अशोक गहलोत: जादूगर पिता का बेटा बनेगा राजस्थान का मुख्यमंत्री

    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

अब ये साफ़ हो चुका है कि राजस्थान में कांग्रेस का मुख्यमंत्री कौन होगा. जोधपुर की सरदारपुरा सीट का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे.

शुक्रवार दोपहर तक इस पर संशय कायम था कि 99 सीट जीतकर राजस्थान में सबसे बड़ा दल बनकर उभरी कांग्रेस पार्टी का सदन में नेतृत्व कौन करेगा.

गुरुवार तक सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच खींचतान चलती रही. दोनों ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाक़ात की लेकिन यह तय नहीं हो पा रहा था कि कौन मुख्यमंत्री होगा.

आख़िरकार शुक्रवार को चार बजे हुई कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस से साफ़ हो गया कि राज्य की कमान अशोक गहलोत के हाथ में होगी और राज्य के पार्टी अध्यक्ष सचिन पायलट उनके डिप्टी होंगे.

प्रेस कॉन्फ़्रेंस में गहलोत ने यह भी कहा कि वो चुनावी वादों को पूरा करेंगे. उन्होंने किसानों के मुद्दों को लेकर जो वायदे किए हैं वे प्राथमिकता में रहेंगे.

कौन हैं गहलोत?

वह कोई प्रखर वक्ता नहीं हैं. न उनकी भाषा में कोई अलंकार होता है लेकिन जब वह बोलते हैं, शब्द निशाने पर पहुंचते हैं.

राजस्थान की सियासत के एक मज़बूत किरदार अशोक गहलोत ने जब कुछ माह पहले उदयपुर में कहा, 'ख़ल्क [जनता] की आवाज़ ही ख़ुदा की आवाज़ होती है.' राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई.

गहलोत ने ये तब कहा जब राज्य में उनके प्रतिस्पर्धी और विरोधी उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर करने का प्रयास कर रहे थे.

राज्य की राजनीति में गहलोत को उन लोगों में शुमार किया जाता है जो समाज सेवा के ज़रिए राजनीति में दाख़िल हुए और फिर ऊँचाई तक पहुंचे. यह 1971 की बात है जब जोधपुर का एक नौजवान बांग्लादेशी शरणार्थियों के शिविर में काम करते दिखा. पर ये गहलोत के लिए पहला मौक़ा नहीं था कि वह सामजिक कार्यों से जुड़े. इसके पहले गहलोत 1968 से 1972 के बीच गाँधी सेवा प्रतिष्ठान के साथ सेवा ग्राम में काम कर चुके थे.

पिता थे जादूगर

3 मई 1951 में जोधपुर में जन्मे गहलोत के पिता लक्ष्मण सिंह जादूगर थे.

गहलोत ख़ुद भी जादू जानते हैं. हाल में जब उनसे पूछा गया कि क्या वह इस बार भी जादू दिखाएंगे?

गहलोत ने कहा, "जादू तो चलता रहता है, कुछ को दिखता है कुछ को नहीं भी दिखता है."

जानकार कहते हैं कि सेवा कार्य के भाव ने गहलोत की पहुंच इंदिरा गाँधी तक कराई .जानकारों के मुताबिक़, एक मर्तबा उन्हें जम्मू-कश्मीर के चुनावों में एक क्षेत्र का प्रभारी बनाकर भेजा गया. इसके साथ कुछ धनराशि भी दी गई थी.

चुनाव के बाद गहलोत ने पाई-पाई का हिसाब दिया और बचे हुए पैसे पार्टी में वापस जमा करा दिए. गहलोत ने जीवन का पहला चुनाव जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष का लड़ा.

यह 1973 की बात है. इस चुनाव में गहलोत पराजित हो गए. वो कांग्रेस के नए बने राष्ट्रीय छात्र संगठन से जुड़े थे. उस वक़्त गहलोत अर्थशास्त्र में एम.ए. के विद्यार्थी थे.

उनके सहपाठी राम सिंह आर्य कहते हैं, "इसके बाद सभी विद्यार्थियों ने उन्हें अर्थशास्त्र विभाग में एक इकाई का अध्यक्ष चुन लिया."

हारे थे पहला विधानसभा चुनाव

गहलोत ने 1977 में जब पहली बार कांग्रेस के टिकट पर जोधपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ा तो साढ़े चार हज़ार वोटों से हार गए.

राम सिंह आर्य कहते हैं, "वो इस हार से निराश नहीं हुए बल्कि अगले ही दिन उन्हें इलाक़े में घूम-घूमकर मतदाताओं का आभार व्यक्त करते देखा गया."

गहलोत ने अर्थशास्त्र में एम.ए. के बाद क़ानून की पढ़ाई की और फिर राजनीति में बढ़ते चले गए. हमेशा खादी के परिधान में दिखने वाले गहलोत गाँधी के विचारों में यक़ीन करते हैं और जब भी किसी ओहदे पर पहुंचे, ख़ुद को जनता का ट्रस्टी बताया.

पार्टी ने उन्हें जब 1974 में पार्टी के छात्र संगठन की राजस्थान इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया तो वह अपनी लाल रंग की येज़डी मोटर बाइक पर संगठन का काम करने निकल पड़े. उस दौर में कांग्रेस के विद्यार्थी यूथ कांग्रेस के नाम पर चुनाव लड़ते थे. गहलोत ने संगठन का काम आगे बढ़ाया और अपने सदस्यों के लिए एक अचार संहिता बनाकर बांटी.

गहलोत पहली बार 1980 में जोधपुर से सांसद चुने गए. गहलोत ने पांच बार संसद में जोधपुर का प्रतिनिधित्व किया है. 1982 में पहली बार इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में उन्हें उप-मंत्री बनाया गया.

जब वह शपथ लेने गए तो एक तिपहिया में बैठकर गए थे. 1991 में जब उन्हें कपड़ा मंत्री बनाया गया तो गहलोत ने कुछ सराहनीय काम किए जिनकी तारीफ़ की जाती है. वो प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के मातहत मंत्री थे. लेकिन राव ने उन्हें पद से हटा दिया था.

जानकार इससे जुड़ा क़िस्सा बताते है. उन दिनों कथित तांत्रिक चंद्रास्वामी को राव के क़रीबी समझा जाता था. उन्हीं दिनों पाली ज़िला कांग्रेस ने एक कार्यक्रम में गहलोत को आमंत्रित किया था. इस पर गहलोत ने सहमति दे दी थी.

मगर जब गहलोत को उस कार्यक्रम में चंद्रास्वामी के आने की जानकारी मिली तो उन्होंने शिरकत से इनकार कर दिया. इस पर चंद्रास्वामी काफ़ी नाराज़ हुए और कुछ दिन बाद ही गहलोत का पद चला गया.

राज्य कांग्रेस में शुरू किया नया चलन

गहलोत के समर्थक 'अशोक नहीं ये आंधी है मारवाड़ का गाँधी है' के नारे बुलन्द कर उनकी जयकार करते हैं. मगर उनके विरोधी गहलोत पर सवाल उठाते रहे हैं. जब वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, विपक्ष ने उन पर कथित रूप से अपने नाते रिश्तेदारों को लाभ पहुँचाने का आरोप लगाया.

गहलोत इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं. आलोचकों की नज़र में गहलोत जोड़-तोड़ में निपुण हैं और वे अपने मुख़ालिफ़ों को बहुत सफ़ाई से निबटा देते हैं. गहलोत ने पिछले दिनों ख़ुद के बारे में कहा, "मैं उन लोगों में से हूँ जो राजनीति में संतुष्ट की श्रेणी में आते हैं."

सियासी उतार-चढ़ाव में कभी उन्हें विचलित और मायूस नहीं देखा गया. लेकिन 1991 में पहली बार गहलोत को विचलित देखा गया.

जोधपुर में राम सिंह आर्य कहते हैं, "यह मई 1991 की बात है. जैसे ही राजीव गाँधी की हत्या की ख़बर आई सभी लोग सर्किट हाउस जमा हुए. गहलोत पास ही एक गांव में चुनाव प्रचार में गए हुए थे. गहलोत विचलित भाव से सर्किट हाउस पहुंचे तो उनकी आँखों में पानी था."

गहलोत केंद्र में मंत्री रहने के अलावा दो बार मुख्यमंत्री और तीन मर्तबा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं. पार्टी संगठन में अपने कार्यकाल के दौरान गहलोत ने पार्टी कार्यक्रमों में गलहार के रूप में सूत की माला के प्रयोग का चलन शुरू किया.

इसके साथ ही पार्टी के पुराने नेताओं और स्वाधीनता सेनानियों के जन्मदिन पर उन्हें याद करने की परम्परा शुरू की. जानकार बताते हैं कि जब वह पहली मर्तबा राज्य कांग्रेस के प्रमुख बने तब गहलोत ने ब्लॉक-तहसील स्तर पर बड़ी संख्या में प्रकोष्ठ गठित कर संगठन का विस्तार किया.

इन प्रकोष्ठों में उन लोगों को नियुक्त किया जो ठेठ नीचे से आते थे और जिनकी कोई बड़ी हैसियत नहीं थी. तब उनके आलोचकों ने यह कहकर खिल्ली उड़ाई कि गहलोत ने संगठन को प्रकोष्ठ कांग्रेस बना दिया.

मगर बाद में उनके आलोचकों को भी लगा कि इसके ज़रिये कांग्रेस ने धरातल पर पार्टी के लिए सियासी पूँजी खड़ी कर ली.

पिछले साल पड़ोस के गुजरात में जब विधानसभा चुनाव हुए थे. गहलोत को वहां प्रभारी बनाकर भेजा गया. तब उनके विरोधियों को लगा कि गहलोत की सियासत पर विराम लग गया है.

मगर जब पार्टी वहां अपने प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार करती नज़र आयी तो विरोधी ख़ामोश हो गए. इसके बाद कर्नाटक में उनके कार्य प्रदर्शन को सराहा गया.

विरोधी उन्हें सूबे की सियासत से दूर रखना चाहते हैं जबकि तरफ़दार उनकी चाहत के नारे लगाते रहते हैं. ऐसे में गहलोत ने एक मारवाड़ी उक्ति 'मैं थांसू दूर नहीं' (मैं आपसे दूर नहीं) के ज़रिये अपने समर्थको में उम्मीद बनाए रखी.

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