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मोदी सरकार संसद भवन की नई इमारत को लेकर उतावली क्यों? नियमों की उपेक्षा के आरोप
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत सरकार के प्रस्तावित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर जैसे-जैसे ज़्यादा जानकारी मिल रही है, वैसे-वैसे इससे जुड़े सवालों की फ़ेहरिस्त भी लंबी होती जा रही है.
सेंट्रल दिल्ली को एक नई शक्ल देने वाले इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी है. बहस का मुद्दा एक ही है- एक नए संसद भवन समेत राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट के बीच कई इमारतों के निर्माण की योजना सही है या ग़लत?
मौजूदा सेंट्रल विस्टा एक ऐतिहासिक इलाक़ा है जिसे देखने लोग दूर-दराज़ से आते हैं और ख़ूबसूरती के साथ-साथ भारत की सत्ता के गलियारे भी यहीं रहे हैं.
बहराल, सेंट्रल विस्टा को नई शक़्ल देने की शुरुआत होगी संसद से और नई इमारत में ख़र्च होंगे तक़रीबन 971 करोड़ रुपये.
वैसे संसद में जगह बढ़ाने की मांग पिछले 50 वर्षों से ज़्यादा से उठती रही है और पिछली यूपीए सरकार में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के कार्यकाल में भी इस पर बहस हुई थी.
हालांकि, मौजूदा प्रोजेक्ट के बारे में पहले कम ही सुना गया था इसलिए जब 2019 की चुनावी जीत के महीनों बाद ही भाजपा सरकार ने इसकी घोषणा की तो कुछ को हैरानी भी हुई.
दरअसल, सेंट्रल विस्टा राजपथ के क़रीब दोनों तरफ़ के इलाक़े को कहते हैं जिसमें राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट के करीब प्रिंसेस पार्क का इलाक़ा भी शामिल है.
सेंट्रल विस्टा के तहत राष्ट्रपति भवन, संसद, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, उपराष्ट्रपति का घर भी आता है.
मौजूदा सेंट्रल विस्टा में नेशनल म्यूजियम, नेशनल आर्काइव्ज की भव्य इमारत, इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फोर आर्ट्स (IGNCA), उद्योग भवन, बीकानेर हाउस, हैदराबाद हाउस, निर्माण भवन और जवाहर भवन भी आते हैं और इन सभी इमारतों को नया स्वरूप और शक़्ल देने की योजना है जिसकी कुल लागत 14,000 करोड़ रुपए बताई जा रही है.
घोषणा के साल भर बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नई इमारत का शिलान्यास किया जिसमें 1200 से ज़्यादा सांसद और उनके स्टाफ़ एक साथ बैठ सकेंगे.
प्रधानमंत्री ने कहा, "इससे सुंदर, इससे पवित्र क्या होगा कि जब भारत अपनी आज़ादी के 75 वर्ष का पर्व मनाए तो उस पर्व की साक्षात प्रेरणा हमारी संसद की नई इमारत हो...ये समय और ज़रूरतों के अनुरूप, ख़ुद में परिवर्तन लाने का प्रयास है".
उठ रहे हैं सवाल
प्रस्तावित संसद भवन के तैयार होने की तारीख़ साल 2024 है लेकिन एक बड़े सवाल के साथ कि क्या सुप्रीम कोर्ट इसे बनाने की इजाज़त देगा? जहाँ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सभी की राय और तरीक़ों को शामिल करने का भरोसा दिलाया है वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने संसद के निर्माण पर सरकार के रुख़ को 'आक्रामक' बताया है.
सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल विस्टा के ख़िलाफ़ जाने वाले याचिकाकर्ता और वरिष्ठ आर्किटेक्ट नारायण मूर्ति का मानना है, "जिस तरह से ये प्रोजेक्ट चल रहा है, ये हमारी सारी प्रक्रियाओं और संस्थाओं की उपेक्षा कर रहा है."
उन्होंने बताया, "मेरे और आपके लिए, एक एफ़एआर होती है जो बताती है कि हम एक प्लॉट पर कितना बना सकते हैं. अगर हम दस वर्ग मीटर भी ज़्यादा बना लें तो उसकी इजाज़त नहीं है और एमसीडी की टीम आकर उसको तोड़ देती है. लेकिन जितनी ऊंचाई की अनुमति है, अगर सरकार ही उसका डेढ़ गुना, जितनी एफ़एआर में अनुमति है उसका डेढ़ गुना बना रही है तो ये देश के लिए क्या सीख है. क्या इसका मतलब है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस?"
ज़रूरत, लागत, सरकारी अनुमतियाँ या प्रस्तावित संसद की इमारत का डिज़ाइन, सभी चीज़ों पर राय बँटी हुई है. सवाल उठने लाज़मी है कि क्या आज़ाद भारत में पहले भी ऐसा हुआ है.
आधुनिक इतिहासकार और जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय की पूर्व प्रोफ़ेसर मृदुला मुखर्जी का मानना है, "आधुनिक भारत में ज़्यादातर प्रोजेक्ट्स प्रतिस्पर्धा के ज़रिए बने हैं, चाहे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय."
उनके मुताबिक़, "आईजीएनसीए, हो या कोई और, इनके बनने की प्रक्रिया में लोगों को, आर्टिस्ट्स या आर्किटेक्ट्स, सभी को शामिल किया गया था. अभी मुझे लगता है जो सरकार है या नौकरशाही है, वो इस पर बहुत ज़्यादा हावी है. अब जैसे संसद की इमारत है तो जो लोग संसद में समय बिता चुके हैं या अभी भी हैं, उनकी राय तो कहीं दिखाई नहीं देती. फ़िलहाल लगता है कि सरकार जो लोगों के लिए अच्छा समझती है वो कर देती है, उन्हें बता देती है बिना चर्चा किए हुए".
क्या कहती है सरकार
वहीं केंद्र सरकार का दावा है कि परियोजना 'राष्ट्र हित' में है क्योंकि सेंट्रल विस्टा के आधुनिक होने की ज़रूरत है जिससे सैकड़ों करोड़ रुपए भी बचेंगे और नई इमारतें ज़्यादा मज़बूत और भूकंपरोधी बनेंगी.
रहा सवाल इस हरे-भरे और खुले इलाक़े में ज़्यादा इमारतें बनाने का तो सरकार का कहना है कि वो इसमें ज़्यादा हरियाली लाने वाली है. लेकिन विरोध के ज़्यादा स्वर पर्यावरण को लेकर ही उठे हैं.
दिल्ली के सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च में पर्यावरण विशेषज्ञ कांची कोहली का मत है, "क़ानून का सहारा लेते हुए प्रस्तावित इमारतों को पूरे प्रोजेक्ट से अलग किया गया है जबकि शुरुआत से सरकार की अपनी प्रेस रिलीज़ में साफ़ है कि ये पूरे प्रोजेक्ट का ही हिस्सा है."
उन्होंने कहा, "पूरे पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया एक तरीक़े से प्लॉट दर प्लॉट, बिल्डिंग दर बिल्डिंग की तरह से की गई. उसमें सबसे पहले आपने पर्यावरण स्वीकृति लेने के लिए उस पूरे प्रोजेक्ट से तोड़ कर ली और कहा कि क्योंकि ये सिर्फ़ एक अपवाद प्रोजेक्ट है इसलिए पर्यावरण आकलन की ज़रूरत नही".
फ़िलहाल तो गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है जिसने सरकार को नई संसद के शिलान्यास की इजाज़त तो दी लेकिन किसी भी तोड़-फोड़ या नए काम पर अभी रोक लगा रखी है.
मौजूदा सेंट्रल विस्टा की नींव
वैसे इतिहास गवाह है कि दिल्ली कई शहंशाहों और हुकूमतों की राजधानी रही जिसमें निर्माण कार्य लगातार होता रहा. आज़ादी के पहले और बाद भी ये सिलसिला जारी रहा जिसमें शहर का स्वरूप बदला और नामचीन इमारतें बनीं.
मौजूदा सेंट्रल विस्टा की नींव तब पड़ी थी जब ब्रिटेन के महाराज जॉर्ज-5 ने 1911 में ऐलान किया कि देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली शिफ़्ट की जाएगी.
टाउन प्लानिंग कमिटी में ब्रितानी आर्किटेक्ट एडवर्ड लटेंस और हरबर्ट बेकर थे जिन्होंने कमिटी के शुरुआती फ़ैसले को पलटा जिसमें राजधानी का निर्माण दिल्ली के शाहजहानाबाद इलाक़े में होना था. एक भव्य राजधानी के लिए चुना गया रायसिना हिल नाम की पहाड़ी को.
आपसी मतभेद पहले भी हुए थे, लेकिन सरकार और आम नागरिकों में नहीं.
सेंट्रल विस्टा डिज़ाइन करने वाले दोस्तों लटेंस और बेकर में राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की ऊँचाई पर राय अलग-अलग थी और इतिहासकारों के मुताबिक़ इससे उनकी गहरी दोस्ती में खटास भी आई.
मौजूदा सरकार में तो ये ज़ाहिर नहीं होता लेकिन बहुत से नागरिक समूह और आम नागरिक सरकारी पारदर्शिता के दावे पर अदालत पहुँच चुके हैं.
लेकिन क्या ब्रितानी शासन वाले और अब के सेंट्रल विस्टा में तुलना की जा सकती है, इसके जवाब में आधुनिक इतिहासकार और जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय की पूर्व प्रोफ़ेसर मृदुला मुखर्जी कहती हैं, "उनकी परामर्श प्रक्रिया उनकी सरकार के भीतर ही थी और ज़ाहिर है उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादियों के साथ तो विचार-विमर्श नहीं किया था, आम नागरिकों के साथ बिलकुल भी नहीं क्योंकि उस समय सवाल ही नहीं उठता था"
उन्होंने कहा, "20वीं सदी के शुरुआती दो दशकों में भारतीयों की सरकार में भागीदारी नहीं थी और 1930 के बाद ही बढ़ी. पर अब तो वैसे हालात नहीं हैं, मुझे लगता है कि ये अच्छा मौक़ा था और उसमें बदलाव लाने भी थे तो प्रक्रिया दूसरी होनी थी. दूसरी बात मुझे ये समझ नहीं आई कि अगर एक्सपर्ट्स, आर्किटेक्ट्स, नागरिकों या कुछ राजनीतिक समूहों ने इस प्रोसेस पर आपत्ति जताई है तो उसमें क्या ग़लती है, वो क्यों नहीं सुनी जा सकती?"
नेशनल वॉर मेमोरियल में नहीं हुआ विवाद
जब इस इलाक़े का निर्माण हुआ तब फ़ैसला लेने वाली ब्रितानी सरकार का शासन 1947 में ख़त्म हो गया. भारत की पहचान कही जाने वाली इन इमारतों के दोबारा पुनर्निर्माण का फ़ैसला अब देश की लोकतांत्रिक सरकार ले रही है.
सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल विस्टा के ख़िलाफ़ जाने वाले याचिकाकर्ता और वरिष्ठ आर्किटेक्ट नारायण मूर्ति को लगता है, "शुरू के मास्टर-प्लान में प्लानर्स ने ये सोचा था कि इस शहर और इस राष्ट्र के बीच की जो ये जगह है ये जनता की ही होनी चाहिए."
उन्होंने आगे बताया, "लटेंस के मास्टर-प्लान में तो वही था जो आज बनने जा रहा है- बड़ी-बड़ी दस इमारतें थीं ऑफ़िस के लिए. जबकि हमारे देश के मास्टर-प्लानर्स ने उसे रोका और जो चार-पाँच इमारतें राष्ट्रपति भावन या विजय चौक की तरफ़ पड़ती हैं, जहाँ शास्त्री भवन या निर्माण भावन आज हैं, उनको छोड़ कर इंडिया गेट के चारों और राउंडअबाउट में वो सारी ज़मीन को जनता के नाम की थी."
हालांकि, बात अगर पिछले कुछ वर्षों की हो तो दिल्ली का नेशनल वॉर मेमोरियल इसके विपरीत एक उदाहरण है.
इसे बनाने की माँग 1960 से रही लेकिन निर्माण का फ़ैसला हुआ जब 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई. साल भर तक ग्लोबल डिज़ाइन टेंडर उपलब्ध रहे जिसमें देश-विदेश के आर्किटेक्ट अपने मॉडल के साथ शामिल हुए.
इसके तैयार होने में थोड़ी देरी ज़रूर हुई लेकिन मौजूदा सेंट्रल विस्टा परियोजना की तुलना में विवाद न ही के बराबर रहे.
पर्यावरण विशेषज्ञ कांची कोहली के मुताबिक़, "सेंट्रल विस्टा का इलाक़ा सिर्फ़ दिल्ली नहीं पूरे देश की धरोहर है. तो जब हम देश की धरोहर के बारे में निर्णय ले रहे हैं तो क्यों न एक जन संशोधन किया जाए? क्यों न जनता को शामिल किया जाए? पहले बताइए क्या प्लान है, उसके ऊपर पब्लिक इनपुट लीजिए, तभी क्रिएटिव आइडिया निकल कर आएँगे और लोगों को लगेगा कि ये जगह हमने साथ में सोच कर बनाई है."
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