टी राजा सिंह: बीजेपी को इतनी तेज़ कार्रवाई क्यों करनी पड़ी?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय जनता पार्टी ने बीते मंगलवार तेलंगाना में अपने विधायक टी राजा सिंह को पैगंबर मोहम्मद पर विवादित देने के बाद निलंबित कर दिया है. बीजेपी ने टी राजा सिंह को दस दिनों का वक़्त देकर पूछा है कि उन्हें पार्टी से क्यों ना निकाल दिया जाए.
तेलंगाना सरकार ने मंगलवार को विधायक टी राजा सिंह के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ करके उन्हें गिरफ़्तार किया था. हालांकि, इसके कुछ घंटों बाद ही उन्हें ज़मानत मिल गयी.
लेकिन ये पहला मौका नहीं है, जब टी राजा सिंह अपने विवादास्पद बयानों की वजह से चर्चा में आए हों.
हैदराबाद की गोशामहल सीट से विधायक टी राजा को तेलंगाना में बीजेपी का फायरब्रांड नेता माना जाता है.
इस बार उन्होंने ऐसा क्या कहा है जिसकी वजह से उनकी गिरफ़्तारी से लेकर निलंबन तक की नौबत आ गयी.
आख़िर क्या बोले थे टी राजा सिंह

टी राजा सिंह ने बीते सोमवार सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो में उन्होंने पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं. दस मिनट लंबे इस वीडियो में वह कॉमेडियन मुनव्वर फारुक़ी के ख़िलाफ़ भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते दिखे.
स्थानीय लोगों ने वीडियो वायरल होने के बाद सोमवार शाम तेलंगाना में टी राजा सिंह के बयानों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने उन्हें तत्काल गिरफ़्तार करने की मांग उठाई.
असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मामले में विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि बीजेपी विधायक ने जान-बूझकर ये बयान दिया है.

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उन्होंने कहा - 'इसको विवादित बयान नहीं कहा जा सकता, बीजेपी के विधायक ने जान-बूझकर ये बयान दिया है. पहले नूपुर शर्मा ने पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप बयान दिया था. इसके बाद एक बीजेपी विधायक ने इस तरह अनाप-शनाप बका है.'
उन्होंने ये भी कहा कि 'इससे ये बात साफ़ ज़ाहिर होती है कि बीजेपी पैग़ंबर मोहम्मद और मुसलमानों से नफ़रत करती है. और समय-समय पर मुसलमानों को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए, मुसलमानों को उकसाने के लिए बीजेपी ऐसा करती है.'
लेकिन सवाल ये उठता है कि विवादित बयान देने के लिए चर्चित टी राजा सिंह के ख़िलाफ़ बीजेपी ने इतनी त्वरित कार्रवाई क्यों की है.

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बीजेपी ने इतनी जल्दी कार्रवाई क्यों की?

दशकों से बीजेपी की राजनीति को देख रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए इसकी वजह बताई है.
प्रदीप सिंह कहते हैं, "नूपुर शर्मा के मामले में भी बीजेपी ने ऐसी ही कार्रवाई की थी. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व और केंद्र सरकार ये संदेश नहीं देना चाहती है कि जो लोग इस तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं, उन्हें पार्टी या सरकार की मंज़ूरी हासिल है.
इसकी वजह से जो भी इस तरह की टिप्पणियां कर रहा है, उसके ख़िलाफ़ कदम उठाया गया है. ये दूसरा मामला है, जिसमें कार्रवाई की गयी है. बीजेपी बताना चाहती है कि हम अपने को इस टिप्पणी से अलग करते हैं, हम इससे सहमत नहीं हैं, इस तरह की टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए."
इसके साथ ही प्रदीप सिंह बताते हैं कि बीजेपी की ओर से 'ये पार्टी के लोगों के लिए संदेश है कि इस पर टिप्पणी करने से बचें क्योंकि इससे पार्टी और सरकार को कोई फायदा नहीं होता है, नुकसान ही होने वाला है. ऐसे में आप जानबूझकर पार्टी, सरकार और देश का नुकसान मत करिए.'
पर क्या ये कार्रवाई नफ़रती भाषणों की वजह से हो रही है?
क्योंकि बीजेपी के तमाम नेताओं और प्रवक्ताओं पर समय - समय पर नफ़रती भाषण और टिप्पणियां करने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन उनके ख़िलाफ़ बीजेपी की ओर से किसी तरह की कार्रवाई होती नहीं देखी गयी.
यही नहीं, पिछले सात सालों में अपनी आक्रामक भाषा के लिए आलोचना झेलने वाले प्रवक्ताओं और नेताओं का बीजेपी में कद बढ़ता देखा गया. इन नेताओं में योगी आदित्यनाथ, नूपुर शर्मा, संबित पात्रा और टी राजा सिंह जैसे तमाम नेता-प्रवक्ता शामिल हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी के रुख़ में इस बदलाव की वजह क्या है.
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क्या नफ़रती भाषणों पर हुई कार्रवाई?

प्रदीप सिंह इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि 'ये कार्रवाई इस आधार तय होती है कि इस्लामिक देश किस मुद्दे पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करना चाहते हैं. सलमान रुश्दी के मामले में भी किताब छपने के पांच महीने बाद फतवा जारी किया गया था.
किताब सितंबर, 1989 में जारी हुई और फतवा हुआ इसके पांच महीने बाद फरवरी में जारी हुआ. भारत में वो किताब दस दिन में बैन हो गयी थी. ऐसे में सवाल इसका नहीं है कि इस्लाम के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोल सकते या पैंग़बर मोहम्मद साहब के बारे में नहीं बोल सकते.
नूपुर शर्मा ने जो बोला है, उससे ज़्यादा ज़ाकिर नायक ने बोला है. वो मुद्दा नहीं बना. क्योंकि उसे मुद्दा नहीं बनाना था. नूपुर शर्मा के मामले में इश्यू बनाना था तो वो टीवी प्रोग्राम के कई दिन बाद बनाया गया.'

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नूपुर शर्मा ने एक निजी टीवी चैनल की डिबेट में शामिल होते हुए पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी जिसके बाद देश भर में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन देखे गए.
इस्लामिक देशों ने इस बयान का विरोध दर्ज कराते हुए भारत सरकार को आड़े हाथों लिया. इसके बाद भारत सरकार ने इस बयान से खुद को अलग किया और बीजेपी ने नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की. उनके ख़िलाफ़ कई जगहों पर एफ़आईआर भी दर्ज हो चुकी है.
प्रदीप सिंह बताते हैं, "इस समय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक बदलाव हो रहा है. भारत अपनी तरफ़ से उसमें पहल कर रहा है. भारत की स्थिति पहले से बेहतर हो रही है. ऐसे में भारत सरकार नहीं चाहती कि किसी एक बयान या घटना के कारण उस पर कोई असर पड़े. ऐसे में एक रिंग फेंसिंग जैसी की गयी है, एक बाढ़ लगा दी गयी है कि इस पर असर नहीं पड़ना चाहिए."
लेकिन सवाल उठता है कि बीजेपी के इस लाल घेरे में सिर्फ़ पैग़ंबर मोहम्मद पर टिप्पणी करना है या ऐसे कदमों के ज़रिए नफ़रती भाषणों को रोकने की कोशिश की जा रही है.

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बीजेपी को सालों से कवर करती आ रहीं वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन मानती हैं कि ये कदम नफ़रती भाषणों को रोकने के लिए नहीं उठाया गया है.
वे कहती हैं, "बीजेपी की इस त्वरित कार्रवाई से ये आशय नहीं निकाला जाना चाहिए कि बीजेपी सभी नफ़रती भाषणों के ख़िलाफ़ इसी ढंग से कदम उठाएगी. ये सिर्फ़ पैग़ंबर मोहम्मद तक सीमित है. क्योंकि नूपुर शर्मा की पैग़ंबर मोहम्मद पर टिप्पणी का मुद्दा कितना बड़ा हो गया था, पश्चिमी एशिया से लेकर मध्य पूर्वी देशों तक इसका असर देखा गया.
और सरकार को आख़िरकार नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ कदम उठाना पड़ा. पश्चिम एशिया के देशों को मनाना पड़ा. ऐसे में बीजेपी ने एक लाल रेखा खींच दी है कि इस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करना है. और अगर कोई पार करेगा तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है."
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