शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी कौन हैं?

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद पर उनको समाधि देने से पहले ही सोमवार को उत्तराधिकारियों का चयन कर लिया गया.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ का प्रमुख बनाया गया है. इनके नामों की घोषणा शंकराचार्य के पार्थिव शरीर के सामने ही की गई.
स्वरूपानंद सरस्वती ने 99 साल की उम्र में रविवार को मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर के झोतेश्वर स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में लंबी बीमारी के बाद आख़िरी सांस ली.
इनका जन्म 2 सितंबर 1924 को हुआ था. उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में उनके भक्त पहुंचे. उनकी पार्थिव देह को सोमवार को शाम पांच बजे समाधि दी गई.
स्वामी स्वरूपानंद ने नौ साल की उम्र में ही अपना घर छोड़ दिया था. स्वरूपानंद भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी शामिल रहे. इन्हें 1981 में शंकराचार्य की उपाधि दी गई. उन्होंने राम मंदिर को लेकर भी लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी.
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को अंतिम विदाई देने के लिये मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ ही राज्य सरकार के कई मंत्री मौजूद थे.
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से उनका क़रीबी रिश्ता रहा. दिग्विजय सिंह ने कहा कि शंकराचार्य का निधन उनके लिये व्यक्तिगत क्षति है.

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ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के प्रमुख होंगे- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
द्वारका शारदा पीठ के प्रमुख होंगे- स्वामी सदानंद सरस्वती
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ.
उनका असली नाम उमाशंकर है. ब्रह्मचर्य दीक्षा ग्रहण करने के बाद नाम पड़ा, ब्रह्मचारी आनंद स्वरूप.
फिर स्वामी स्वरूपानंद से दंडी दीक्षा प्राप्त की और दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम से जाने जाने लगे
स्वामी सदानंद का ताल्लुक मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर से है.
उनका माता-पिता का दिया नाम रमेश अवस्थी है. ब्रह्मचर्य की दीक्षा ग्रहण करने के बाद उन्हें ब्रह्मचारी सदानंद कहा जाने लगा.


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सनातन परंपरा बढ़ाने की चुनौती
आश्रम के लोगों का कहना है कि स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने उत्तराधिकारियों का चयन पहले ही कर लिया था जैसीकि संतों की परंपरा रही है. लेकिन उसकी घोषणा बाद में संत अखाड़ा और पीठों के शंकराचार्य मिल बैठकर चर्चा के बाद की जाती हैं.
श्री ब्रह्म शक्ति गायत्री सिध्द पीठ, उज्जैन के पीठाधीश्वर आचार्य बुध्दिप्रकाश शास्त्री ने बताया, "नये शंकराचार्य सनातन धर्म की परंपरा को गौरवशाली तरीक़े से आगे बढ़ायेंगे."
उन्होंने विश्वास प्रकट किया कि आने वाले समय में सनातन धर्म के प्रति धर्म प्रेमी नागरिकों में धार्मिक गतिविधियों का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा.
अविमुक्तेश्वरानंद काफ़ी समय तक वाराणसी में रहे. वह श्री विद्या मठ के साथ ही ज्योतिर्मठ बद्रिकाश्रम की ज़िम्मेदारी पहले से ही संभालते आ रहे हैं.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादित मुद्दों पर बोलने के लिए भी जाने जाते है. उन्हें साईं बाबा के ख़िलाफ़ बताया जाता है. उन्हें हिंदूओं के मंदिर में साईं की मूर्ति रखना नापसंद है.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस साल छिंदवाड़ा के एक मंदिर में गए तो वो साईं की मूर्ति देखकर नाराज़ हो गये थे. उन्होंने अपने शिष्यों से भी पूछा कि आख़िर राम-कृष्ण के मंदिर में साईं का क्या काम है. उन्होंने यह भी कहा कि वो आगे से उस मंदिर में नहीं जाएंगे.

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साईं बाबा को लेकर नाराज़गी
यह मंदिर शहर के बाज़ार में स्थित है और श्री राम मंदिर और बड़ी माता मंदिर के नाम से जाना जाता है. इस मंदिर के प्रांगण में साईं बाबा की टाइल्स को देखकर उन्हें गुस्सा आ गया था. उन्होंने पूछा भी था कि 'राम मंदिर में कौन बड़ा होता है.' इसी तरह की नाराज़गी उन्होंने माता मंदिर में भी व्यक्त की थी जहां पर साईं की मूर्ति लगी थी.
उन्होंने जाते-जाते यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि छिंदवाड़ा के हिंदुओं का ख़ून विकृत हो गया है. उन्होंने सवाल किया कि आख़िर हिंदुओं के मंदिर में साईं का क्या काम. उन्होंने यह भी कहा कि वो वहां के मंदिरों को देखकर दुखी होकर जा रहे हैं.
इसके बाद इसी साल जून में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती काशी में ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी मामले में पूजा-अर्चना की मांग को लेकर अनशन पर बैठ गए थे.
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ज़िला प्रशासन से कथित शिवलिंग पर पूजा-अर्चना करने की मांग की थी. जब उन्हें इसके लिए रोका गया तो वो नाराज़ होकर अनशन पर बैठ गए. उन्होंने यह अनशन 108 घंटे बाद स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती के कहने पर समाप्त किया.
उन्होंने इस पूरे मामले के लिए जन जागरण अभियान चलाने की बात भी कही थी. इसके अलावा आगरा के ताज महल को लेकर भी अविमुक्तेश्वरानंद सक्रिय रहे हैं. उन्होंने कहा था कि 'ताज महल के सारे कपाट बंद करके क्यों सब चीज़ें छुपाई जा रही है. वहां पर कैमरा ले जाना चाहिए और पूरे देश को दिखाना चाहिए कि वहां क्या है.'
उस समय उन्होंने कहा था, "देश में घृणा का वातावरण दोनों तरफ़ से फैल रहा है. इसके लिए दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं. काशी में एक बिल्डिंग के अंदर आधा मंदिर व आधी मस्जिद क्यों दिखाई देती है. इसमें मुसलमानों को दिखता क्यों नहीं है कि वहां पर प्राचीन मंदिर है."

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द्वारका शारदा पीठ की ज़िम्मेदारी
वहीं स्वामी सदानंद सरस्वती को स्वरूपानंद सरस्वती ने द्वारका शारदा पीठ की ज़िम्मेदारी पहले ही सौंपी थी. स्वामी सुबुधानंद सरस्वती स्वरूपानंद के सबसे क़रीबी रहे और अपना अधिकांश समय उनके साथ ही गुज़ारा. उनका सारा काम भी वही देखते रहे हैं.
स्वामी सदानंद सरस्वती नरसिंहपुर मध्य प्रदेश से ही ताल्लुक़ रखते हैं. 18 साल की उम्र में ही वो शंकराचार्य के साथ हो गए थे.
जब उन्होंने ब्रह्मचर्य की दीक्षा ग्रहण की तो वो ब्रह्मचारी सदानंद के नाम से जाने जाने लगे. अभी तक वो गुजरात के द्वारका शारदा पीठ में शंकराचार्य के प्रतिनिधि के तौर पर वहां का सारा काम देखते रहे हैं.
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