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नई संसद में राष्ट्रीय प्रतीक बनाने वाले सुनील देवड़े विवाद पर क्या बोले?
हाल ही में नए संसद भवन की छत पर राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण किया गया लेकिन इसके स्वरूप को लेकर विवाद छिड़ गया. आलोचकों का कहना है कि इसमें शेर उग्र दिख रहे हैं, जो राष्ट्रीय चिह्न के परंपरागत स्वरूप से अलग हैं.
इस पूरे मामले पर बीबीसी मराठी संवाददाता दीपाली जगताप ने संसद भवन पर राष्ट्रीय प्रतीक बनाने वाले सुनील देवड़े से विस्तार में बात की.
सुनीव देवड़े ने बीबीसी को बताया कि पूरी प्रतिमा अशोक स्तंभ की प्रतिकृति है और जो फ़ोटो वायरल हो रही है वो अलग एंगल से खींची गई है, जिसकी वजह से शेर उग्र दिख रहे हैं.
सुनील देवड़े ने कहा कि एक आर्टिस्ट के तौर पर किसी का कोई धर्म नहीं होता और वो पूरी लगन के साथ बीते एक साल से इस प्रतीक चिह्न को बना रहे हैं. देवड़े ने कहा कि उन्हें खुशी है कि इस राष्ट्रीय चिह्न को बनाने का काम उन्हें मिला और इस काम में उन्होंने अपना सौ फ़ीसदी योगदान दिया है.
"अशोक स्तंभ की रेप्लिका है ये प्रतिमा"
सरकार पर शेरों के हावभाव को उग्र दिखाने के आरोपों पर सुनील देवड़े ने कहा, "ये बात बिल्कुल गलत है. ये पूरी प्रतिमा असली अशोक स्तंभ की रेप्लिका है. उसमें भी उसका दाँत दिखाई दे रहा है, शेर का मुंह खुला हुआ है. उसी को हमने बड़ा बनाया है."
उन्होंने कहा, "इस काम को शुरू हुए करीब-करीब एक साल हुए हैं. हमने सारनाथ के अशोक स्तंभ को स्टडी किया है. उसका इतिहास जाना और उसके बाद हमने उसका एक रेप्लिका (प्रतिकृति) बनाई. इसके बाद रेप्लिका को औरंगाबाद में बड़ा बनाया और फिर इसका फ़ाइबर मॉडल बनाकर हमने जयपुर में इसे कास्ट (ढाला) किया."
देवड़े ने कहा, "जो फ़ोटो वायरल हो रही है उसके बारे में मैं ये कहना चाहता हूं कि उस एंगल में प्रतिमा नीचे की ओर से दिख रही है. वो तस्वीर वाइड एंगल में ली गई है. इसलिए उस तस्वीर में शेरों का जबड़ा और दांत साफ़-साफ़ दिख रहा है, जो असली स्तंभ में भी है. असली रेप्लिका साढ़े तीन से चार फ़ीट की है. अगर इसी प्रतिमा को ऊपर से देखा जाए तो उसमें आपको शेर शांत लगेंगे."
- सोमवार 11 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी ने नए संसद भवन में स्थापित राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण किया
- 605 मीटर ऊंची इस विशालकाय मूर्ति में शेरों हावभाव पर छिड़ा विवाद
- कुछ लोगों ने शेरों को दयालु और राजसी होने के बजाय गुस्से से भरा बताया
- सरकार समर्थकों ने इस राष्ट्रीय चिह्न के आलोचकों को अज्ञानी बताया
"कलाकार की कोई धर्म या जाति नहीं होती"
लगातार जारी आलोचना पर जवाब देते हुए सुनील देवड़े ने कहा, "सबकी अपनी सोच होती है लेकिन एक कलाकार का कोई धर्म या जाति नहीं होती. पूरे एक साल से मैं वो काम लगन के साथ कर रहा हूं. जब प्रतिकृति बड़ी होती है तो हर चीज़ आपको बड़ी दिखेगी. जिस तस्वीर से नई प्रतिकृति की तुलना हो रही है अगर उसका फ़ोटो भी नीचे के एंगल से लिया जाएगा तो वो भी वैसा ही दिखेगा."
विवाद को लेकर सुनील देवड़े ने कहा, "मुझे ये अच्छा लगा कि मैं राष्ट्रीय चिह्न बना रहा हूं. हमने हू-ब-हू रेप्लिका बनाई है. इसके बाद अब किसकी-क्या सोच है, इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता. कला के बारे में आप मुझसे पूछिए. मैं उस पर विस्तार से जवाब दे सकता हूं."
नए संसद भवन के लिए राष्ट्रीय प्रतीक की प्रतिकृति बनाने का ज़िम्मा मिलने पर सुनील देवड़े ने कहा कि वो इससे काफ़ी उत्साहित थे.
उन्होंने कहा, "इस प्रोजेक्ट के लिए हमने चार महीने रिसर्च किया है कि असल स्तंभ कैसे बना होगा. वो 300 ईसा पूर्व बना था. वो स्टोन से बना है. वो कितना टूटा है. इसकी रेप्लिका ज़्यादा से ज़्यादा देश के पाँच-छह म्यूज़ियम में ही रखी है. हमने पटना म्यूज़ियम जाकर इसका अध्ययन किया. हमने ये अध्ययन किया कि इसे बड़ा कैसे बनाया जाए. उसके बाद हमने इसे बनाने की प्रक्रिया शुरू की."
विवाद पर एक कलाकार के तौर पर कैसा महसूस हो रहा है इस सवाल पर देवड़े ने कहा, "मैं अपने काम से संतुष्ट हूं. अब उस प्रतिकृति का अनावरण भी हो गया है. हमारे लिए उसे सही जगह लगाना चुनौतीपूर्ण था. हमने पूरा काम कर के दिखाया है."
केंद्र सरकार के किसी मंत्री या अन्य प्रतिनिधि की ओर से प्रतिकृति बनाने पर कोई चर्चा हुई या नहीं इसको लेकर देवड़े ने कहा, "मुझे ये काम टाटा प्रोजेक्ट लिमिडेट की ओर से मिला था. मुझे सिर्फ़ आर्किटेक्ट और डिज़ाइनर से मतलब था."
अनावरण के बाद केंद्र सरकार की ओर से कैसी प्रतिक्रिया मिली, इस सवाल के जवाब में देवड़े ने कहा, "जिस दिन अनावरण हुआ, उस दिन दो मिनट पीएम मोदी से मुलाक़ात हुई. उन्होंने मज़दूरों को प्रोत्साहित किया."
प्रतिकृति पर टीका-टिप्पणी करने वालों को सुनील देवड़े ने संदेश दिया कि इस रेप्लिका को एक कला के तौर पर देखें. उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि अशोक स्तंभ की जगह कुछ और बना दिया गया है. इसमें मेरी, पूरी टीम की मेहनत लगी है.
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