ऑपरेशन कमबैक: कैसे मोदी और शाह ने डाला था यूपी को वापस बीजेपी की झोली में?

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में उत्तर प्रदेश का चुनाव सब तरह के चुनावों से अलग होता है क्योंकि भारतीय राजनीति की सभी पेचीदगियाँ इस चुनाव में एक साथ दिखाई देती हैं.

23 करोड़ की आबादी वाला ये प्रदेश जनसंख्या के मामले में अफ़्रीका, यूरोप और दक्षिण अमेरिका के किसी भी देश से बड़ा है.

2014 के लोकसभा चुनाव के तीन साल बाद होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सबके दिमाग़ में एक ही सवाल था कि क्या अमित शाह 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम को उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में दोहरा पाएंगे या नहीं?

2017 के विधानसभा चुनाव के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे, उनकी शक्ल अपने पिता से मिलती ज़रूर थी लेकिन अनुभव के मामले में उन्होंने कुछ ही साल पहले शुरुआत की थी.

मुलायम तब तक रिटायरमेंट मोड में आ चुके थे और उनका काफ़ी समय अस्पतालों में बीत रहा था. अखिलेश के मंत्रिमंडल में मौजूद उनके चाचा शिवपाल भतीजे की नेतत्व करने की उनकी क्षमता पर सवाल उठा रहे थे. न सिर्फ़ पार्टी संगठन पर उनकी पूरी पकड़ थी बल्कि वे नौकरीशाही पर भी ख़ासा प्रभाव रखते थे.

अखिलेश के दूसरे चाचा और राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव ज़रूर अखिलेश का साथ दे रहे थे लेकिन परिवार के अंदर चल रही आपसी कलह चुनाव के समय मतदाताओं के सामने एक अच्छा विकल्प देने की समाजवादी पार्टी की क्षमता पर सवालिया निशान लगा रही थी.

मायावती और राहुल गांधी भी कमज़ोर विकेट पर

उधर अपने नेता काँशीराम की तरह मायावती का ज़ोर संगठन बनाने पर नहीं बल्कि हर कीमत पर सत्ता हासिल करने पर था. सफ़ेद कमीज़, मुड़ी तुड़ी पतलून और बिखरे बालों वाले काँशीराम के विपरीत करीने से सिले सलवार सूट पहने और हीरों के टॉप्स और लक्जरी हैंडबैग लिए मायावती एक अलग छवि पेश करती थीं. यही नहीं वो आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोपों का भी सामना कर रही थीं.

1989 के बाद लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस तब तक पूरी तरह से हाशिए पर पहुँच चुकी थी. शुरू में ये आभास देने के बाद कि वो चुनाव प्रचार को गंभीरता से ले रही हैं, प्रियंका गाँधी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए थे.

कांग्रेस के हलकों में कहा जा रहा था कि सोनिया गांधी का मानना था कि प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना देने से भावी कांग्रेस अध्यक्ष बनने की राहुल गांधी की मुहिम उतनी मज़बूत नहीं रह जाएगी.

कांग्रेस ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने के साथ-साथ 'सत्ताइस साल यूपी बेहाल' का नारा भी दिया था.

लेकिन कुछ ही हफ़्तों बाद कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदलते हुए समाजवादी पार्टी से चुनावी गठबंधन कर लिया था. अब उनके पोस्टरों पर नया नारा लिखा जा रहा था 'यूपी को ये साथ पसंद है.'

बीजेपी ने 2014 से ही 2017 के चुनाव की तैयारी शुरू की

बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह के लिए 'मिशन यूपी 2017' की शुरुआत तभी से हो गई थी जब उनकी पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत हासिल की थी.

मई 2014 में चुनाव परिणाम आने के कुछ दिनों बाद उन्होंने संघ परिवार के उभरते हुए सितारे सुनील बंसल को फ़ोन मिलाया था. बंसल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संयुक्त महासचिव हुआ करते थे जिन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह की मदद करने के लिए भेजा गया था.

अमित शाह ने सुनील बंसल से कहा कि 'मैं चाहता हूँ कि आप दोबारा यूपी जाएं और 2017 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दें.'

2014 में उत्तर प्रदेश से रिकार्ड 73 सीटें जीतने के बाद आम धारणा ये थी कि यूपी में बीजेपी की जीत का कारण मोदी लहर था. जहाँ तक संगठन की बात थी, पार्टी अभी भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से कहीं पीछे थी. बीजेपी के असली समर्थक अभी भी शहरों तक ही सिमटे हुए थे.

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बीजेपी का ज़बर्दस्त सदस्यता अभियान

मशहूर पत्रकार राजदीप सरदेसाई अपनी किताब '2019 हाऊ मोदी वन इंडिया' में लिखते हैं, 'शाह को गुजरात में राजनीति के अपने शुरुआती दिनों में ही अंदाज़ा हो गया था कि बीजेपी के राजनीतिक पुनरुत्थान के लिए पंचायतों पर कब्ज़ा करना बहुत ज़रूरी है.

उत्तर प्रदेश में 58000 से अधिक पंचायतें और 7 लाख ग्राम पंचायत सदस्य थे. नवंबर 2014 में हुई बैठक में अमित शाह ने बंसल को ज़िम्मेदारी देते हुए कहा कि मैं चाहता हूँ कि आप अगले तीस दिनों में बीजेपी के एक करोड़ नए सदस्य बनाएँ.

उस समय प्रदेश में बीजेपी के सिर्फ़ 14 लाख सदस्य थे. ये बहुत बड़ा लक्ष्य था. बंसल को मालूम था इसे पूरा कर पाना बहुत मुश्किल होगा लेकिन उन्होंने अमित शाह से कुछ नहीं कहा.

बीजेपी ने कुछ दिनों पहले ही महत्वाकांक्षी देशव्यापी सदस्यता अभियान शुरू किया था जिसमें कहा गया था कि आप एक ख़ास नंबर पर मिस्ड कॉल देकर पार्टी के सदस्य बन सकते हैं.

बंसल ने तय किया कि बूथ स्तर पर सदस्यों की सक्रियता बढ़ाने का एकमात्र रास्ता है कि लोगों के बीच बीजेपी की सदस्यता लेने का अभियान चलाया जाए.

उपेक्षित वर्गों को साथ लेने की बीजेपी की मुहिम

कुल एक लाख बीस हज़ार बूथों की शिनाख़्त गई और बीजेपी बूथ कमेटियों से कहा गया कि वो क्षेत्र में कम से कम 100 नए सदस्य बनाएं.

लखनऊ में चौबीसों घंटे काम करने वाला एक कॉल सेंटर बनाया गया जिसको नए सदस्यों को सत्यापित करने और उनसे संपर्क में रहने की ज़िम्मेदारी दी गई.

तब तक बीजेपी उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ एक शहरी पार्टी थी लेकिन मज़बूती से पंचायत चुनावों में भाग लेने के बाद पार्टी में ग्रामीण नेतृत्व ने भी अपने पैर जमा लिए. इस राजनीतिक विस्तार की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी सोशल इंजीनयरिंग का बेहतरीन इस्तेमाल.

अनिर्बान गांगुली और शिवानंद द्विवेदी अपनी किताब 'अमित शाह एंड द मार्च ऑफ़ बीजेपी' में लिखते हैं, 'अमित शाह ने नॉन यादव ओबीसी और नॉन जाटव दलितों पर काम करने का फ़ैसला किया. इनकी तादाद तो बहुत थी लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत उसकी तुलना में बहुत कम थी.अमित शाह उत्तर प्रदेश की जाति राजनीति का बारीकी से अध्ययन करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे थे कि बीजेपी के लिए बेहतरीन अवसर तब होगा जब वो अपने परंपरागत ऊँची जातियों के आधार से निकलकर उन पिछड़ी जातियों और दलित समूहों के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करें जिन्हें समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने टिकट नहीं दिए थे.'

समाजवादी पार्टी ने यादवों और मुसलमानों का गठबंधन ज़रूर बना लिया था लेकिन यादव उत्तर प्रदेश की आबादी का सिर्फ़ 9 फ़ीसदी थे.

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अमित शाह का रणनीतिक बयान

उत्तर प्रदेश बीजेपी का एक और निशाना थे गैर-जाटव दलित जो प्रदेश की 21 फ़ीसदी दलित आबादी का 50 फ़ीसदी थे लेकिन उन्हें जाटव बहुल बहुजन समाज पार्टी में उनकी तादाद के हिसाब से महत्व नहीं मिला था.

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में अनुसूचित और पिछड़ी जाति सम्मेलन किए.

अनिर्बान गाँगुली और शिवानंद द्विवेदी लिखते हैं, 'अमित शाह ने बीस से अधिक जातियों बघेल, चौहान, राजभर, मौर्य, माली और निषाद को महत्व देने का फ़ैसला किया और एक रणनीति के तहत कम मतदाता बेस वाले अनुप्रिया पटेल के अपना दल से चुनावी गठबंधन किया.'

31 मार्च, 2015 तक बीजेपी के पास 1 करोड़ 13 लाख नए सदस्यों का डेटा बैंक पहुंच चुका था जिनमें से 40 लाख लोग पार्टी के काम में सीधे तौर से जुड़े हुए थे. अब तक बीजेपी के पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी को टक्कर देने लगी थी.

वर्ष 2016 के शुरुआती दिनों से ही अमित शाह न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश के चुनाव पर नज़र रख रहे थे बल्कि हर महीने कम-से-कम एक हफ़्ता राज्य में बिता रहे थे. चुनाव प्रचार के शुरुआती दिनों में जब अमित शाह से पूछा गया कि प्रदेश में उनका मुख्य प्रतिद्वंदी कौन है, उन्होंने जानबूझ कर उसका कोई जवाब नहीं दिया.

अनिर्बान गाँगुली और शिवानंद द्विवेदी लिखते हैं, 'बाद के चरणों में जब पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में वोट डाले जाने लगे तो अचानक एक दिन संवाददाताओं से बात करते हुए शाह ने कहा कि बीजेपी का सीधा मुकाबला बीएसपी से है. तब तक पश्चिम उत्तर प्रदेश में वोट डाले जा चुके थे. शाह का ये बयान बीजेपी विरोधी मतदाताओं में भ्राँति फैलाने में सफल रहा.'

नरेंद्र मोदी का धारदार चुनाव प्रचार

इस चुनाव प्रबंधन पिरामिड के सबसे ऊपर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे. जैसे ही उन्होंने वाराणसी से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया उन्हें 'विकास पुरुष' के रूप में री-पैकेज किया गया.

अगर 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कथित घोटालों को अपने निशाने पर लिया था, 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती उनके रडार पर थे.

मशहूर पत्रकार रुचिर शर्मा अपनी किताब 'डेमोक्रेसी ऑन द रोड' में लिखते हैं, 'हालाँकि उत्तर प्रदेश नए मुख्यमंत्री के लिए वोट डाल रहा था लेकिन नरेंद्र मोदी ने राज्य के चुनाव को अपने नेतृत्व के बारे में जनमत संग्रह के रूप में बदल दिया था. बीजेपी ने मुख्यमंत्री के अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की. उन्होंने राज्य के लोगों के बीजेपी को वोट देने के लिए कहा ताकि मोदी उत्तर प्रदेश का नया नेता चुन सकें.'

उनके नोटबंदी के फ़ैसले का उम्मीद के मुताबिक नतीजा न आने के बावजूद वो ये दिखाने में सफल हो गए थे कि नोटबंदी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में उनका मुख्य हथियार है.

एक भाषण में अमित शाह ने कहा था, 'भाइयों और बहनों, क्या किसी गरीब या मध्यम वर्ग के पास काला धन होता है? मैं जानता हूँ 500 ओर 1000 के नोटों को बंद करने से आपको तो असुविधा हुई है लेकिन कुछ बेइमान लोगों की ज़िदगी तबाह हो गई ऐसा दंड मोदी ने उनको दिया है.'

राजदीप सरदेसाई लिखते हैं, '2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मोदी ये नेरेटिव गढ़ पाने में कामयाब हो गए कि नोटबंदी एक क्लास वार है. उन्होंने अपने आपको एक देसी रोबिन हुड के तौर पर पेश किया जो देश के वंचित लोगों के लिए खड़ा हुआ है.'

2014 की जीत कोई तुक्का नहीं

जब 11 मार्च, 2017 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम की घोषणा हुई तो कई लोग बीजेपी की जीत के परिमाण से आश्चर्यचकित रह गए. बीजेपी को विधानसभा की 403 सीटों में रिकार्ड 312 सीटें मिली जबकि समाजवादी पार्टी सिर्फ़ 47 सीटें जीत सकी.

बहुजन समाज पार्टी 19 सीटें जीत कर तीसरे नंबर पर आई और कांग्रेस को सिर्फ़ 7 सीटों से संतोष करना पड़ा. बीजेपी को 41.5 फ़ीसदी वोट मिले. मुस्लिम बहुल इलाकों जैसे देवबंद, बरेली, मुरादाबाद और बिजनौर में बीजेपी की जीत हुई वो भी तब जब उन्होंने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी नंबर 1 ने ये सिद्ध कर दिया था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हुई उनकी जीत कोई तुक्का नहीं थी.

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