You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जेडीयू, शिवसेना, पीडीपी, अकाली... बीजेपी से गठबंधन के बाद कैसे सहयोगी दल कमज़ोर होते चले गए
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
राजनीतिक गलियारे में इन दिनों ये धारणा ज़ोर पकड़ रही है कि भारतीय जनता पार्टी राज्यों में चुनाव के दौरान क्षेत्रीय दलों का इस्तेमाल वोट हासिल करने के लिए करती है और फिर बाद में उन्हें अस्तित्वहीन बना देती है.
ये माना जा रहा है कि इसी तरह के ख़तरे को भांपते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़कर पाला बदल लिया.
इसे हाल के दशकों के सबसे साफ सुथरे और सरल 'राजनीतिक ऑपरेशन' के तौर पर देखा जा रहा है.
भले ही ये लग रहा हो कि बिहार में राजनीतिक बदलाव बहुत तेज़ी से और बहुत कम समय में हुआ है लेकिन नीतीश कुमार जैसे राजनेता को भी ये समझने में लंबा वक्त लगा कि उनकी राजनीतिक ज़मीन झटकने के प्रयास किए जा रहे हैं.
कई बार ये आरोप भी लगाए जाते हैं कि बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने चिराग पासवान का इस्तेमाल जेडीयू का प्रभाव कम करने के लिए किया. ये संभव है कि वो अपनी 'कभी सहयोगी कभी विरोधी' बीजेपी पर पलटवार करने के लिए सबसे अनुकूल समय का इंतज़ार कर रहे हों.
इसके विपरीत कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने अपनी 'लोक शक्ति पार्टी' का विलय जेडीयू में कर लिया था.
वो हेगड़े ही थे जिन्होंने साल 1998 में लोकसभा चुनावों में कर्नाटक में लोक शक्ति पार्टी गठबंधन को 28 सीटों में से अधिकतर पर जीत दिलाई थी. ये जीत अहम थी (जिसमें 13 बीजेपी और तीन लोक शक्ति पार्टी को मिलीं थीं) क्योंकि हेगड़े कर्नाटक में लिंगायत वोट बैंक को बीजेपी को ट्रांसफर कराने में कामयाब रहे थे.
बीजेपी नेता का वो चर्चित दावा
ये इसलिए भी बड़ी बात थी क्योंकि संभवतः ये पहली बार था जब एक गठबंधन सहयोगी (बीजेपी) ने दूसरे नेता के बारे में कहा था, "वो (हेगड़े) इस चुनाव के बाद ज़ीरो हो जाएंगे."
इस बयान में भले ही बीजेपी का अभिमान झलक रहा हो लेकिन उस समय बीजेपी नेता एचएन अनंत कुमार ने मुझसे कहा था, "मेरे शब्द याद रखना."
उस वक़्त अनंत कुमार ने एक सांसद के तौर पर बस दो साल का कार्यकाल पूरा किया था. आगे चलकर वो केंद्रीय मंत्री बने और उनकी कही बात सच साबित हुई.
ये वही लिंगायत वोट बैंक था जिसे अनंत कुमार और बीएस येदियुरप्पा ने अपना आधार बनाया और आगे चलकर बीजेपी साल 2008 में कर्नाटक की सत्ता में आ गई.
राजनीतिक विश्लेषक और भोपाल स्थित 'जागरण लेकसाइड यूनवर्सिटी' के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर संदीप शास्त्री ने बीबीसी से कहा, "भारतीय जनता पार्टी ने एक क्षेत्रीय पार्टी के आधार वोट का इस्तेमाल किया, समय के साथ उसे अपना वोट बनाते हुए एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी."
संदीप शास्त्री कहते हैं, "बीजेपी को जब लगता है कि वो इतनी शक्तिशाली हो गई है कि गठबंधन में वरिष्ठ सहयोगी बन सकती हो तो उसने क्षेत्रीय दल को किनारे कर दिया. या बीजेपी को जब लगता है कि ऐसे क्षेत्रीय दलों के पास अपने दम पर खड़े होने का सामर्थ्य नहीं बचा है तब भी वह उन्हें किनारे कर देती है. महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के लिए ये बात सच है."
हालांकि 'सेंटर फॉर स्टडीज़ ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़' (सीएसडीएस) के निदेशक प्रोफ़ेसर संजय कुमार की राय इससे अलग है. वो ये मानते हैं कि बीजेपी के बारे में ये धारणा ग़लत है कि वह क्षेत्रीय दलों की ताक़त छीन लेती है.
प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं, "हर दल के पास विस्तार करने का अधिकार है. यहां चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि क्या ये खेल स्वतंत्र और साफ़ तरीक़े से खेला जा रहा है. और अगर नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो क्या बीजेपी गंदी और चतुर राजनीति कर रही है? इसका एक पक्ष सरकारी मशीनरी (ईडी, सीबीआई जैसे संस्थानों) का विपक्षी दलों पर दबाव बनाने के लिए दुरुपयोग है. सारे आरोप सिर्फ़ बीजेपी या क्षेत्रीय दलों पर ही नहीं मढ़े जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ ईडी का इस्तेमाल करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा."
राज्यों के मुताबिक रणनीति
लेकिन कई अन्य कारण भी हैं. कई बार, अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों से निबटने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई गई है. उदाहरण के तौर पर कर्नाटक में रणनीति अलग थी जहां 'ऑपरेशन कमल' के ज़रिए बीजेपी ने विधानसभा में बहुमत हासिल किया.
बीजेपी ने विपक्षी दलों कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के कुछ कमज़ोर विधायकों से इस्तीफ़े दिलवाए और फिर उन्हें अपने टिकट पर उपचुनाव लड़वाए.
ये सिर्फ़ एक ही बार नहीं बल्कि 2008 और 2018 में दो बार किया गया लेकिन ये सब इतनी चालाकी से किया गया कि दलबदल क़ानून या संविधान की दसवीं अनुसूची के बावजूद बीजेपी ने विधानसभा में अपने दल पर साधारण बहुमत हासिल कर लिया.
लेकिन महाराष्ट्र में रणनीति अलग रही. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे एकमात्र ऐसे नेता थे जिनके इर्द गिर्द दर्जनभर से अधिक विधायक थे. उन्हें दूसरे विधायकों को खींचने के लिए एक 'हुक' की तरह इस्तेमाल किया गया और पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे को अलग थलग कर दिया गया.
प्रोफ़ेसर शास्त्री कहते हैं, "अपने आप को एक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर स्थापित करने के लिए बीजेपी क्षेत्रीय दलों के कंधों पर सवार हुई और फिर उस क्षेत्रीय दल की जगह लेने की कोशिश की और कहा कि अब तुम हमारे कंधों पर सवार हो. महाराष्ट्र में बीजेपी ने ठीक यही किया है."
राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह कहते हैं, "इस देश में बीजेपी से बेहतर गठबंधन की राजनीति किसी दल ने नहीं की है. शिवसेना ने हमेशा छोटे सहयोगी की भूमिका निभाई और इसलिए ही वो कभी आगे नहीं बढ़ पाई. उसके पास विपक्ष में बैठने या बीजेपी के साथ गठबंधन जारी रखने का मौका था. शिवसेना चुनावों में चौथे नंबर पर थी और बीजेपी को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं थीं. महाराष्ट्र में सत्ता संकट खड़ा हुआ क्योंकि शिवसेना इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाई."
प्रोफ़ेसर शास्त्री कहते हैं, "हालिया संकट शिवसेना की वजह से नहीं था. ये मराठा वोट के लिए शिंदे को शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ख़िलाफ़ खड़ा करने के लिए था."
राजनीतिक टिप्पणीकार आशुतोष कहते हैं, "आपको ये ध्यान रखना होगा कि महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी का वोट बैंक एक ही है. शिवसेना हार गई क्योंकि बीजेपी भी एक स्मार्ट पार्टी है. बीजेपी हमेशा सामाजिक सीढ़ी चढ़ती रही है. वह जनता पार्टी में शामिल हो गई और फिर अलग होकर बीजेपी बन गई. फिर आगे बढ़ने के लिए वीपी सिंह के साथ समझ विकसित की. संगठन के रूप में वो बहुत मज़बूत है और वो हिंदुओं के सपनों का हिंदू राष्ट्र बना रही है."
बिहार और दूसरे राज्य
प्रदीप सिंह कहते हैं, "1996 में जब बिहार में पहला गठबंधन हुआ था तब भी बीजेपी ने जेडीयू को अनुपात से अधिक सीटें दी थीं. आप मई और नवंबर 2005 में दो बार हुए विधानसभा चुनावों में भी ये देख सकते हैं. यहां तक कि लोकसभा में नीतीश कुमार को अधिक सीटें मिलीं. बावजूद इसके वो गठबंधन से अलग हो गए और फिर साथ आए भी तो अलग होने के लिए."
वहीं प्रोफ़ेसर शास्त्री मानते हैं कि ये चार बार जो नीतीश कुमार ने अदला बदली की है यही उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है. शास्त्री कहते हैं कि अब देखना होगा कि नीतीश अपने मतदाताओं को ये कैसे समझाते हैं कि उन्होंने जो किया वो क्यों किया, ये ही सबसे अहम है.
शास्त्री कहते हैं, "एकमात्र शक्तिशाली हथियार ये है कि ये लड़ाई सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के हितों को बचाने की है. उनका गठबंधन भी इन्हीं का प्रतिनिधित्व करता है."
हालांकि बीजेपी जिस पारदर्शिता से क्षेत्रीय दलों का इस्तेमाल करती है उससे विश्लेषक हैरान हैं. 'इस्लामिक यूनिवर्सिटी' श्रीनगर के पूर्व वाइस चांसलर और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफ़ेसर सिद्दीक़ वाहिद कहते हैं, "बीजेपी एक राज्य में दाख़िल होते ही और ताक़त का इस्तेमाल करके दूसरे दल को बेअसर करती है. ऐसा करने के लिए उसके पास मास्टर खिलाड़ी हैं, फिर भी लगता है कि किसी ने सबक नहीं सीखा है."
"गठबंधन के लिए भरोसा ज़रूरी है. स्पष्ट रूप से पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) और बीजेपी के बीच तत्कालीन जम्मू-कश्मीर में कोई भरोसा नहीं था. ज़ाहिर तौर पर इस सबमें कश्मीर का बड़ा नुक़सान हुआ.
जम्मू और कश्मीर का उदाहरण
इस गठबंधन की वजह से पीडीपी ने अपना जितना समर्थन गंवाया उसे वो अब तक हासिल नहीं कर सकी है. हालांकि इसका सही आंकलन करना मुश्किल है क्योंकि तब से (तीन साल पहले कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने) से अब तक कश्मीर में कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं हुई है."
वहीं दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में दूसरे राज्यों के मुक़ाबले बीजेपी की स्थिति अलग है. यहां वो एआईएडीएमके को रिझाने की कोशिश कर रही है ताकि उसकी पीठ पर सवार होकर डीएमके को चुनौती पेश कर सके और मुख्य विपक्षी दल बन जाए. बीजेपी ये जानती है कि पूर्व मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी दिवंगत जयललिता की तरह जननेता नहीं है और उनकी जगह लेकर बीजेपी को वोट ट्रांसफर करना आसान होगा.
हालांकि एआईएडीएमके बीजेपी के साथ गठबंधन से हिचक रही है क्योंकि उसे लगता है कि वह शहरी नौजवानों की वजह से 2021 के विधानसभा चुनाव हारी थी क्योंकि वो बीजेपी की वजह से उससे दूर हो गए थे.
बीजेपी के नजदीक रहे पूर्व मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम को पलानीस्वामी समूह ने पहले से ही नज़रअंदाज़ कर दिया है. पूर्व एआईएडीएमके मंत्री के क़रीबी के घर पर ईडी का पहला छापा भी पड़ चुका है. लगता है अभी यहां लड़ाई शुरू होनी बाक़ी है.
वहीं दूसरे दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टी (टीडीपी) ख़राब रिश्ते को फिर से बेहतर करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व से संकेत मिलने का इंतेज़ार कर रही है. साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने और राजधानी अमरावती के लिए फंड देने का अपना वादा पूरा नहीं किया तब टीडीपी और बीजेपी के रिश्तों में दरार आ गई.
नायडू का मामला अलग है क्योंकि इसकी वजह बीजेपी के पुराने नेतृत्व लाल कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजयेपी की जगह नए नेतृत्व नरेंद्र मोदी और अमित शाह का कमान संभालना है.
वैसे आंध्र प्रदेश में बीजेपी को टीडीपी की बहुत ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि वहां गठबंधन की मजबूरियों में बंधे बिना ही मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी संसद के दोनों सदनों में बीजेपी को समर्थन देती रही है.
बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के नज़रिए में इसी तरह के बदलाव ने पंजाब में पार्टी के सबसे पुरानी गठबंधन सहयोगी अकाली दल के साथ रिश्ते प्रभावित किए हैं. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के निधन और अकाली दल के वोट बैंक सिखों में राष्ट्रवादी हिंदू पार्टी बीजेपी के प्रति समर्थन बनाए रखने में झिझक ने दोनों दलों के रिश्तों को प्रभावित किया. कृषि क़ानूनों ने दोनों के रिश्तों को पूरी तरह से तोड़ दिया.
बीजेपी अपना आधार कैसे बढ़ाती है और सहयोगी कैसे गंवाते हैं?
प्रोफ़ेसर संजय कुमार के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि लोगों के दिमाग़ में सबसे बड़ा फ़र्क पैदा करती है.
संजय कुमार कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी की छवि ने क्षेत्रीय दलों को पारंपरिक वोट बैंक, ख़ासकर अन्य पिछड़ा वर्ग को आकर्षित किया है. ऐसे राज्यों में जहां आरजेडी, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी जैसे दल सत्ता में थे, वहां उनके बाद आई बीजेपी ने शासन में कुछ बेदलाव किया है. मैं बहुत सावधानी से कुछ बदलाव शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं."
संजय कुमार कहते हैं, "इसी कारण बीजेपी दलितों और आदिवासियों में अपना समर्थन आधार दोगुना करने में कामयाब रही है. बीजेपी ओबीसी में निचले वर्ग में अपनी जगह बनाने में कामयाब रही है क्योंकि यूपी और बिहार में ओबीसी का ऊपरी वर्ग राजद और सपा के लिए वफ़ादार है."
सिर्फ़ इतना ही नहीं. "एक टीम खेल में, भले ही वो क्रिकेट हो या फुटबॉल, खेल को साफ तरीक़े से खेलना भी अहम है. यही वजह है कि आप देख रहे हैं कि वफ़ादार गठबंधन सहयोगी भी पिछले कुछ सालों में अलग हो रहे हैं."
संजय कुमार कहते हैं, "विपक्षियों और लंबे समय तक बीजेपी के साथ रहे सहयोगियों को भी ये बात पता है कि बीजेपी सिर्फ़ चुनाव जीतना नहीं चाहती है. वो विपक्ष को ख़त्म करके जीतना चाहती है. इस मामले में वो निर्मम है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)