उत्तर प्रदेश में बीजेपी क्यों नहीं चुन पा रही है अपना अगला अध्यक्ष?

    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के 100 दिन पूरे होने जा रहे हैं. पार्टी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी स्वतंत्र देव सिंह उनकी कैबिनेट में पहले दिन से मंत्री हैं.

उनके मंत्री के बनने के बाद से ही पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए कई नामों की चर्चा शुरू हो गई थी लेकिन केंद्रीय नेतृत्व नए प्रदेश अध्यक्ष बनाने को लेकर किसी जल्दबाज़ी में नज़र नहीं आ रहा है.

भाजपा में परंपरा रही है कि वो किसी भी नेता को संगठन और सरकार दोनों में साथ-साथ पद नहीं देती है. ख़ास तौर से उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेश में जहाँ पर वो सपा और बसपा प्रमुखों पर पार्टी और सरकार दोनों पर काबिज़ होने का आरोप लगाती रही है.

लेकिन अभी की स्थिति एकदम अलग है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ पार्टी पूरी तरह से ताक़तवर है, क्या वहां वो नए प्रदेश अध्यक्ष के नियुक्ति ज़रूरी नहीं समझती या फिर वो एक चेहरे की तलाश में हैं जो उसकी 2024 लोकसभा चुनाव के नज़रिये से सबसे कारगर साबित होगा?

यूपी में लगातार चल रहा है चुनावों का सिलसिला

उत्तर प्रदेश लगातार इलेक्शन मोड में चल रहा है और उससे जुड़े डेवलपमेंट तेज़ रहे है. पहले सरकार का गठन हुआ, उसके बाद राज्य सभा के चुनाव हो गए. इसके बाद एमएलसी चुनाव हुए और उसके बाद आज़मगढ़ और रामपुर में लोकसभा उपचुनाव हो गए और अब राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है.

लेकिन जानकार मानते हैं कि भाजपा पार्टी के काम काज और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर उसका असर नहीं पड़ रहा है.

उत्तर प्रदेश के पत्रकार और भाजपा को लम्बे समय से कवर करते आ रहे आनंद राय कहते है कि, "दो चीजें है, पहले विधान परिषद चुनाव थे, फिर उपचुनाव भी रहा तो पार्टी के लोग ये नहीं चाहते होंगे कि किसी नए अध्यक्ष को लेकर चुनाव लड़े. क्योंकि नए अध्यक्ष को लाने से पुराने संगठन में नए सिरे से चीज़ें बदलती हैं वो ये नहीं चाहते होंगे कि अभी बदलाव हो. और जब चुनाव वगैरह सब बीत चुके हैं तो हो सकता है नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान 18 जुलाई को राष्ट्रपति चुनाव के बाद कर दिया जाए."

वहीं पत्रकार रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "नया-नया चुनाव हुआ है, अभी पार्टी जश्न के माहौल में है, आनंद के माहौल में है. स्वतंत्र देव सिंह मौजूदा अध्यक्ष हैं, उनसे काम चला लिया जा रहा है. पार्टी का संगठन अपने कार्यक्रम कर ही रहा है. मुझे लगता है जब सरकार के 100 दिन पूरे हो जायेंगे तब नए प्रदेश अध्यक्ष की ओर ध्यान दिया जाएगा."

क्या पार्टी में अध्यक्ष पद के नामों को लेकर मतभेद है या फिर केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश की कमान अपने हाथ में ही रखना चाहता है, और क्या इसी वजह से फ़ैसले में देरी हो रही है? इस बारे में पत्रकार आनंद राय कहते हैं, "संगठन में इस तरह की तमाम चर्चाएं और अटकलें लगाई जाती हैं. ये सब चीज़ें अटकलें ही होती हैं बाकी मुख्य लक्ष्य तो उनका एक ही है. मतभेदों और खींचतान को लेकर ना तो किसी का अधिकृत बयान आ सकता है और ना ही कोई बोलेगा. लेकिन संगठन और सरकार दोनों का समन्वय भारतीय जनता पार्टी में दिखता है. ये हमेशा से उनकी कोशिश रहती है कि संगठन और सरकार के समन्वय से ही चुनाव जीतें."

क्या ब्राह्मण-ओबीसी चेहरों को ही बनाया जा रहा प्रदेश अध्यक्ष?

2014 का लोकसभा चुनाव पार्टी ने पश्चिम के बड़े नेता लक्ष्मीकांत बाजपेयी की अध्यक्षता में जीता. और 2019 का लोक सभा चुनाव महेंद्र नाथ पांडेय के नेतृत्व में जो अब केंद्र में मंत्री हैं. दोनों ही पार्टी के यूपी में बड़े ब्राह्मण नेता हैं.

पार्टी ने 2017 का विधान सभा चुनाव केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में जीता और 2022 का स्वतंत्र देव सिंह के नेतृत्व में. दोनों ही पार्टी के प्रमुख ओबीसी चेहरों में हैं.

लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा का फ़िलहाल फार्मूला ब्राह्मण नेताओं के नेतृत्व सौंपने का रहा है. 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले केसरी नाथ त्रिपाठी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. 2009 में रमापति राम त्रिपाठी को. 2014 में लक्ष्मीकांत बाजपेयी और 2019 में महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

तो क्या लोकसभा में ब्राह्मण और विधान सभा में ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में चुनाव लड़ाने के पीछे पार्टी की कोई रणनीति है या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ है? इस बारे में पत्रकार आनंद राय कहते हैं, "लोकसभा का दायरा थोड़ा बड़ा होता है और विधानसभा में पिछड़ी जातियों और उनके वोट का ज़्यादा महत्व होता है. ऐसा कह सकते हैं कि चुनाव जीतने के लिए इनका ये समीकरण अपने ढंग से दिखाते हैं. भाजपा का एक नारा भी तो है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया है, कि सबका साथ सबका विकास और सबका प्रयास भी अब उसमें जोड़ लिया है."

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी भी मानते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनाना पार्टी की प्राथमिकता नहीं है. वो कहते हैं कि भाजपा अपनी नियुक्तियों से संतुलन बनाने की कोशिश करती है, "क्योंकि अभी अपर कास्ट मुख्यमंत्री हैं, तो कई बार यह होता है कि अगर मुख्यमंत्री अपर कास्ट का है तो पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ी जाति से हो."

एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भाजपा मायावती की राजनीतिक कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने के मकसद से एक दलित चेहरे को पार्टी का यूपी अध्यक्ष बना सकती है? यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती की निष्क्रियता वाली इमेज के चलते यह बात फैल गयी कि उनका कोर 'जाटव वोटर' भी उन्हें छोड़कर बीजेपी और एसपी में चला गया. बीएसपी का वोट प्रतिशत 19% से घटकर 12% पर आ गया.

तो क्या भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के पद के साथ कोई नया सोशल इंजीनियरिंग का एक्सपेरिमेंट कर सकती है? इस बारे में पत्रकार रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "पार्टी ने एक आदिवासी महिला को देश का राष्ट्रपति उम्मीदवार बना बड़ा संदेश देने की कोशिश की है और अपने आप में एक बड़ा क़दम है. राज्य स्तर पर भी पार्टी से छन कर ऐसी ख़बरें आ रही हैं किसी दलित को प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी भी मिल सकती है."

लेकिन इस बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि, "अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है लेकिन यह बात ज़रूर है कि बैलेंस बना कर चलते हैं. हो सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष कोई बैकवर्ड हो."

किन लोगों के नाम हैं चर्चा में?

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि जब सरकार प्रदेश में सत्ता में है तो फिर प्रदेश अध्यक्ष पद का कोई ख़ास महत्व नहीं रह जाता है. वो कहते हैं, "यहाँ पर सारा काम संगठन मंत्री सुनील बंसल देखते हैं. तो पार्टी अध्यक्ष स्वतंत्र देव थे भी तो भी उनके होने न होने का कोई बहुत मतलब नहीं था. जब सरकार होती है तो सारे काम मुख्यमंत्री देखते हैं या पार्टी के जो महामंत्री हैं वो देख रहे हैं. तो अध्यक्ष का कोई बहुत अलग रोल है नहीं."

रामदत्त त्रिपाठी के मुताबिक जब पार्टी सत्ता में नहीं होती है तब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका ज़्यादा होती है.

लेकिन अगर पार्टी किसी दलित को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला करती हैं तो उसमे पार्टी के इटावा से सांसद राम शंकर कठेरिया का नाम सबसे आगे हो सकते हैं. वो राष्ट्रीय अनुसूचित जाती जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं और आगरा के रहने वाले हैं और वहां से सांसद भी रह चुके हैं. वो 2014 से 2016 तक केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री भी रह चुके हैं. पार्टी पहले ही बेबी रानी मौर्य और असीम अरुण को सरकार में शामिल करके दलित वोटरों को संदेश दे चुकी है.

पत्रकार रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "आगरा से कठेरिया का नाम आ रहा है. कन्नौज के सांसद सुब्रत पाठक का भी नाम आ रहा है. कुछ उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री और मथुरा से विधायक श्रीकांत शर्मा का भी नाम ले रहे हैं." श्रीकांत शर्मा को इस बार योगी कैबिनेट में जगह नहीं मिली है. इसलिए उन्हें कोई अहम संगठात्मक ज़िम्मेदारी मिलने की मीडिया में काफी चर्चा है.

लेकिन रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "यह सभी नाम हवा में हैं. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने क्या तय कर रखा है यह किसी को पता नहीं है."

क्या पार्टी प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से कोई संदेश देने की कोशिश करेगी? इसके बारे में पत्रकार रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "आप देखिए 2017 के चुनावों में उन्होंने एक बैकवर्ड नेता केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बना कर संदेश देने की कोशिश की. केशव मौर्य ने अपने आपको बैकवर्ड नेता के रूप में स्थापित किया है. शायद ऐसे ही किसी संदेश देने की कोशिशों के चलते फ़ैसले में देरी हो रही है."

कैसे लिए जाते हैं भाजपा में फ़ैसले?

2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में 10 सीट मिली थी और 22.2% वोट शेयर था. 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 10 सीट मिली, लेकिन वोट शेयर घटकर 17.5% पर आ गया लेकिन 2014 में बीजेपी ने कमबैक किया और पार्टी को यूपी में 71 सीटें मिली और वोट शेयर बढ़कर 42.6% हो गया. 2019 में बीजेपी की सीटें 71 से घटकर 62 पर आ गई लेकिन वोट शेयर 50% तक पहुंच गया.

ज़ाहिर है कि पार्टी प्रदेश के संगठन की कमान ऐसे ही शख्स के हाथ में देने की कोशिश करेगी जो इस ट्रेंड को बनाए रखे.

कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नई बीजेपी में फ़ैसला लेने का तरीका सेंट्रलाइज्ड हो गया है. नीचे स्तर पर चर्चा होती है, सुझाव आते हैं, लेकिन फ़ैसला अंततः केंद्रीय नेतृत्व करता है.

इसका जिक्र करते हुए रतिभान त्रिपाठी कहते हैं, "किसी भी पार्टी की चयन प्रक्रिया यह होती है कि वो लोकल फीडबैक और शीर्ष नेतृत्व के मंथन के निचोड़ से जो निककता है वही अंतिम निष्कर्ष होता है. मुझे लगता है कि पार्टी नीचे के फीडबैक को इग्नोर नहीं कर पाएगी, क्योंकि उसे अगला चुनाव जीतना है. चाहे वो मुख्यमंत्री हों या उपमुख्यमंत्री हों, इन सब ने यह कहना शुरू कर दिया है कि हम अगले लोकसभा में 80 की 80 सीटें जीतेंगे."

देरी के बारे में क्या है भाजपा का कहना?

बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के चयन में हो रही देरी को लेकर कहा कि, "भारतीय जनता पार्टी एक कैडर बेस्ड आर्गेनाईजेशन हैं. संगठनात्मक कार्यक्रम अनवरत चलते रहते हैं चूंकि पार्टी ने अभी हमने दो उपचुनाव लोकसभा के महत्वपूर्ण उपचुनाव पर हमारा फोकस था. पार्टी का फोकस इस समय राष्ट्रपति चुनाव पर है और यूपी सरकार के 100 दिन भी पूरे हो रहे हैं. हमें उम्मीद है की संगठन बहुत जल्द इस संदर्भ ने निर्णय करेगा."

क्या स्वतंत्र देव सिंह मंत्री रहते हुए आगे भी पार्टी अध्यक्ष बने रह सकते हैं?

इस बारे में राकेश त्रिपाठी का कहना है कि, "भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक कार्यकाल तीन वर्ष का होता है. यहां एक व्यक्ति के पास एक पद होता है. चूंकि उत्तर प्रदेश में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश सरकार में जल शक्ति मंत्री हैं. तो स्वाभाविक तौर पर प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी और एक विभाग के मंत्री की ज़िम्मेदारी दोनों ज़िम्मेदारियों को साथ निर्वहन करना कठिन कार्य होता है. इसलिए पार्टी इस संदर्भ में निर्णय लेती है कि एक व्यक्ति एक ही पद लेकर के काम करेगा. तो उचित समय पर पार्टी इसका निर्णय करेगी तो सबको सूचना भी देगी."

क्या पार्टी जाति समीकरण को ध्यान में रख कर अध्यक्ष का चयन करेगी? इस बारे में राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "जाति के आधार पर पार्टी में किसी नेता का चयन नहीं होता है. ये विश्लेषकों के देखने का अपना नज़रिया है. पार्टी जिसको उपयुक्त समझती है उसको एक मौक़ा जवाबदेही के नाते देती हैं और यहां ये आजीवन किसी को मिलने वाला पद नहीं है."

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