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जेडीयू-आरजेडी के साथ आने से क्या बिहार में बदल जाएंगे जाति समीकरण- प्रेस रिव्यू
बिहार में नीतीश कुमार ने एनडीए से पल्ला झाड़ते हुए एक बार फिर लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिला लिया है. राज्य में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव.
अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स ने बिहार की बदली सियासत का विश्लेषण करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें कहा गया है कि बिहार में एनडीए गठबंधन से जेडीयू के अलग हो जाने के बाद बीजेपी के लिए 'नए महागठबंधन' के पक्ष में ओबीसी वोटों के एकीकरण को रोकना मुश्किल हो सकता है. आज के प्रेस रिव्यू में सबसे पहले ये ख़बर.
इकोनॉमिक टाइम्स की ख़बर के अनुसार, साल 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से बीजेपी ने 17 सीटों पर जीत हासिल की थीं. बिहार की अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं के बीच बीजेपी को समर्थन प्राप्त है. इसकी एक बड़ी वजह नीतीश कुमार थे.
नीतीश कुमार की जेडीयू जब तक बीजेपी के साथ रही, बीजेपी के लिए इन सबसे पिछड़ी जाति के वोटरों को अपनी ओर खींच पाना काफी आसान रहा है. दरअसल, जेडीयू को सबसे पिछड़ी जातियों के वोटरों और महिलाओं वोटरों को जुटाने में सफल पार्टी के तौर पर जाना जाता है.
बीजेपी ने बिहार में साल 2020 के विधानसभा चुनाव में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था. बीजेपी ने अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी के ओबीसी नेताओं को आगे बढ़ाने की काम भी किया.
डिप्टी सीएम ताराकिशोर प्रसाद, रेणु देवी, संजय जायसवाल को अहम पद देकर पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए नींव तैयार कर रही थी.
विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी जिस तरह से आगे बढ़ रही थी उससे यह साफ़ था कि वो ओबीसी वोटर्स के बीच अपने बेस को मज़बूत करना चाहती थी. अब जबकि नीतीश कुमार भी बीजेपी का साथ छोड़कर जा चुके हैं तो ऐसे में सवाल यह है कि अब बीजेपी इन वोटर्स को कैसे अपनी झुका पाएगी?
जेडीयू में सूत्रों के हवाले से इकोनॉमिक टाइम्स ने लिखा है कि नई महागठबंधन सरकार जाति मतगणना कराने को प्राथमिकता देगी.
एक सूत्र के हवाले से अख़बार लिखता है, "बिहार में ओबीसी मतदाताओं को महागठबंधन के पक्ष में मज़बूत करने के लिए जाति जनगणना एक प्रमुख राजनीतिक हथियार बन सकता है. नई सरकार एक त्रुटि-मुक्त जाति-मतगणना कराने की पूरी कोशिश करेगी और इसे एक साल के भीतर पूरा कर लिया जाएगा."
नीतीश कुमार के महागठबंधन में वापस लौटने से महागठबंधन को अपना सामाजिक-दायरा बढ़ाने मं निश्चित तौर पर मदद मिलेगी.साल 2020 के विधानसभा चुनावों में सीपीआई(एमएल) ने दक्षिण बिहार के बहुत से निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया था. अब जैसा कि नीतीश कुमार भी साथ आ चुके हैं तो उम्मीद की जा रही है कि एससी वोटर्स भी महागठबंधन की ओर झुकेंगे.
भारत और नेटो के बीच हुई थी पहली राजनीतिक बातचीत लेकिन क्यों
सार्वजनिक ख़बरों और चर्चाओं से दूर, भारत सरकार ने 12 दिसंबर 2019 को ब्रसेल्स में नेटो के साथ अपनी पहली राजनीतिक बातचीत की थी.
इंडियन एक्सप्रेस ने इस ख़बर को अपनी सबसे अहम ख़बर के तौर पर पहले पन्ने पर प्रकाशित किया है.
नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन यानी नेटो 1949 में बना एक सैन्य गठबंधन है जिसमें शुरुआत में 12 देश थे जिनमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल थे. इस संगठन का मूल सिद्धांत ये है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है तो बाकी देश उसकी मदद के लिए आगे आएंगे.
यह यूरोपीय देशों का एक सैन्य गठबंधन है और इसमें भौगोलिक स्थिति के हिसाब से सामरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए सदस्य जोड़े जाते रहे हैं अपनी भौगोलिक स्थिति और कूटनीतिक कारणों से भारत नेटो का सदस्य नहीं है. दरअसल में नेटो में कोई भी एशियाई देश सदस्य नहीं है.
नेटो गठबंधन में अब 30 सदस्य देश हैं.
विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बैठक में हिस्सा लिया था. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ख़बर में लिखा यह कि इस बैठक का प्रारूप स्पष्ट तौर पर राजनीतिक था और सैन्य या अन्य-द्वपक्षीय सहयोग पर कोई प्रतिबद्धता बनाने से बचने के लिए था.
31 अगस्त से हटाए जाएंगे एयरफ़ेयर-कैप,सस्ता होगा एयर टिकट!
केंद्र सरकार ने कोरोनो महामारी के दौरान घरेलू एयरलाइन्स पर लगाए गए एयरफ़ेयर-कैप को हटाने का फैसला किया है.
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि एयरफ़ेयर कैप 31 अगस्त से हटा दिया जाएगा.
केंद्रीय नागरिक उड्ड्यन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि यह फ़ैसला बाज़ार के रुझानों पर आधारित है.
उन्होंने कहा, "एयर टर्बाइन फ्यूल की रोज़ाना की मांग और क़ीमतों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के बाद ही एयरफ़ेयर-कैप हटाने का फ़ैसला किया गया है."
दिल्ली में हर रोज़ बलात्कार की औसतन छह घटनाएं
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में महिलाओं से बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यहां पिछले साल की तुलना में इस साल छह महीने में बलात्कार की वारदात साढ़े 17 फ़ीसद बढ़ी है.
जनसत्ता की ख़बर के अनुसार, इस तरह से महिलाओं से औसतन छह बलात्कार की घटनाएं हर रोज़ सामने आ रही हैं. दिल्ली पुलिस की ओर से जारी आंकड़ों में सामने आया है कि इस साल अभी तक बलात्कार के 1100 मामले दर्ज किए गए हैं.
इसके साथ ही पति और ससुराल पक्ष की क्रूरता के मामलों में इसी समयावधि में 29 फ़ीसद केस बढ़े हैं.
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