‘कंगारू अदालत के फ़ैसले के बाद शर्म और आतंक के लंबे दौर से गुज़री हूँ’

सेंट ज़ेवियर्स विश्वविद्यालय

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

सोशल मीडिया पर बिकिनी में खिंची गई तस्वीरें पोस्ट करने के बाद कथित रूप से कोलकाता के सेंट ज़ेवियर्स विश्वविद्यालय से इस्तीफ़ा देने वाली महिला प्रोफ़ेसर ने कहा है कि "बीते साल अक्तूबर में विश्वविद्यालय की कंगारू अदालत के फ़ैसले के बाद वे शर्म और आतंक के लंबे दौर से गुज़री हैं."

एक अंग्रेज़ी अख़बार में छपे लेख में उन्होंने अपनी आपबीती को विस्तार से बयान किया है.

बंगाल में 'कंगारू अदालतों' के ज़रिए ख़ासकर ग्रामीण इलाक़ों में तमाम विवादों को निपटाने की लंबी परंपरा रही है और इनको सत्तारूढ़ पार्टी का भी मूक समर्थन हासिल रहा है.

अपने साथ हुए बर्ताव के बाद काफ़ी मशक़्क़त से पुलिस में शिकायत दर्ज कराने पर विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उन प्रोफ़ेसर को 99 करोड़ की मानहानि का नोटिस भेज दिया है.

उधर, सोशल मीडिया पर डाली गई उनकी तस्वीरों के कारण उनको कथित रूप से नौकरी से निकाले जाने के बाद अब इस मुद्दे पर एक नई बहस छिड़ गई है.

सवाल उठाया जा रहा है कि किसी के अकाउंट से उनकी तस्वीरें निकाल कर उस आधार पर उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कैसे किया जा सकता है? इसे निजता के हनन का मामला बताया जा रहा है. इसकी वजह यह है कि उस महिला की प्रोफ़ाइल लॉक्ड (बंद) थी यानी सार्वजनिक रूप से कोई उन तस्वीरों को नहीं देख सकता था.

एक छात्र के अभिभावक ने विश्वविद्यालय प्रबंधन को लिखे पत्र में दावा किया था कि छात्र अंग्रेज़ी की उन महिला प्रोफ़ेसर की बिकिनी वाली तस्वीरें देख रहा था. उसके बाद प्रबंधन ने कथित रूप से महिला प्रोफ़ेसर को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर कर दिया.

प्रबंधन की दलील थी कि प्रोफ़ेसर की करतूत ने संस्थान की साख पर बट्टा लगाया है. इसके एवज़ में विश्वविद्यालय ने महिला प्रोफ़ेसर से मानहानि के तौर पर 99 करोड़ की रक़म भी मांगी है.

दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रबंधन ने महिला के तमाम आरोपों को निराधार बताते हुए दावा किया है कि उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दिया था. यह मामला वैसे तो बीते साल अक्तूबर का है, लेकिन यह अब सामने आया है. महिला प्रोफ़ेसर के पास डॉक्टरेट के अलावा विदेशी डिग्रियां भी हैं.

एक छात्र के अभिभावक की शिकायत के बाद विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर फ़ेलिक्स राज ने महिला को बुला कर सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी तस्वीरें क़रीब-क़रीब नग्नता की श्रेणी में आती हैं.

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महिला प्रोफ़ेसर ने लगाया यौन उत्पीड़न का आरोप

इस घटना के बाद महिला प्रोफ़ेसर ने पुलिस में यौन उत्पीड़न और संभावित हैकिंग की शिकायत दर्ज कराई है.

वह कहती हैं, "मेरे ख़िलाफ़ जो कुछ हुआ वह बेहद सदमे वाली कार्रवाई है और यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती है. मैंने अपने इंस्टाग्राम पेज पर अपनी स्टोरी के साथ स्विमिंग सूट में कुछ तस्वीरें डाली थीं और यह मामला मेरे विश्वविद्यालय में नौकरी शुरू करने से पहले का है. संभवत किसी ने मेरा अकाउंट हैक कर तस्वीरें सेव कर ली थीं. यह मेरी निजता का हनन और यौन उत्पीड़न का मामला है."

उनका कहना है कि "मेरी सहमति के बिना तमाम तस्वीरें एक ऐसी बैठक में सबको दिखाई गई जहां मौजूद आधे से ज़्यादा लोगों को मैं पहचानती तक नहीं थी. यह सब मेरे लिए बेहद अपमानजनक था. बैठक में अभिभावक की ओर से भेजा गया शिकायती पत्र भी उनको पढ़ कर सुनाया गया."

महिला प्रोफ़ेसर के मुताबिक़, बैठक में मौजूद वाइस चांसलर फ़ेलिक्स राज और रजिस्ट्रार समेत दूसरे लोगों ने उनकी इस दलील को नहीं माना कि किसी ने उन तस्वीरों को हैक किया है.

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जेल भेजने की धमकी दी- प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर के अनुसार, वाइस चांसलर ने तो यह तक धमकी दी कि अगर छात्र के अभिभावक ने उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर कर दिया तो उसको जेल तक की हवा खानी पड़ सकती है.

महिला का दावा है कि जो तस्वीरें उन्होंने जून में डाली थीं उनको तीन महीने बाद दूसरा कोई नहीं देख सकता था. कोई भी इंस्टाग्राम स्टोरी और तस्वीरें 24 घंटे बाद दिखाई नहीं देतीं. इस महिला प्रोफ़ेसर ने अगस्त, 2021 में सेंट ज़ेवियर्स विश्वविद्यालय में नौकरी शुरू की थी.

उनका कहना है कि दो महीने बाद सात अक्तूबर को दोपहर बाद वाइस चांसलर ने उन्हें बैठक के लिए बुलाया. अचानक बुलाई गई उस बैठक में सात प्रोफ़ेसर भी मौजूद थे. बैठक में उन लोगों ने नैतिक पुलिस की भूमिका निभाई और लगातार उनका चरित्र हनन किया गया.

महिला प्रोफ़ेसर का कहना है कि उन्होंने लिखित तौर पर इसके लिए माफ़ी मांगते हुए कहा था कि उनका इरादा विश्वविद्यालय की साख पर बट्टा लगाना नहीं था, लेकिन वीसी ने वह पत्र पढ़े बिना कहा कि प्रबंधन ने उनको हटाने का फ़ैसला किया है. इसलिए वे निजी कारण बताते हुए इस्तीफ़ा दे दें. बुरी तरह अपमानित होने के कारण प्रोफ़ेसर ने इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया.

वह पूछती हैं, "मैंने किस नियम का उल्लंघन किया है? विश्वविद्यालय प्रबंधन ने आख़िर मुझे नौकरी पर नियुक्त करने से पहले मेरे सोशल मीडिया अकाउंट्स की जांच क्यों नहीं कराई?" इसके बाद महिला ने काफ़ी मशक़्क़त के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.

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'इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया'

महिला प्रोफ़ेसर ने सेंट ज़ेवियर्स कालेज से ही ग्रेजुएशन किया है और जादवपुर विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की थी. उसके बाद पीएचडी के लिए वे यूरोपीय विश्वविद्यालय में चली गईं. कोलकाता लौटने के एक साल बाद उन्होंने असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के तौर पर नौकरी शुरू की थी. वह कोविड का दौर था.

लेकिन आपने आख़िर इस्तीफ़ा क्यों दिया? इस सवाल पर वो कहती हैं, "मेरी जगह कोई भी होता तो ऐसा ही करता. मुझे धमकी दी गई थी कि अगर मैंने ख़ुद से इस्तीफ़ा नहीं दिया तो आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट करने के लिए मेरे ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कराया जाएगा. मैं और मेरे पिता कोरोना से जूझ रहे थे और हमारी आर्थिक स्थिति भी ख़राब हो गई थी."

फ़िलहाल महिला प्रोफ़ेसर दिल्ली में नौकरी कर रही हैं, लेकिन उनके मुताबिक़ बीते दस महीने किसी दुःस्वप्न की तरह गुज़रे हैं. वह इस मामले में न्याय की लड़ाई जारी रखना चाहती हैं. उनकी दलील है कि कॉलेज से बाहर निजी जीवन में वे क्या पहनती हैं और क्या नहीं, इस पर किसी को सवाल करने का हक़ नहीं होना चाहिए. उनके अनुसार यह उनका निजी मामला है.

महिला प्रोफ़ेसर बताती हैं, "मुझे छात्रों और उनके अभिभावकों का भारी समर्थन मिल रहा है."

इस घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कथित मोरल पुलिसिंग के मुद्दे पर बहस छिड़ गई है. सैकड़ों लोगों, महिला कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और कॉलेज शिक्षिकाओं ने विश्वविद्यालय की कार्रवाई पर गहरी चिंता जताते हुए इसे ख़तरनाक और चिंताजनक क़रार दिया है.

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