया है.
पिछले दिनों एक वर्चुअल संबोधन में उन्होंने कहा था कि चीनी दूतावास ने भारतीय कारोबारियों और छात्रों को दोबारा वीज़ा देना शुरू कर दिया है.

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'बड़ी रोटी और बड़ी थाली'

सुन वेइदोंग ने भारत और चीन के लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा संपर्क का समर्थन किया है. पिछले दिनों एक वर्चुअल संबोधन में उन्होंने कहा था कि चीनी दूतावास ने भारतीय कारोबारियों और छात्रों को दोबारा वीज़ा देना शुरू कर दिया है.
उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को और बढ़ाने पर ज़ोर दिया था.
उन्होंने कहा था, ''हमारा मानना है कि जब रोटी का आकार बड़ा होगा तभी ज्यादा लोगों के बीच बांटा जा सकेगा. जब थाली बड़ी होगी तभी इसमें ज्यादा चावल आएगा. हम लोगों को बड़ी रोटी और बड़ी थाली बनाने के लिए आपस में हाथ मिलाना होगा ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ मिले. हमें रोटी छोटी करने और थाली तोड़ने से बचना चाहिए. ''

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क्या भारत-चीन तनाव कम होगा?

लेकिन चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के कांग्रेस में जिस तरह से गलवान संघर्ष में शामिल रहे एक सैन्य अधिकारियों को जिस तरह से खासतौर पर बुलाया गया था, उससे ऐसा नहीं लग रहा है कि अगले कुछ दिनों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के साथ चल रहे उसके सैन्य गतिरोध में नरमी आएगी.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस ऐसे वक्त हो रही है जब चीन के लिए भी अंतरराष्ट्रीय माहौल चुनौतीपूर्ण है. शी के बयानों से ऐसा लगता है कि चीन ने खुद को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताकत मानना शुरू कर दिया है और अब उसकी नज़र अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया का नंबर एक देश बनने पर है.
शी ने तीसरा कार्यकाल हासिल कर लिया है. मतलब यह कि वह 2032 तक सत्ता में बने रहेंगे.
शी के भाषणों से ऐसा लगता है कि उनका रवैया पड़ोसी देशों के खिलाफ और ज्यादा सख्त हो सकता है.
पिछले सप्ताह उन्होंने अपने बयान में कहा था, ''अंतरराष्ट्रीय हालात में भारी बदलावों, खासकर चीन को ब्लैकमेल करने, रोकने, नाकेबंदी करने और अधिकतम दबाव डालने की बाहरी कोशिशों के मद्देनज़र हमने अपने राष्ट्रीय हितों को पहले रखा है.''
उन्होंने कहा, ''आंतरिक राजनीतिक चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया है, और दृढ़ रणनीतिक संकल्प बनाए रखा है.''

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ

हॉन्गकॉन्ग बैप्टिस्ट यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर जीन-पियरे कैबेस्टन कहते हैं, ''शी के विचार प्राथमिक रूप से शी की अपनी विरासत को मज़बूत करने के लक्ष्य से रखे गए, साथ ही सीसीपी और देश में किसी और से अधिक ताक़त अपने पास रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया है. यह क़दम न सिर्फ उन्हें चेयरमैन माओ के समक्ष लाकर खड़ा करता है बल्कि चीन के कई सफल शासकों के बराबर भी लाता है.''
कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर एंड्रूयू नेथन ने बीबीसी से कहा, शी जिनपिंग का मानना है, ''उनकी विचारधारा सही है और सबको इसे स्वीकार करना चाहिए. जब भी माओ ने कोई नीति निर्धारित की हर किसी ने उसका पालन किया. यही शी जिनपिंग के बारे में भी सच है."
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