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रामपुर और आज़मगढ़ में अखिलेश यादव पर बीजेपी कैसे भारी पड़ी
उत्तर प्रदेश में रामपुर और आज़मगढ़ लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों को बीजेपी की जीत से ज़्यादा समाजवादी पार्टी की हार को अहम माना जा रहा है.
समाजवादी पार्टी का गढ़ मानी जानें वाली दोनों ही सीटों पर बीजेपी की जीत की अहमियत इतनी है कि पीएम मोदी ने अपने ट्वीट में इसका ख़ासतौर पर ज़िक्र किया. इन दोनों सीटों पर प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ खुद मैदान में उतरे और मंत्रियों को भी प्रचार में लगाया.
पीएम मोदी ने नतीजों के बाद कहा, "आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में जीत ऐतिहासिक है. ये केंद्र और यूपी में डबल इंजन सरकार के लिए व्यापक पैमाने पर स्वीकृति और समर्थन का संकेत देता है. समर्थन के लिए लोगों का आभारी हूँ. मैं हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रयासों की सराहना करता हूँ."
आज़मगढ़ सीट पर दिनेश लाल यादव निरहुआ ने सपा उम्मीदवार और अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को 8,679 वोटों से हराया. वहीं, रामपुर में बीजेपी के घनश्याम सिंह लोधी ने सपा के आसिम राजा को 42,192 वोटों से हराया है.
आज़मगढ़ सीट सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लोकसभा सदस्यता से इस्तीफ़े के बाद और रामपुर सीट सपा नेता आज़म ख़ान के इस्तीफ़े के बाद खाली हुई थी.
सपा के मुस्लिम यादव समीकरण को देखते हुए आज़मगढ़ में सपा की पकड़ मजबूत मानी जाती रही थी. साल 2014 में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह और 2019 में अखिलेश यादव यहाँ से चुनाव जीते थे. अखिलेश यादव यहाँ से 24 प्रतिशत वोटों के मार्जिन से जीते थे.
वहीं, रामपुर में 58 प्रतिशत मुसलमान आबादी है. मुस्लिम बहुल इस इलाक़े में आज़म ख़ान की ख़ासी पकड़ मानी जाती है. सपा उम्मीदवार आसिम राजा का नाम भी आज़म ख़ान ने आगे बढ़ाया था. आज़म ख़ान चुनाव से पहले ज़मानत पर बाहर आए थे और उन्होंने लोगों से भावनात्मक अपील भी की थी. ऐसे में आसिम राजा के लिए ये एक आसान लड़ाई मानी जा रही थी लेकिन वो बड़े अंतर से हार गए.
आंकड़े और समीकरण सपा के पक्ष में होने के बावजूद भी आख़िर सपा को इन सीटों पर हार का सामना क्यों करना पड़ा.
आज़मगढ़
आज़मगढ़ में दलितों, मुसलमानों और यादवों की लगभग 18 लाख आबादी है. विधानसभा चुनावों में सपा की जीत में एमवाई (मुस्लिम यादव) समीकरण की अहम भूमिका रही है. इस सीट पर भी यही समीकरण बनता दिख रहा था.
ऐसे में सपा की हार के पीछे जानकार बहुजन समाज पार्टी को एक बड़ा कारण मानते हैं. बीजेपी, सपा और बसपा उम्मीदवारों को मिले वोट इसका संकेत देते हैं.
आज़मगढ़ से बीजेपी उम्मीदवार दिनेश लाल यादव को 31,2768 वोट, सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव को 30,3837 वोट और बसपा उम्मीदवार गुड्डू जमाली को 26,6106 वोट मिले हैं.
ऐसे में बीजेपी और सपा उम्मीदवार के बीच जीत का अंतर 8679 था. सपा समर्थक गुड्डू जमाली पर वोट काटने का आरोप लगा रहे हैं क्योंकि इससे मुस्लिम यादव समीकरण प्रभावित हुआ है.
यहाँ सपा और बसपा को प्रमुख प्रतिद्वंद्वी माना जाता था लेकिन निरहुआ के प्रचार के दौरान बड़ी संख्या में युवा देखने को मिले.
बीजेपी को इस बार 34.39 प्रतिशत वोट मिला जो कि पिछली बार 35.1 प्रतिशत था. लेकिन, सपा का वोट प्रतिशत 60.36 से 33.44 प्रतिशत हो गया. ये वोट बसपा की तरफ़ गया है.
मुस्लिम बहुल इलाक़े में सपा की हार के पीछे मुसलमानों में नाराज़गी और सपा प्रमुख की कोशिशों में कमी को भी कारण बताया जा रहा है. यहाँ तक कि आजमगढ़ में सपा उम्मीदवार को लेकर भी उलझन में दिखी. यहां से तीन बार उम्मीदवार बदले गए थे और अंत में धर्मेंद्र यादव तो चुना गया.
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने नतीजों के बाद कहा, ''रामपुर और आज़मगढ़ चुनाव के नतीजे से साफ़ ज़ाहिर होता है कि सपा में भाजपा को हराने की न तो क़ाबिलियत है और ना क़ुव्वत."
साल 2022 विधानसभा के चुनावों के बाद अखिलेश यादव को पार्टी के कुछ मुसलमान नेताओं की नाराज़गी झेलने पड़ी. खुद आज़म खान के निजी सचिव शानू ने खुलेआम एक सभा में उनके ख़िलाफ़ बयान दिए. इससे यह मैसेज जाने लगा कि अखिलेश यादव मुसलामानों से वोट तो मांगते हैं लेकिन उनके बुरे वक़्त में उनके साथ नहीं खड़े होते.
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा, "मुसलमानों को चाहिए कि वो अब अपना क़ीमती वोट ऐसी निकम्मी पार्टियों पर ज़ाया करने के बजाय अपनी ख़ुद की आज़ाद सियासी पहचान बनाए और अपने मुक़द्दर के फ़ैसले ख़ुद करे."
इन उप चुनाव के दौरान अखिलेश यादव कहीं नज़र नहीं आए थे. सपा ने दूसरें ज़िलों गाज़ीपुर और रामपुर से मुसलमान विधायकों को यहां प्रचार के लिए भेजा था लेकिन स्थानीय नेता जमाली को उनसे ज़्यादा समर्थन मिल रहा था. कहीं ना कहीं बाहरी और अंदरूनी उम्मीदवार की भी बहस चल पड़ी थी.
रामपुर
कहा जा रहा है कि आज़म ख़ान की मज़बूत पकड़ वाले रामपुर को सपा ने पूरी तरह से उनके भरोसे छोड़ दिया था.
एक तरह से रामपुर का उपचुनाव आज़म ख़ान के लिए इम्तिहान था. मतदान के दौरान आज़म खान के बेटे और विधायक अब्दुल्ला आज़म ने आरोप लगाए कि रामपुर में प्रशासन लोगों को वोट डालने से रोक रहा है. अब्दुल्ला आज़म ने ट्वीट कर कहा, ''बधाई हो, लोकतंत्र पर ठोको राज भारी. मेरा देश सच में ही बदल गया है.''
अखिलेश यादव ने इस हार के बाद भी ट्वीट किया, "भाजपा के राज में लोकतंत्र की हत्या की क्रोनोलॉजी: नामांकन के समय चीरहरण - नामांकन निरस्त कराने का षड्यंत्र - प्रत्याशियों का दमन - मतदान से रोकने के लिए दल-बल का दुरुपयोग - काउंटिंग में गड़बड़ी - जनप्रतिनिधियों पर दबाव - चुनी सरकारों को तोड़ना. ये है आज़ादी के अमृत काल का कड़वा सच."
बीजेपी रामपुर में भी पूरी ताक़त के साथ उतरी और शीर्ष नेताओं के साथ आक्रामक प्रचार किया. राज्य के कम से कम 16 मंत्री रामपुर में प्रचार के लिए गए. यहाँ बीजेपी का वोट प्रतिशत 42.33 से बढ़कर 51.96 हो गया है और सपा का वोट प्रतिशत 52.69 से घटकर 46 प्रतिशत हो गया है.
सपा की हार के पीछे स्थानीय लोगों का ये भी मानना है कि मुसलमानों ने आसिम रजा को वोट देने में ख़ास दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वो आज़म ख़ान के परिवार से नहीं थे. हालांकि, आज़म ख़ान ने ही आसिम रज़ा को चुना था और उनके लिए प्रचार भी किया था.
जहाँ आज़मगढ़ में बसपा को बड़ा फैक्टर माना जा रहा है वहीं रामपुर में बसपा उम्मीदवार ना होने के बावजूद भी सपा हार गई. जानकारों का मानना है कि यहां बीजेपी को बड़ी तादाद में जाटव समाज का वोट मिला है. रामपुर की लोकसभा सीट पर क़रीब एक लाख जाटव वोटर हैं. जिसमें से 80 हजार और 70 हजार वोट पड़ते हैं.
लोकसभा पर असर
उपचुनाव जीतकर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में हुई अपनी जीत को और मज़बूत कर लिया है. इसका असर आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिल सकता है.
सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी गुरुवार को कहा था, ''डबल इंजन की भाजपा सरकार की आजमगढ़ व रामपुर में डबल जीत प्रदेश की राजनीति में 2024 के चुनाव के लिए दूरगामी संदेश दे रही है. प्रदेश की जनता-जनार्दन का इस संदेश के लिए आभार एवं भाजपा कार्यकर्ताओं का अभिनंदन!''
उपचुनावों में हार के बाद सपा के पास लोकसभा की सिर्फ़ तीन सीटें बची हैं. कहते हैं कि राजनीति में अवधारणा बहुत मायने रखती है. ऐसे में सपा के लिए ये उपचुनाव यूपी पर अपनी पकड़ साबित करने का एक मौका ता. क्योंकि दो बार विधानसभा जीतने वाली सरकार के लिए उपचुनाव हारना उसकी छवि को कमजोर कर सकता था.
लेकिन, फिलहाल विधानसभा के बाद ये दूसरी हार सपा और अखिलेश यादव की छवि पर बड़ी चोट साबित हो सकती है. इसका सीधा असर सपा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा.
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