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प्रधानमंत्री कार्यालय को लॉकडाउन के निर्णय के बारे में जानकारी देने का निर्देश
- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच लॉक डाउन लगाने की प्रधानमंत्री की घोषणा से पहले किन-किन विभागों से विचार-विमर्श किया गया था और पीएम मोदी इस निर्णय तक कैसे पहुँचे थे.
बीबीसी की ओर से, सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से जानकारी माँगी गई थी लेकिन जानकारी देने से इनकार कर दिया गया था.
अपील की सुनवाई करने के बाद, केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने पीएमओ को निर्देश दिया है कि वह अपने निर्णय की 'दोबारा समीक्षा' करके, मांगी गई जानकारी 'बिंदुवार' तरीक़े से दे.
सूचना आयोग ने आरटीआई के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय की पहली प्रतिक्रिया को 'मानने योग्य नहीं' और 'सूचना के अधिकार के प्रावधानों के 'प्रतिकूल' बताया है.
बीबीसी संवाददाता की अपील सुनने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त वाईके सिन्हा ने ये आदेश 11 जुलाई को जारी किया है.
सूचना के अधिकार के तहत ये आवेदन नवंबर 2020 में किया गया था.
नीचे दिए गए स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है, सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से कोरोना वायरस लॉकडाउन लगाने से पहले हुई बैठकों के बारे में जानकारी मांगी गई थी. ये भी पूछा गया था कि किन-किन अथॉरिटी, मंत्रलायों और विशेषज्ञों से सलाह ली गई थी और क्या राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लॉकडाउन लगाने से पहले जानकारी दी गई थी.
प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना के अधिकार क़ानून की धारा 7(9) का हवाला देते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया गया था. इस पर की गई अपील को भी पीएमओ ने ठुकरा दिया था.
इसके बाद सूचना आयुक्त के समक्ष याचिका दायर की गई थी जिस पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया गया है.
आरटीआई की धारा 7(9) क्या कहती है?
ये कहती है, "सूचना सामान्यतः उसी रूप में प्रदान की जाएगी जिस रूप में उसे मांगा गया है, अगर ऐसा करने में सार्वजनिक प्राधिकरण के संसाधनों अनुपात से अधिक उपयोग करना पड़े या संबंधित रिकॉर्ड की सुरक्षा या संरक्षण के लिए हानिकारक हो, तो जानकारी उस रूप में नहीं दी जा सकती."
यह व्यवस्था जानकारी देने के रूप के बारे में है, इसमें सरकारी विभाग को इस बात की छूट नहीं है कि वह जानकारी ही न दे.
मुख्य सूचना आयुक्त ने इस संवाददाता की दो और अपीलों पर फैसला दिया है. इनमें भी गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन से जुड़ी सूचनाएँ देने से इनकार कर दिया था.
प्रधानमंत्री कार्यालय की तरह ही केंद्रीय गृह मंत्रालय में दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 में दायर की गई आरटीआई के तहत मंत्रालय से ये पूछा गया था कि क्या उसे देश भर में लॉकडाउन लगाने के फ़ैसले के बारे में जानकारी दी गई थी और मंत्रालय की तरफ से किस तरह के सुझाव दिए गए थे. इस याचिका का स्क्रीनशॉट देखा जा सकता है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी पूछी गई जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई थी.
मंत्रालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) (a) के तहत सूचना देने से इनकार कर दिया था. ये धारा ऐसी सूचनाओं के बारे में है, जिनके प्रकटीकरण से भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों, विदेशी राज्य के साथ संबंध या किसी अपराध को रोकने की दिशा में प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है'.
इसके अलावा धारा 8(1)(e) का भी हवाला दिया गया था. आरटीआई कानून की धारा 8(1) (जे) ऐसी सूचना को ज़ाहिर करने से छूट देता है जो निजी सूचना से संबंधित है और जिससे जनहित का कोई संबंध नहीं है या जिससे व्यक्ति के निजता का उल्लंघन होगा.
क्या है पृष्ठभूमि?
ये आरटीआई याचिकाएँ उन 240 से अधिक आवेदनों का हिस्सा थीं जिन्हें अलग-अलग केंद्र और राज्य सरकारों, मंत्रालयों जिनमें स्वास्थ्य, श्रम, वित्त, गृह मंत्रालय शामिल थे, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री कार्यालयों में भेजा गया था.
छह महीने चला ये प्रयास ये समझने के लिए किया गया था कि हर मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले किस तरह की तैयारियाँ की थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार घंटे के नोटिस के भीतर ही लॉकडाउन लगा दिया था.
हमें इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि इनमें से किसी संस्थान या विशेषज्ञ से लॉकडाउन लगाने से पहले कोई सलाह ली गई थी या इस निर्णय में उनकी कोई भूमिका थी.
एनडीएमए से मिली जानकारी से ये भी पता चला था कि लॉकडाउन लगाने से पहले प्रधानमंत्री ने एनडीएमए की किसी बैठक में हिस्सा नहीं लिया था जबकि प्रधानमंत्री ही एनडीएमए के प्रमुख होते हैं. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की थी तब देश में कोरोना संक्रमण के 519 मामलों की पुष्टि हुई थी और नौ मौतें हुईं थीं.
सरकार ने विशेषज्ञों का हवाला देते हुए लॉकडाउन को सही ठहराया था. हालांकि इस दौरान बड़े पैमाने पर प्रवासी मज़दूर और कामगरों को लौटना पड़ा था और कम-से-कम एक करोड़ लोगों को काम छूटने और शटडाउन होने की वजह से अपने गांवों और गृहनगरों को लौटना पड़ा था.
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