आरजेडी के विधायक हैं ज़्यादा, फिर भी नीतीश के डिप्टी क्यों बने तेजस्वी?

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार में सत्ता के लिए गठबंधन बनते-बिगड़ते रहे हैं. बीजेपी का साथ छोड़ अब फिर से राजद के साथ आए नीतीश कुमार बीते दो दशकों से इन सत्ता गठबंधनों के केंद्र में रहे हैं.

बुधवार को नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल के सहयोग से आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. विधानसभा में अधिक संख्याबल होने के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव दूसरी बार उनके डिप्टी बने हैं.

राष्ट्रीय जनता दल बिहार में 2005 के बाद से सत्ता से बाहर थी. साल 2015 में नीतीश के साथ गठबंधन में राजद फिर से सत्ता में आई लेकिन नीतीश ने 2017 में राजद पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए पाला बदला और बीजेपी के साथ सरकार बना ली.

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने बीजेपी गठबंधन के साथ और तेजस्वी की राजद ने कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ मिलकर लड़े. इस बार फिर नीतीश के गठबंधन की जीत हुई और बहुत कम अंतर से तेजस्वी सत्ता से दूर हो गए.

लेकिन बिहार की राजनीति ने फिर करवट ली है और विपक्ष के नेता तेजस्वी रातों-रात फिर से नीतीश कुमार के साथ सत्ता में आ गए हैं.

पुरानी कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है. तो फिर ऐसा क्या है कि साल 2017 में नीतीश से धोखा खा चुके तेजस्वी यादव ने दोबारा उनका दामन थामने में कोई हिचक नहीं दिखाई. बल्कि दो क़दम आगे बढ़ते हुए मौके को लपक लिया. या फिर तेजस्वी के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था?

क्या कहती है राजद

तेजस्वी यादव के पुरानी कड़वाहट को भुलाकर और दो क़दम आगे बढ़कर नीतीश को गले लगाने की वजह बताते हुए राजद की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य जयंत जिज्ञासु बताते हैं, "हमारी पार्टी का सबसे बड़ा मक़सद बिहार और देश में फासीवादी ताक़तों को आगे बढ़ने से रोकना है और इसके लिए हम किसी भी लोकतांत्रिक हद तक जाने के लिए तैयार हैं."

जिज्ञासु कहते हैं, "भाजपा जिस तरह से क्षेत्रीय दलों को अमर्यादित और अनैतिक तरीकों से नेस्तनाबूद करने में लगी थी, ऐसे में हम ये अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं कि अपनी पूरी ताक़त से बीजेपी का मुक़ाबला करें और क्षेत्रीय पार्टियों को बचाएं. हम ये मानते हैं कि क्षेत्रीय दल ही मूल दल है."

नीतीश के साथ गठबंधन के सवाल पर जिज्ञासु कहते हैं, "हम जहां थे वहीं हैं. हम बीजेपी के ख़िलाफ़ थे और बीजेपी के ख़िलाफ़ अब भी हैं. बीजेपी को रोकने को लिए जो भी ज़रूरी है, हम करेंगे. इसलिए ही हम फिर से अपने उन पूर्व सहयोगियों के साथ आ रहे हैं जो किन्हीं कारणों से हमसे दूर चले गए थे."

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक ये मानते हैं कि तेजस्वी के फिर से गठबंधन में आने की सबसे बड़ी वजह ये है कि वो लंबे समय से सत्ता से दूर थे. अपनी पार्टी और एजेंडे को मज़बूत करने के लिए उनका सत्ता में आना ज़रूरी था.

पटना के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "राजनीति कुर्सी और सत्ता के लिए होती है, उस राजनीति का मतलब ही क्या है जिससे सत्ता और कुर्सी ना मिले. तेजस्वी के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि वो सत्ता में आ गए हैं और अब अपने लोगों के लिए काम कर सकते हैं."

नीतीश कुमार की बिहार से बाहर निकलकर दिल्ली पहुंचने की चाह किसी से छुपी नहीं है और अब ये चर्चाएं भी आम हैं कि वो कुछ महीने बाद पटना की कमान तेजस्वी के हाथ सौंपकर दिल्ली के लिए अपना अभियान शुरू कर सकते हैं.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, "आने वाले दिनों में तेजस्वी यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन सकते हैं और नीतीश प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निकल सकते हैं. नीतीश और तेजस्वी के बीच समझौता भी यही हुा है."

क्या राजद अपना एजेंडा पूरा कर सकेगी

राष्ट्रीय जनता दल धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने का दावा करती है. नीतीश कुमार बीजेपी के साथ होते हुए भी अपनी अलग छवि बनाए रखने में कामयाब रहे हैं.

सवाल ये है कि क्या दोनों पार्टियों के राजनीतिक उद्देश्य एक हो सकेंगे और राजद जदयू के साथ रहते हुए अपने एजेंडे को पूरा कर सकेगी.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, "जदयू के साथ आने से राजद हर लिहाज से फ़ायदे में है. आने वाले दिनों में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर पाएं या नहीं, लेकिन वो राजनीति से रिटायर कर जाएंगे. उनकी जदयू समाजवादियों का कुनबा है. उनके बाद जदयू में दूसरी कतार का नेतृत्व नहीं है, ऐसे में बहुत संभव है कि जदयू तेजस्वी को नेता के तौर पर स्वीकार कर ले."

एक सवाल ये भी उठ रहा है कि संख्या बल अधिक होने के बावजूद तेजस्वी ने नीतीश कुमार का डिप्टी बनना स्वीकार किया है, कहीं ऐसा ना हो कि तेजस्वी की भूमिका बिहार में डिप्टी तक ही सीमित रह जाए.

जयंत जिज्ञासू इस सवाल को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "राजनीतिक नैतिकता को संख्या द्वारा निर्देशित नहीं करना चाहिए. राजद ने और लालू प्रसाद यादव ने हमेशा बड़ा दिल दिखाया है. 2013 में नीतीश जिस तरह एनडीए से अलग हुए उनकी सरकार ख़तरे में आ गई थी लेकिन लालू जी ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया और सरकार बचाई."

जिज्ञासु कहते हैं, "हमारा मूल मकसद किसी भी तरह से धर्मनिरपेक्षता को बचाए रखना है, ये हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है और यही महत्वपूर्ण रहेगा. तेजस्वी यादव के भीतर कोई अभिमान नहीं है, उन्होंने सिर्फ़ हाथ ही नहीं मिलाया है बल्कि दिल भी मिलाया है."

वहीं कन्हैया भेलारी कहते हैं, "भले ही तेजस्वी आज डिप्टी हों लेकिन मुख्यमंत्री बनने से बहुत दूर नहीं हैं. नीतीश के साथ इस गठबंधन से बिहार में उनका क़द बहुत बड़ा हो गया है. वो एक नंबर के नेता हो गए हैं."

क्या राजनीतिक परिस्थितियां बदल गयी हैं?

नीतीश कुमार 2017 में तेजस्वी यादव और राजद पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए महागठबंधन से अलग हुए थे. अब उन्होंने अपनी पार्टी के ही नेता आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया.

तेजस्वी फिर नीतीश के साथ आ गए. लेकिन सवाल ये है कि जो दो दल अलग हो गए थे वो फिर साथ क्यों आए, क्या राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं?

कन्हैया भेलारी कहते हैं, "सिर्फ़ बिहार में ही नहीं समूचे देश में राजनीतिक परिस्थिति बदल चुकी है. नीतीश कुमार बहुत सोच समझकर बीजेपी से अलग हुए हैं. अगर उनके बीजेपी के साथ राजनीतिक मतभेद थे तो उन्हें बहुत आसानी से बैठकर सुलझाया जा सकता था. बीते पांच साल से तो वो बीजेपी के साथ थे ही. लेकिन अब उन्हें लग रहा था कि अगर उन्होंने अभी क़दम नहीं उठाया तो फिर कभी नहीं. वो प्रधानमंत्री बनने की दिशा में प्रयास करना चाहते हैं और अभी जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ है वो नीतीश की इसी इच्छा का नतीजा है."

अब बिहार में सबसे नज़दीक चुनाव 2024 में होने वाले आम चुनाव हैं. विश्लेषक मानते हैं कि बिहार के इस राजनीतिक घटनाक्रम का असर 2024 पर पड़ना तय है.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, "एनडीए ने नीतीश के साथ चुनाव लड़ते हुए 40 में से 39 लोकसभा सीटें बिहार में जीती हैं. निश्चित तौर पर नीतीश के अलग होने का असर पड़ेगा और बहुत संभव है कि बीजेपी को यहां नुक़सान हो."

इसका गणित समझाते हुए कन्हैया कहते हैं, "पिछले चुनावों में जदयू 17, बीजेपी 17 और राम विलास पासवान की पार्टी 6 सीटों पर लड़ी थी और तीनों दलों ने 39 सीटें जीतीं थीं. लेकिन अब नीतीश के अलग होने से ये गणित गड़बड़ा जाएगा. नीतीश का असर सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि झारखंड में भी है. यूपी में भी उनके प्रभाव की जातियां हैं. ज़ाहिर तौर पर आगामी 2024 लोकसभा चुनावों में महागठबंधन का पलड़ा भारी होगा."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)