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अशोक गहलोतः गांधी परिवार के भरोसेमंद सिपाही क्या मानेंगे 'दिल्ली आने का आदेश'
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'मुझे हाई कमान जो कहता है मैं वो करता हूं. मेरी पार्टी ने जब भी जो भी हुक्म दिया है मैंने एक अनुशासित सिपाही की तरह पूरा किया है.'
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या वो कांग्रेस के अध्यक्ष का पद स्वीकार करेंगे तो उन्होंने यही जवाब दिया.
अशोक गहलोत ने मंगलवार को दिल्ली में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात के बाद मीडिया रिपोर्टों में ये कहा गया कि सोनिया गांधी ने उनसे कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार करने के लिए कहा है.
राजस्थान में पार्टी की आंतरिक राजनीति झेल रहे अशोक गहलोत के लिए ना सोनिया गांधी के आदेश पर इनकार करना आसान है और ना ही राजस्थान का मुख्यमंत्री पद छोड़ना.
राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद छोड़ दिया था. तब से ही कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली है और सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं.
कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए होने वाले पार्टी के आंतरिक चुनाव कई बार आगे बढ़ चुके हैं. पार्टी ने 21 सितंबर की तारीख़ अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए निर्धारित की थी जिसे एक बार फिर बढ़ा दिया गया है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अब अक्तूबर में दिवाली से पहले नया अध्यक्ष चुनने के लिए चुनाव हो सकते हैं.
कांग्रेस पार्टी के एक भरोसेमंद सूत्र के मुताबिक 'गांधी परिवार चाहता है कि अशोक गहलोत अध्यक्ष पद संभालें. ये संदेश उन्हें दे भी दिया गया है.'
गहलोत के लिए आसान विकल्प नहीं
राजस्थान कांग्रेस इस समय गुटबाज़ी का शिकार है और सचिन पायलट ने बार-बार अशोक गहलोत के नेतृत्व को चुनौती दी है.
राजस्थान की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का मानना है कि अशोक गहलोत के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़कर कांग्रेस का अध्यक्ष बनने का फ़ैसला करना आसान नहीं होगा.
त्रिभुवन कहते हैं, "कांग्रेस की राष्ट्रीय परिस्थिति को देखते हुए भले ही ये माना जा रहा हो कि वो अध्यक्ष पद के लिए एक बेहतर विकल्प हैं लेकिन यहां राजस्थान की राजनीति को नज़दीक से देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अशोक गहलोत को ये घाटे का प्रस्ताव लगेगा. ऐसा लगता है कि अशोक गहलोत ख़ुश होकर और मन से इस पद को स्वीकार करना नहीं चाहेंगे."
तकनीकी रूप से भले ही अशोक गहलोत का मुख्यमंत्री पद से पार्टी के अध्यक्ष पद पर पहुंचना राजनीति में आगे बढ़ना हो लेकिन इसे अशोक गहलोत की राजनीतिक शिकस्त के रूप में भी पेश किया जा सकता है.
त्रिभुवन कहते हैं, "भले ही कांग्रेस अध्यक्ष का पद राज्य के मुख्यमंत्री पद से शक्तिशाली हो लेकिन अशोक गहलोत के सामने जो परिस्थितियां हैं वो विकट हैं. राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में कड़वाहट घुली है. भले ही कांग्रेस अध्यक्ष पद कितना ही बड़ा क्यों ना हो लेकिन राजस्थान कांग्रेस में उनका विरोधी खेमा और मीडिया इसे उनके पराभव के रूप में पेश करेगा."
अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस दो संकटों का समाधान कर सकती है. एक तो लगभग तीन साल से खाली पार्टी अध्यक्ष पद पर नेहरू-गांधी परिवार के बाहर का कोई व्यक्ति बैठेगा और ऐसा करके कांग्रेस परिवारवाद के आरोपों का जवाब दे देगी और दूसरा राजस्थान में गहलोत और सचिन पायलट गुट के बीच चल रही अंदरूनी राजनीति का समाधान हो जाएगा. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि ये इतना आसान नहीं है जितना नज़र आ रहा है.
त्रिभुवन कहते हैं, "ये आसान विकल्प लगता है कि गहलोत को अध्यक्ष बनाकर दिल्ली भेज दिया जाए और राज्य की कमान सचिन पायलट को दे दी जाए. लेकिन राजनीति इतनी सीधी और आसान नहीं होती. अशोक गहलोत के लिए अपने विरोधी को मुख्यमंत्री का पद देकर दिल्ली जाना आसान नहीं होगा."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अर्चना शर्मा कहती हैं, "ये भी माना जा रहा है कि हाईकमान कांग्रेस के दोनों धड़ों को ख़त्म करने के लिए ही ये क़दम उठा रही है. ये भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि अगर गहलोत दिल्ली में अध्यक्ष बनते हैं तो पायलट को एक साल के लिए मुख्यमंत्री बनाकर गुटबाज़ी ख़त्म की जा सकेगी और दोनों धड़े मिलकर अगला विधानसभा चुनाव लड़ सकेंगे."
अर्चना कहती हैं, "राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता बदलती है. ऐसे में एक साल बाद जब चुनाव होंगे तो बीजेपी अधिक मज़बूत स्थिति में होगी. लेकिन अगर कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाज़ी ख़त्म हो जाती है तो पार्टी मज़बूत चुनौती ज़रूर पेश कर पाएगी."
पायलट खेमे में उत्साह
दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में जब कांग्रेस 99 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब कांग्रेस की तरफ़ से सचिन पायलट और अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री पद के लिए दावा ठोक दिया था.
कई दिन चली राजनीतिक रस्साक़शी के बाद अशोक गहलोत विजेता बनकर उभरे थो और सचिन पायलट को 'भविष्य में अच्छा होगा' के वादे के साथ संतोष करना पड़ा था. अब जब गहलोत दिल्ली की राह पर हैं तब सचिन पायलट खेमे में ज़बरदस्त उत्साह हैं.
अर्चना शर्मा कहती हैं, "पायलट कैंप में इस ख़बर के बाद से उत्साह है. कल पायलट कैंप के लोग ट्वीट कर रहे थे- राजस्थान मांगे पायलट. गहलोत के कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह के बेटे अनिरुद्ध सिंह ने पायलट के समर्थन में एक ताज की तस्वीर पोस्ट की थी. वो पायलट के इतने पक्के समर्थक हैं कि अपने पिता के ही ख़िलाफ़ हो गए हैं."
"राहुल गांधी ने जब से पायलट के सब्र की तारीफ़ की थी तब से ही कयास लगाए जाने लगे थे कि राजस्थान में कुछ ना कुछ होगा और अब गहलोत को लेकर ख़बर आने के बाद से पायलट समर्थक ज़बरदस्त उत्साह में है और ये माना जाने लगा है कि शायद पायलट को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया जाए."
क्या सचिन पायलट को स्वीकार कर पाएंगे गहलोत?
अशोक गहलोत को कांग्रेस के ओल्ड गार्ड (पुराने नेताओं) का अंतिम प्रतिनिधि कहा जा सकता है. उनके और नई पीढ़ी की ऊर्जावान नेता सचिन पायलट के बीच कड़वाहट किसी से छुपी नहीं है. विश्लेषक मानते हैं कि गहलोत के लिए सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद पर देखना आसान नहीं होगा.
त्रिभुवन कहते हैं, "अशोक गहलोत खेमे और सचिन पायलट खेमे के बीच रिश्ते बहुत कड़वे हो चुके हैं. अशोक गहलोत का विरोधी खेमा उन्हें दिल्ली भेजना चाहता है. ऐसा लग रहा है कि गहलोत दिल्ली जाना नहीं चाह रहे हैं और अगर जाना पड़ा भी तो वो अपने खेमे के हाथ में कमान सौंपकर जाना चाहते हैं."
त्रिभुवन कहते हैं, "सचिन पायलट और अशोक गहलोत ख़ेमों के बीच संतुलन साधकर पार्टी हाइकमान राजस्थान में बेहतर कर सकती है. राजस्थान में अब कॉंग्रेस के लिए पीढी का बदलाव समय की मांग है; क्योंकि भाजपा में यह बहुत सहजता से हो चुका है; लेकिन यह लोकतांत्रिक तरीके से हो तो इसमें गुटबाज़ी को कम किया जा सकता है. बेहतर विकल्प ये है कि ओल्ड गार्ड न्यू गार्ड को खुद दिल बड़ा करके ग्रूम करें और पार्टी को संजीवनी दें."
पार्टी और गांधी परिवार के भरोसेमंद
राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ काम कर चुके हैं. वो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अब राहुल गांधी के क़रीबी हैं.
कांग्रेस के तीन प्रधानमंत्रियों- इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकारों में मंत्री रह चुके अशोक गहलोत ने तीन बार राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी संभाला है.
पार्टी और गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा असंदिग्ध हैं. कांग्रेस के संकट के समय में वो कई बार रणनीतिकार और संकटमोचक बनकर उभरे हैं. अशोक गहलोत ने बार-बार पार्टी और गांधी परिवार के प्रित अपनी वफ़ादारी साबित की है.
त्रिभुवन कहते हैं, "अशोक गहलोत ने अभी तक की अपनी राजनीतिक यात्रा में बार-बार ये दर्शाया है कि वो अपने हितों के ऊपर पार्टी के हित रखते हैं. चाहें फिर वो इंदिरा गांधी का दौर रहा हो, राजीव गांधी का दौर रहा है या अब सोनिया गांधी का दौर हो. वो पार्टी और संगठन के प्रति हमेशा वफ़ादार रहे हैं. उन्होंने कभी भी ऐसा कुछ नही किया जिसे पार्टी गतिविधि के रूप में देखा जा सके."
त्रिभुवन कहते हैं, "राजस्थान कांग्रेस के कई नेताओं ने कई बार पार्टी की लाइन तोड़ी, अपनी जाति का साथ दिया और विपक्ष के साथ हाथ मिलाया. लेकिन अशोक गहलोत हमेशा निष्ठावान बने रहे."
कांग्रेस के संकटमोचक
गहलोत की छवि एक कुशल रणनीतिकार की हो. चाहें क्राइसिस मैनेजमेंट हो या चुनाव प्रबंधन, कांग्रेस हाईकमान ने हमेशा उन पर भरोसा किया है.
अगस्त 2017 का गुजरात में अहमद पटेल का राज्यसभा चुनाव हो या फिर कांग्रेस को जब भी विधायकों को सुरक्षित रखने की ज़रूरत हुई, भरोसा अशोक गहलोत पर ही किया गया.
पार्टी को जब महाराष्ट्र के विधायकों को एकजुट रखना था तब उन्हें पंजाब या छत्तीसगढ़ ना ले जाकर राजस्थान में गहलोत की निगरानी में लाया गया.
विश्लेषक मानते हैं कि अशोक गहलोत ने अपनी राजनीति के साथ-साथ कांग्रेस के हितों को हमेशा आगे रखा.
वरिष्ठ पत्रकार अर्चना शर्मा कहती हैं, "अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ बड़ा राजनीतिक विद्रोह हुआ, कुछ मंत्री तितर-बितर भी हुए, लेकिन फिर भी उन्होंने परिस्थिति को साध लिया और अपनी सरकार को बचाए रखा. ये एक बहुत बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने अपने रणनीतिक कौशल से संभाल लिया. गहलोत ने बार-बार ये साबित किया है कि वो ज़मीन से जुड़े राजनेता और सफल रणनीतिकार हैं."
अशोक गहलोत की एक सबसे बड़ी ख़ूबी ये भी है कि वो गांधी परिवार के हमेशा क़रीब रहे. कांग्रेस में बाग़ी नेताओं के एक गुट ने गांधी परिवार को चुनौती देने की कोशिश की. 23 नेताओं के इस गुट को जी-23 कहा गया. इसमें ग़ुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी और शशि थरूर जैसे नेता शामिल हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि गांधी परिवार को अध्यक्ष पद के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो ना सिर्फ़ पार्टी को नई दिशा दे बल्कि गांधी परिवार का भरोसा भी बनाए रखे.
अर्चना शर्मा कहती हैं, "अशोक गहलोत ने ना सिर्फ़ इंदिरा, राजीव और सोनिया के साथ काम किया है बल्कि वो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की स्वभाव को भी भलीभांति समझते हैं. वो अभी कांग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने दिल और आत्मा दोनों से कांग्रेस को जिया है. ऐसे में इसमें कोई शक नहीं है कि वो अध्यक्ष पद को अच्छे से संभाल लेंगे."
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