शिंज़ो आबे: बुलेट ट्रेन से गंगा आरती तक, टूट गई भारत-जापान दोस्ती की एक मज़बूत डोर

पीएम मोदी और शिंजो आबे

इमेज स्रोत, Narendra Modi/twitter

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत और जापान की दोस्ती का ज़िक्र जब भी आएगा, साल 1998 का ज़िक्र ज़रूर आता है. दोनों देशों की दोस्ती का ये वो अध्याय है, जब दोस्ती में थोड़ी दरार आ गई थी.

बात साल 1998 की है. भारत ने दोबारा परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था. भारत ने 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में तीन परीक्षण किए. दो दिन बाद 13 मई को दो और परीक्षण किए गए. इसकी भनक कई देशों को नहीं हुई.

इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन सहित दुनिया के कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए. उन देशों में जापान भी एक था.

जापान में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रहा है. जापान ने चूंकि उससे होने वाले त्रासदी को सबसे करीब से देखा है.

ये प्रतिबंध दो साल तक बरक़रार रहे, फिर साल 2000 में दोनों देशों के रिश्तों में एक बार गर्मजोशी दोबारा लौटी.

दोनों देशों की दोस्ती 1998 के प्रतिबंधों के दौर के बाद आज अगर इस मुकाम पर पहुँची है, जहाँ रक्षा, सुरक्षा, मेरीटाइम सिक्योरिटी से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तक हर जगह उनका दख़ल दिखता है, तो इसका बहुत हद तक श्रेय जापान की तरफ से शिंज़ो आबे को जाता है.

आज जब जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंज़ों आबे नहीं रहे, भारत में भी एक दिन के राष्ट्रीय शोक का एलान किया गया.

छोड़िए X पोस्ट, 1
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 1

लाइन

भारत-जापान रिश्तों के अहम पड़ाव

लाइन
  • दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिराए गए. उस त्रासदी से उबरने में उन्हें बहुत वक़्त लगा. दुनिया में एक तरह से जापान अलग थलग पड़ गया.
  • भारत ने साल 1951 एशियन गेम्स की मेज़बानी की. इन खेलों में हिस्सा लेने के लिए भारत ने जापान को न्योता दिया.
  • फिर साल 1952 में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत हुई.
  • साल 1958 में जापान ने भारत को पहली आर्थिक मदद दी, जो सिलसिला साल 1991 से लेकर आज तक जारी है.
  • साल 1998-2000 के बीच दो साल के प्रतिबंधों के बाद, 2001 में जापान-भारत के बीच ग्लोबल पार्टनरशिप की शुरुआत हुई, जिसे शिंज़ो आबे अपने कार्यकाल में नई ऊंचाइयों पर ले गए.
  • साल 2006-07 में जब शिंजो आबे जापान के पहली बार प्रधानमंत्री बने. उस दौरान 2007 में वो भारत आए और संसद को संबोधित किया.
  • साल 2014 के गणतंत्र दिवस के मौके पर वो मुख्य अतिथि थे.
  • पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों की दोस्ती और परवान चढ़ी.
  • साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो उपमहाद्वीप के बाहर द्विपक्षीय यात्रा के लिए उन्होंने जापान को ही चुना. अपने दो टर्म में पीएम मोदी छह बार जापान जा चुके हैं.
  • उसी तरह से शिंज़ो आबे अपने दूसरे कार्यकाल में तीन बार (2014, 2015, 2017) भारत आए हैं. कोई दूसरा जापानी प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल में इतनी बार भारत यात्रा पर नहीं आया.
मोदी और शिंजो आबे

इमेज स्रोत, NArendra modi/twitter

इंडो-पैसेफिक

दोनों देशों के रिश्तों में इन अहम पड़ावों के अलावा भी लिखने के लिए कई किस्से हैं.

भारत में दिल्ली मेट्रो जापान की मदद से ही बनी है. मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना की नींव भी शिंज़ो आबे के सामने रखी गई और तकनीक भी भारत ने जापान से ही ली है.

जेएनयू में जापानी स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर श्रावणी चौधरी भारत-जापान रिश्तों पर अच्छी पकड़ रखती हैं.

शिंज़ो आबे के पहले भारत दौरे को याद करते हुए वो कहती हैं, "उनके दो अहम दौरे भारत में हमेशा याद किए जाएंगे. जब 2007 में वो भारत की संसद में बोल रहे थे, उन्होंने Confluence of the Two Seas यानी दो समुद्रों के संगम का नारा दिया. यहीं से इंडो-पैसेफिक यानी हिंद-प्रशांत के नैरेटिव को असल में विस्तार मिला. एक तरह से शिंज़ो आबे इंडो-पैसेफिक कॉन्सेप्ट के जनक हैं."

"साल 2014 में जब भारत के गणतंत्र दिवस पर वो मुख्य अतिथि के तौर पर आए तो उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को 'इस सदी का अहम रिश्ता' क़रार दिया था."

प्रोफ़ेसर श्रावणी चौधरी आगे कहती हैं, "भले ही भारत-जापान के रिश्तों की नींव 1952 में पड़ी हो. लेकिन इस रिश्ते का नया दौर शिंज़ो आबे के पीएम बनने के बाद शुरू हुआ, जब दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग बढ़ा. फिर आगे चलकर विदेश और रक्षा मंत्रियों की 2+2 बैठकें, मेरिटाइम सिक्योरिटी, क्वाड और इंफ्रास्ट्रचर परियोजनाओं में साझेदारी बढ़ती ही गई."

आज जापान के साथ भारत की कई अहम मंचों में भागीदारी है, जिसमें सबसे अहम क्वॉड समूह को माना जाता है.

ट्रंप मोदी और शिंजो आबे

इमेज स्रोत, AFP GETTY

क्वॉड

वरिष्ठ पत्रकार और अब अंनता सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची कहती हैं, "बुलेट ट्रेन परियोजना के अलावा किसी दूसरी चीज़ के लिए शिंज़ो आबे को याद किया जाएगा, वो है क्वॉड समूह का गठन. अमेरिकी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत इस समूह पर एक साथ आए. साल 2017 में जब दोबारा से इसे रिवावई किया गया उसमें शिंज़ो आबे की भूमिका अहम रही. यूं तो भारत और जापान के बीच सामरिक सहयोग सबसे ज़्यादा है, लेकिन क्वॉड समूह के ज़रिए जब ये चार देश साथ आए हैं उस वजह से वैक्सीन से लेकर सिक्योरिटी तक हर स्तर पर सहयोग बढ़ा है."

इंद्राणी के मुताबिक़, "शिंज़ो आबे, भारत के 'एक्ट ईस्ट' नीति का एक अहम हिस्सा भी रहे. एक्ट ईस्ट भारत सरकार की विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की तरफ़ भारत अहम सहयोग और साझीदारी की पहल कर रहा है. उसी तरह से जापान और भारत मिल कर पूर्वोत्तर में परियोजनाओं में भी साथ मिलकर लगे हुए हैं. "

इस वजह से भारत-जापान के मधुर संबंधों पर चीन की भी नज़र रहती है. क्वॉड को चीन अपने ख़िलाफ़ एक समूह मानता ही है. भारत और जापान दोनों की सीमाएं चीन से लगती हैं.

जापान मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर राजाराम पांडा के मुताबिक़, जापान की तरफ़ से विभिन्न परियोजनाओं के लिए दिया जाने वाला 'ऑफिशियल डिवेलपमेंट एसिसटेंस' सबसे पहले भारत को ही मिला था. इस बात से देशों के रिश्तों की गहराई का पता चलता है.

हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत ज़्यादा नहीं है.

इस पर प्रोफ़ेसर राजाराम पांडा कहते हैं, "दोनों देश दोस्ती रखते हुए अपने-अपने व्यापारिक हितों को भी सुरक्षित रखना चाहते हैं. इसके लिए दोनों देशों के नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक हित भी जुड़े हैं. व्यापार कम होने के पीछे ये भी एक कारण बताया जाता है."

विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ जापान में तकरीबन 40,000 भारतीय रहते हैं.

शिंजो आबे और मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

जापान में शिंज़ो आबे

जापान-भारत की दोस्ती मज़बूत करने की जितनी पहल उन्होंने की, उतनी ही कोशिश जापान की अर्थव्यवस्था को संभालने की भी की.

जापान के इतिहास में शिंज़ो आबे सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे.

जापान में उनके योगदान के बारे में प्रोफ़ेसर श्रावणी चौधरी कहती हैं, "आबेनॉमिक्स का श्रेय शिंज़ो आबे को दिया जाता है. उन्होंने कई तरह के आर्थिक उपाए सुझाए ताकि अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर लौटे. उसमें से सबसे अहम था महिलाओं की लेबर फोर्स में भागीदारी. लेकिन सच ये भी है कि इसका बहुत फ़ायदा जापान को नहीं मिला."

"सत्ता के आखिरी दिनों में जापान में ओलंपिक खेलों के मेज़बानी करके शिंज़ो आबे चाहते थे कि वो जाते जाते दुनिया को जापान की वो ताकत दोबारा दिखा पाते. चाहे वो जलवायु परिवर्तन की बात हो, या वैकल्पिक ऊर्जा श्रोतों के इस्तेमाल की बात हो. लेकिन कोविड महामारी की वजह से ऐसा उस वक़्त हो ना सका. उनकी तबीयत ठीक नहीं रह रही थी. और उन्होंने पद छोड़ने का फैसला लिया."

प्रोफ़ेसर श्रावणी चौधरी कहती हैं कि शिंज़ो आबे को इसका दुख था.

मोदी और शिंजो आबे

इमेज स्रोत, Getty Images

पीएम मोदी और शिंज़ो आबे की पर्सनल केमेस्ट्री

यूं तो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भी शिंज़ो आबे के साथ अच्छे संबंध रहे. लेकिन माना जाता है कि नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों में अलग केमेस्ट्री देखने को मिली.

साल 2018 में जब प्रधानमंत्री मोदी जापान के दौरे पर थे, जब रात के भोजन के लिए शिंज़ो आबे ने उन्हें अपने पैतृक घर पर ख़ास दावत दी थी. किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को इससे पहले जापान में ये सम्मान हासिल नहीं था. मोदी और शिंज़ो आबे की दोस्ती की इस वजह से भी मिसालें दी जाती हैं. माना जाता है दोनों नेताओं के बीच पर्सनल बॉन्ड भी अच्छा है.

इसकी शुरुआत पीएम मोदी ने साल 2015 में की थी जब वो शिंज़ो आबे को अपने संसदीय क्षेत्र ले गए थे. वहाँ दोनों ने एक साथ गंगा आरती का आंनद लिया था.

मोदी और शिंजो आबे

इमेज स्रोत, Getty Images

काशी वही शहर है जिसे जापान के क्योटो शहर की तर्ज़ पर बसाने का सपना पीएम मोदी ने देखा था. साल 2014 में इस बावत एक समझौते पर दस्तख़त भी किए गए थे जब मोदी जापान दौरे पर गए थे.

क्योटो जापान का धार्मिक ऐतिहासिक शहर है, जहाँ भारत के वाराणसी की तरह ही मंदिर ही मंदिर हैं. क्योटो जापान का स्मार्ट सिटी शहर माना जाता है और इस वजह से भारत में मोदी सरकार के स्मार्ट सिटी मॉडल का रोल मॉडल बन गया है.

वाराणसी के बाद जब साल 2017 में शिंज़ो आबे भारत आए तो पीएम मोदी के साथ वो अहमदाबाद गए. वहाँ बुलेट ट्रेन परियोजना की नींव रखी. भारत जापान की मदद से इस परियोजना को बना रहा है. इसका काम फिलहाल चल रहा है.

साल 2020 में जब ख़राब स्वास्थ्य के कारण शिंज़ो आबे ने अपना पद छोड़ने की घोषणा की तो प्रधानमंत्री मोदी ने एक ट्वीट में अपने दुख का इज़हार किया था.

छोड़िए X पोस्ट, 2
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 2

जुलाई 2021 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में कन्वेंशन सेंटर का उद्धाटन किया था, तब भी वो शिंज़ो आबे को धन्यावाद देना नहीं भूले थे.

इंद्राणी बागची कहती हैं, "साल 1998 के दौर से निकलकर भारत-जापान के रिश्ते 2022 में जिस दौर में पहुँचे हैं, उसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी शिंज़ो आबे रहे हैं. उनका जाना दोनों देशों के रिश्तों के लिए बहुत बड़ा नुक़सान है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)