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सिमरनजीत सिंह मान की जीत को 'ख़तरनाक संकेत' क्यों माना जा रहा- प्रेस रिव्यू
पंजाब के संगरूर लोकसभा क्षेत्र से शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के 77 वर्षीय अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान की जीत को पंजाब में एक बार फिर से अकाली राजनीति के उभार की आशंका के तौर पर देखा जा रहा है.
2019 में इस लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के भगवंत सिंह मान जीते थे लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री बनने के बाद यहाँ उपचुनाव कराना पड़ा.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने आज सिमरनजीत सिंह की जीत पर एक न्यूज़ विश्लेषण प्रकाशित किया है. आज की प्रेस रिव्यू में पहली ख़बर के तौर पर इसी विश्लेषण को पढ़िए.
सिमरनजीत सिंह मानकी पहचान एक कट्टर सिख नेता की है, जो खालिस्तान की बात अक्सर करते हैं. खालिस्तान सिखों के लिए एक संप्रभु राष्ट्र की परिकल्पना है. पिछले 23 सालों में सिमरनजीत सिंह की यह पहली चुनावी जीत है. उनकी जीत से ऐसी आशंका है कि एक बार फिर से अतिवादी सिख राजनीति को हवा मिल सकती है.
पंजाब की राजनीति पर नज़र रखने वाले पर्यवेक्षकों का कहना है कि सिमरनजीत सिंह की जीत पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार के लिए एक चुनौती का रूप ले सकती है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि पंजाब में आप की सरकार के अभी तीन महीने ही हुए हैं और प्रदेश में अतिवादी राजनीति को रोकने के लिए विकास और सुशासन की राजनीति पर केंद्रित रखना होगा.
1980 के मध्य और 1990 के शुरुआती दशक में खालिस्तान को लेकर त्रासदीपूर्ण चरमपंथ का सिलसिला शुरू हुआ था लेकिन उसके बाद इस आंदोलन का लोकप्रिय समर्थन कम होता गया. हालांकि हाल के दिनों में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में खालिस्तान को लेकर छिटपुट घटनाएं हुई हैं और इसे फिर से ज़िंदा करने की बहस हो रही है.
सिमरनजीत सिंह तीसरी बार सांसद बने हैं. इन्होंने 1994 में अपनी पार्टी बनाई थी. जून 1984 में इन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में आईपीएस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था. इन्हीं सालों में इन्हें कई मामलों में गिरफ़्तार किया गया था. इन मामलों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या भी शामिल थी. सिमरनजीत सिंह ने पाँच साल की जेल की सज़ा भी काटी थी.
संगरूर लोकसभा के उपचुनाव में शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) ने भावनात्मक मुद्दों को जमकर उछाला. इनमें सिख क़ैदियों को रिहा करने की मांग प्राथमिकता से रखी गई. मई महीने में ही सिमरनजीत सिंह ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीस) की बैठक में खालिस्तान के साथ सिख क़ैदियों की रिहाई की मांग की थी. सिमरनजीत सिंह ने एसजीपीसी में खालिस्तान समर्थक प्रस्ताव पास करने की मांग की थी. उनका दावा है कि 1946 में इसे सर्वसम्मति से पास किया गया था.
चंडीगढ़ में इंस्टिट्यूट फोर डिवेलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक डॉ प्रमोद कुमार ने द हिन्दू से कहा, ''सिमरनजीत सिंह मान की जीत से पता चलता है कि अतिवादी धड़ों की अकाली राजनीति फिर से ज़ोर पकड़ रही है. अकाली राजनीति में पंथिक (सिख), किसान और प्रांतीय नज़रिया रखने वालों का ज़ोर है. चुनावी नतीजे से साफ़ है कि एसएडी (अमृतसर) ने संगरूर के सभी तीन विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की है.''
ख़तरनाक संकेत
डॉ कुमार कहते हैं कि पंजाब में अतिवाद को लेकर जो दबी हुई लहर है, उसे आम आदमी पार्टी की सरकार अपने वादों को पूरा कर और सुशासन के ज़रिए सामना कर सकती है.
डॉ प्रमोद कुमार कहते हैं, ''आप अभी तक विकास और सुशासन के मोर्चे पर नाकाम रही है. अतिवाद की राजनीति का सामना करना है तो आप की सरकार को मुख्य एजेंडे में विकास और सुशासन रखना होगा. इसके अलावा पंजाबी अस्मिता के विमर्श को मज़बूत करना होगा. शिरोमणि अकाली दल की उदार राजनीति कमज़ोर पड़ी है और उग्र अकाली राजनीति फिर से पाँव पसार रही है और यह ख़तरनाक संकेत है.''
प्रदेश के पूर्व डीजीपी शशिकांत ने कहा कि मान की जीत से अतिवादियों के बीच एक संदेश गया है कि खालिस्तान का नैरेटिव गति पकड़ सकता है. उनका कहना है कि पिछले कुछ समय में पंजाब में पाकिस्तान से ड्रोन, पैसे और विस्फोटक आए हैं.
गिग कामगार आठ साल में तीन गुना बढ़कर 2.35 करोड़ हो जाएंगे
हिन्दी अख़बार दैनिक भास्कर के पहले पन्ने पर एक ख़बर है- गिग वर्कर्स 8 साल में तीन गुना बढ़कर 2.35 करोड़ हो जाएंगे. अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, देश में गिग वर्कर्स या कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले अस्थायी वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है.
वर्ष 2029-30 तक यानी अगले आठ साल में इनकी संख्या 3 गुना से ज़्यादा बढ़कर 2.35 करोड़ तक पहुँच जाने का अनुमान है. वर्ष 2021-22 में देश की गिग इकोनॉमी से लगभग 77 लाख लोग जुड़े हुए थे. यह आँकड़ा ग़ैर-कृषि कामों से जुड़े हुए कामगारों का लगभग 2.6%, जबकि देश की कुल वर्कफ़ोर्स का 1.5% है.
वहीं कोरोना महामारी से पहले 2019-20 में देश में 68 लाख लोग गिग इकोनॉमी से जुड़े हुए थे. यह आँकड़ा ग़ैर-कृषि कामों से जुड़े हुए कामगारों का लगभग 2.4%, जबकि देश की कुल वर्कफ़ोर्स का 1.3% था. नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 8 साल में भारत में ग़ैर-कृषि कार्यों से जुड़े कामगारों के 6.7% लोग गिग इकोनॉमी से जुड़ जाएंगे.
कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं गिग वर्कर
गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर काम करते हैं. काम करने वाले और कराने वाले के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध नहीं होता है. गिग वर्कर्स में फ्रीलान्सर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म वर्कर्स, ऑन-कॉल वर्कर्स और अस्थायी कॉन्ट्रेक्ट वर्कर्स आते हैं.
वर्तमान में 47% गिग वर्कर मीडियम स्किल जॉब में हैं. 22% हाई स्किल और 31% लो स्किल जॉब में हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि रुझान दिखाता है कि मीडियम स्किल जॉब में वर्कर्स की संख्या धीरे-धीरे घट रही है और लो स्किल और हाई स्किल वर्कर्स की संख्या में बढ़ोतरी हे रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 26.6 लाख गिग वर्कर रीटेल व्यापार और बिक्री में, 13 लाख ट्रांसपोर्ट सेक्टर में, 6.2 लाख मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में और 6.3 लाख फाइनेंस और इंश्योरेंस सेक्टर से जुड़े हुए हैं. 2019-20 में शिक्षा क्षेत्र से 66,000 लोग जुड़े हुए थे. 2021-22 में इनकी संख्या बढ़कर एक लाख के पार निकल गई.
जेएमएम ने किया द्रौपदी मुर्मू का समर्थन
दैनिक भास्कर की ही एक और ख़बर के अनुसार, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) एनडीए के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देगा. दैनिक भास्कर के पहले पन्ने पर यह ख़बर छपी है. गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात के दौरान झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने उन्हें अपने निर्णय से अवगत कराया.
सोरेन की गृह मंत्री से मुलाक़ात ऐसे वक़्त हुई है, जब मंगलवार को खनन में अनियमितता के आरोप को लेकर मुख्यमंत्री सोरेन को चुनाव आयोग के सामने ख़ुद या वकील के माध्यम से पेश होकर पक्ष रखना है. द्रौपदी मुर्मू संथाल आदिवासी हैं और हेमंत सोरेन भी संथाल ही हैं. हेमंत का जनाधार झारखंड में आदिवासियों के बीच काफ़ी मज़बूत है.
पहले से ही कहा जा रहा था कि हेमंत ने भले कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई है लेकिन वह द्रौपदी मुर्मू के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते हैं. द्रौपदी मुर्मू अगर राष्ट्रपति बनती हैं तो पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति होंगी.
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