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उत्तराखंड में पुलिसकर्मियों के घरवाले क्यों उतरे सड़कों पर
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, देहरादून से
उत्तराखंड में पिछले करीब एक साल से एक अलग तरह का आंदोलन चल रहा है जो पुलिस और सरकार के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. पुलिसकर्मियों के परिजन 4600 ग्रेड पे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं.
मुख्यमंत्री तक की ओर से मांगें माने जाने का आश्वासन मिलने के बावजूद पुलिसकर्मियों के परिजन आंदोलनरत हैं क्योंकि अब तक किसी भी आश्वासन के अनुरूप कार्रवाई नहीं हुई है.
स्थिति इतनी गंभीर है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक को चार पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा है क्योंकि उनके परिजन लगातार प्रदर्शन कर रहे थे.
ग्रेड पे पर बवाल
उत्तराखंड पुलिस में सिपाही की भर्ती 2000 ग्रेड पे पर होती है. 2001 में पहली बार नए राज्य की पुलिस में सिपाहियों की भर्ती हुई थी. तब ग्रेड पे में बढ़ोतरी 8, 12 और 22 साल की सेवा पर होनी थी. आठ साल की सेवा के बाद इन सिपाहियों को 2400 ग्रेड पे, 12 साल की सेवा के बाद बाद 4600 और 22 साल की सेवा के बाद 4800 ग्रेड पे दिए जाने का प्रावधान था.
इस हिसाब से पहले बैच के सिपाहियों को 2013 में 4600 ग्रेड पे का लाभ मिलना शुरू हो जाना था लेकिन 2013 से पहले ही सरकार ने समय-सीमा में बदलाव कर दिया.
नई नीति के अनुसार ग्रेड पे में बदलाव 10, 16 और 26 साल की सेवा के बाद मिलना था. इस हिसाब से इन सिपाहियों को 2017 में 4600 ग्रेड पे का लाभ मिलना था लेकिन 2016 में आए सातवें वेतन आयोग से यह फिर बदल गया.
सातवें वेतन आयोग से पहले सिपाहियों का ग्रेड पे अगले प्रमोशन के अनुरूप बढ़ना था लेकिन नए प्रावधानों के हिसाब से प्रमोशन न होने पर अगले ग्रेड पे का भुगतान होना था. बता दें कि 2400 और 4600 के बीच में दो स्लैब और हैं.
यही नहीं ग्रेड पे की समयावधि भी बदल दी गई और अब यह 10, 20 और 30 साल कर दी गई. अप्रैल 2021 में पहले बैच के सिपाहियों को 20 साल भी पूरे हो गए और तब 4600 ग्रेड पे की मांग उठनी शुरू हुई.
पुलिस फ़ोर्स का हिस्सा होने की वजह से पुलिसकर्मी खुद तो कोई प्रदर्शन या आंदोलन नहीं कर सकते लेकिन पुलिसकर्मियों के परिजनों ने 4600 ग्रेड पे की मांग करना शुरू कर दिया. उस समय पुलिसकर्मियों में असंतोष और 15-20 इस्तीफ़ों की ख़बरें भी आईं.
हालांकि, पुलिस अधिकारियों के अनुसार चार लोगों ने इस्तीफ़ा दिया था और वह भी वापस ले लिया.
एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में पुलिसकर्मियों के साथ सहानुभूति जताते हुए कहा कि "उनके पास विकल्प ही क्या था, वे यदि नौकरी छोड़ देते तो करते क्या, नौकरियां हैं कहां"?
बहरहाल इससे यह तो साफ़ हो गया कि पुलिसकर्मियों में असंतोष पनप रहा है. मामले को सुलझाने के लिए तत्कालीन कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय उपसमिति का गठन कर दिया गया था. इस उपसमिति ने कई बैठकें भी कीं.
इसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने पिछले साल 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस पर 2001 के सिपाहियों को 4600 ग्रेड पे देने की घोषणा कर दी थी. इस साल 2002 बैच के सिपाहियों के भी 20 साल पूरे हो गए और अब करीब 3000 सिपाही हो गए हैं जिन्हें 4600 ग्रेड पे का इंतज़ार है.
निलंबन
यह मामला अब फिर सुर्खियों में आ गया है. बीते रविवार, 31 जुलाई, 2022 को कुछ पुलिसकर्मियों के परिजनों ने इस मुद्दे पर देहरादून में एक प्रेस कॉंफ्रेंस की. इसमें जवानों को 4600 ग्रेड-पे का वादा पूरा न किए जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी गई थी.
इसके बाद पुलिस ने सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली का उल्लंघन करने के आरोप में चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया. बाद में इनमें से एक ने सफ़ाई दी कि उसकी पत्नी या कोई और परिजन उक्त प्रेस कॉंफ्रेंस में शामिल नहीं था इसलिए उसे बहाल कर दिया गया.
उत्तरकाशी में तैनात एक सिपाही की पत्नी आशी भंडारी, पुलिस मुख्यालय में तैनात सिपाही की उर्मिला चंद और चमोली में कार्यरत सिपाही की मां शकुंतला रावत के प्रेस कांफ्रेंस करने पर तीनों सिपाहियों को निलंबित किया गया है.
इसके बाद इन लोगों ने रविवार, 6 अगस्त को प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया लेकिन पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार से मुलाकात के बाद उसे टाल दिया.
शकुंतला रावत ने बीबीसी हिंदी से बातचीत करते हुए कहा कि चूंकि उन तीनों ने मास्क नहीं पहने हुए थे इसलिए वे पहचान में आ गए और उनके परिजनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर दी गई. जो महिलाएं मास्क में थीं वह बच गईं.
उन्होंने कहा कि वे तीनों अब कोई आंदोलन न करने के लिए तैयार हैं लेकिन शर्त यह है कि उनके परिजनों का निलंबन वापस लिया जाए और मुख्यमंत्री ने जिसका वादा किया था वह 4600 ग्रेड पे दिया जाए.
आश्वासन और चेतावनी
उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा कि विभाग पुलिसकर्मियों की मांगों और समस्याओं को लेकर संजीदा है और इसीलिए उनकी मांगों को शासन को बढ़ा दिया गया है. अब फ़ैसला शासन के स्तर से होना है.
उन्होंने पुलिसकर्मियों के परिजनों से अपील भी कि वे विभाग पर भरोसा रखें और सब्र बनाए रखें. साथ ही कहा कि अच्छी पुलिस फ़ोर्स की पहली शर्त अनुशासन होती है और अनुशासनहीनता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
डीजीपी ने कहा कि अगर पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों के द्वारा कर्मचारी आचरण नियमावली का किसी भी तरह उल्लंघन किया जाता है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.
असंतोष बढ़ना ठीक नहीं
पूर्व पुलिस महानिदेशक आलोक बी लाल कहते हैं कि यह सही है कि पुलिस विभाग के नियमों के तहत पुलिसकर्मी आवाज़ नहीं उठा सकते. अगर कोई विभागीय निर्णय से आहत होता है तो वह न्यायालय जा सकता है लेकिन यह एक बहुत लंबी प्रक्रिया होती है.
लाल कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति नौकरी ज्वाइन करता है तो जो नियमावली होती है उसे बदला नहीं जा सकता, नया वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने से पहले भी कर्मचारी से पूछा जाता है कि वह नए प्रावधान मानना चाहता है या पुराने ही रखना चाहता है.
उन्होंने कहा सरकार को इस मामले में एक श्वेतपत्र देकर बताना चाहिए कि क्यों वह ग्रेड पे नहीं दे पा रही है, जो शुरुआत में वादा किया गया था. सरकार यह साफ़ करेगी तो यह उसके लिए भी अच्छा होगा और पुलिसकर्मियों के लिए भी. पुलिस में असंतोष बढ़ना कतई भी किसी के लिए अच्छा नहीं है.
बताया जा रहा है कि पुलिसकर्मियों की ग्रेड पे की मांग मान ली जाती है तो सरकार के खज़ाने पर करीब 15 करोड़ सालाना का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि अगर पुलिसकर्मियों को 4600 ग्रेड पे दिया जाता है तो अन्य कर्मचारियों को भी देना होगा और यह बहुत भारी हो जाएगा.
लेकिन पूर्व डीजीपी आलोक लाल कहते हैं कि पुलिसकर्मियों को किसी अन्य सेवा के समकक्ष नहीं तोला जा सकता. पुलिस की नौकरी 24 घंटे की और मुश्किल होती है. अपराध को रोकने, अपराधियों को पकड़ने, अपराध की जांच करने के दौरान कभी भी उसकी जान खतरे में आ सकती है. उस पर पुलिसकर्मी खुलकर अपनी अपनी बात भी नहीं रख सकते.
पिछले साल 21 अक्टूबर को पुलिस दिवस पर जिस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने पुलिसकर्मियों को 4600 ग्रेड पे का लाभ देने की घोषणा की थी उसी में बताया गया था कि 21 अक्टूबर, 2020 से 20 अक्टूबर 2021 तक की एक साल की अवधि में राज्यों की पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के 377 के कर्मचारी शहीद हुए थे. इनमें से 3 उत्तराखंड के भी थे.
कोरोना काल के दौरान पुलिस लगातार स्थिति को नियंत्रण में लाने और ज़रूरतमंदों को मदद करने में जुटी रही थी. उत्तराखंड पुलिस के 4000 से ज़्यादा कर्मचारी-अधिकारी इस दौरान कोरोना संक्रमित हुए थे और 13 पुलिसकर्मियों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी.
लाल कहते हैं कि इसलिए पुलिसकर्मियों की कोई मांग है तो उसे प्राथमिकता के आधार पर सुनना चाहिए.
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