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अफ़रा रफ़ीक़: वो बहन जिसने भाई को नई ज़िंदगी दी लेकिन खुद नहीं बची
- Author, मैरिल सेबेस्टियन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, कोचीन
सोशल मीडिया पर एक वीडियो के ज़रिए अपने छोटे भाई के इलाज के लिए करोड़ों रुपये जुटाने वाली 16 वर्षीय अफ़रा रफ़ीक़ की बीते सोमवार केरल के एक अस्पताल में मौत हो गई.
अफ़रा एक दुर्लभ जेनेटिक कंडीशन स्पाइनल मस्क्युलर एट्रॉफ़ी से जूझ रही थीं. इस कंडीशन से जूझ रहे व्यक्ति की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और चलने-फिरने एवं सांस लेने में दिक्कत होती है.
अफ़रा के पिता पीके रफ़ीक़ बताते हैं, "उसे अपनी जीवन में हर संभव खुशी मिली है."
अफ़रा के घरवाले और पड़ोसी उन्हें एक युवा एवं प्रतिभाशाली लड़की के रूप में याद करते हैं जो दर्द से जूझते हुए भी डांस और पढ़ने में रुचि लेती थी.
लेकिन देश भर में अफ़रा की लोकप्रियता साल 2021 में वायरल हुए एक वीडियो से फैली. उनके पिता बताते हैं कि इससे पहले अफ़रा कन्नूर ज़िले में स्थित अपने घर से कम ही निकलती थीं.
चार साल में पता चला
अफ़रा के एसएमए से पीड़ित होने की बात चार साल की उम्र में पता चली. इसके बाद वह सिर्फ स्कूल या अस्पताल जाने के लिए अपने घर से निकला करती थीं.
पीके रफ़ीक़ कहते हैं, "हम बहुत ज़्यादा सामाजिक नहीं थे. और अपनी कोशिशों को आफरा का इलाज कराने में लगाते थे."
लेकिन इसके बाद उनके छोटे भाई मुहम्मद के भी इसी बीमारी से पीड़ित होने की बात सामने आई. रफ़ीक़ बताते हैं कि इस ख़बर से घर में सब बुरी तरह टूट गए, "क्योंकि हम जानते थे कि हमारी बेटी किस दर्द से होकर गुजरी है."
एसएमए एक ऐसी कंडीशन है जिससे पीड़ित व्यक्ति की जान जा सकती है. पैदा होने वाले छह से दस हज़ार बच्चों में से एक बच्चे के इस कंडीशन से पीड़ित होने की संभावना रहती है.
इस कंडीशन का असर मोटर न्यूरोन सेल्स पर पड़ता है जो स्पाइनल कॉर्ड यानी रीढ़ की हड्डी में होती हैं. उम्र बढ़ने के साथ-साथ इस कंडीशन का बुरा असर दिखाई देने लगता है.
एसएमए से पीड़ित बच्चे गर्दन उठाने, बैठने, खड़े होने और चलने जैसे मूल काम करने में संघर्ष करते हैं. रफ़ीक़ बताते हैं कि अफ़रा चाहती थीं कि मुहम्मद को सही इलाज मिले.
करोड़ों रुपये की दवा
इसमें जीन थेरेपी के लिए दी जाने वाली एक नई दवाई ज़ोलजेन्स्मा भी शामिल है जिसे साल 2019 में यूएस एफडीए ने स्वीकृति दी थी.
ये दुनिया में सबसे महंगी दवाइयों में से एक है जिसमें उस जीन की रेप्लिका होती है जो एसएमए से पीड़ित बच्चों में नहीं होता है. यह दवा दो साल से छोटे बच्चों को सिर्फ एक बार देनी होती है.
जब मुहम्मद के इस कंडीशन से पीड़ित होने की बात सामने आई तो उनकी उम्र डेढ़ साल थी. उनके परिवार के पास काफ़ी कम वक़्त बचा था. रफ़ीक़ कहते हैं, "दवा का दाम इतना ज़्यादा था जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था."
इस दवा की कीमत 18 करोड़ रुपये है जिसे अमेरिका से मंगवाना पड़ता है. ज़ोलजेन्स्मा को स्वीकृति मिलने के बाद कई भारतीय लोगों ने क्राउड फंडिंग के ज़रिए इस दवा को हासिल करने की कोशिश की है.
कुछ लोगों ने इसके लिए वीडियो बनाकर अपील की थी जिनके वायरल होने से उन्हें मदद ली. भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एसएमए जैसी दुर्लभ कंडीशन के लिए वॉलेंटरी क्राउंडफंडिंग को स्वीकृति दी है.
अफ़रा ने बनाया वीडियो
अफ़रा के परिवार ने भी ऑनलाइन क्राउडफंडिंग समेत कई विकल्पों का इस्तेमाल किया. उनकी स्थानीय ग्राम समिति ने भी इलाज समिति बनाकर पैसे जुटाए. लेकिन इससे सिर्फ कुछ लाख रुपये जमा हो सके.
इसके बाद अफ़रा ने अपने कज़िन की मदद से एक वीडियो बनाया. इस वीडियो में उन्होंने कहा, "मैं नहीं चाहती कि मेरा भाई भी उसी दर्द से गुज़रे जिससे मैं गुज़र रही हूं."
ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया. ग्राम समिति के सदस्य वाईएल इब्राहिम कहते हैं, "अचानक, हर जगह से पैसे आने शुरू हो गए."
तीन दिनों के अंदर मुहम्मद के इलाज के लिए 46.78 करोड़ रुपये जमा हो गए. इसके बाद अफ़रा ने लोगों से पैसा भेजना बंद करने की अपील की.
इब्राहिम कहते हैं, "हमने बहुत प्रयास किए लेकिन उनका वीडियो और उनकी बात लोग को छू गई."
दो अन्य बच्चों को बचाया
मुहम्मद को डोज़ मिलने के बाद ग्राम समिति ने इकट्ठे हुए अतिरिक्त धन को एसएमए से संक्रमित दो अन्य बच्चों की मदद करने में लगाया और शेष राषि केरल सरकार को दे दी.
रफ़ीक़ कहते हैं कि अफ़रा ने परिवार को बचा लिया. इस सफलता से ख़ुश होकर अफ़रा ने एक यूट्यूब चैनल शुरू किया जिसके ज़रिए उन्होंने अपने भाई के इलाज के बारे में बताना शुरू किया.
इस चैनल में अस्पताल जाने वाले मौके, भाई के साथ टाइम बिताने और बर्थडे-त्योहार मनाने के वीडियो डाले जाते थे.
अफ़रा अपने वीडियो में मुहम्मद के मेडिकल ट्रीटमेंट और फीज़ियोथेरेपी के बारे में भी बताया करती थीं. मुहम्मद की उम्र अब दो साल हो चुकी है. वह घुटने चलने लगे हैं और सहारा लेकर खड़े हो जाते हैं.
रफ़ीक़ कहते हैं, "वह अभी अपने आप खड़ा या चल नहीं पाता है. लेकिन अब उसकी टांगों में कुछ ताक़त आ गई है."
बिगड़ती चली गयी अफ़रा की हालत
लेकिन इस बीच अफ़रा की हालत ख़राब होती गई. अफ़रा के घर वाले बताते हैं कि ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में वह दर्द की वजह से अपने दांत पीसा करती थीं और मुश्किल से अपने हाथ उठा पाती थीं.
अफ़रा के आख़िरी वीडियो में उनके परिवार की अस्पताल विज़िट दिखाई गई थी. अफ़रा की मौत के बाद हज़ारों लोगों ने श्रद्धांजलि संदेश छोड़े हैं. रफ़ीक़ मानते हैं कि अफ़रा के वीडियोज़ ने भारत में एसएमए के बारे में जागरूकता फैलाई है.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि उसकी ज़िंदगी का यही मकसद था. उसके वीडियो के माध्यम से लोगों को समझ आया कि एसएमए क्या होता है और इससे क्या होता है."
रफ़ीक़ कहते हैं कि अफ़रा इस साल अपने स्कूल के इम्तेहान देना चाहती थी, वह बहुत मेहनत भी कर रही थी. और वह हर विषय में सबसे अच्छे नंबर लाने के लिए दृढ़ निश्चयी थी.
अफ़रा की मौत के एक दिन बाद जब रफ़ीक़ उनकी स्टडी टेबल के पास पहुंचे तो वहां दीवार पर लगे एक स्टीकर देखकर उनकी आँखों में आंसू आ गए. इस स्टीकर में अफ़रा ने अपने लिए लिखा था - 'तुम कर सकती हो.'
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