सिमरनजीत सिंह को जानिए, जिन्होंने भगवंत मान की सीट पर आप को हराया

पंजाब में आम आदमी पार्टी को सत्ता सौंपने के कुछ महीने बाद ही जनता ने संगरूर लोकसभा उपचुनाव में आम आदमी पार्टी को क़रारी मात दी है. संगरूर लोकसभा उपचुनाव 23 जून को हुआ था और रविवार को इसके नतीजे घोषित किए गए.

शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान ने 2.53 लाख वोट हासिल कर 2.47 लाख वोट पाने वाले आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार गुरमैल सिंह को हरा दिया है.

आम आदमी पार्टी के लिए ये हार इसलिए भी बड़ा झटका है क्योंकि पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान इस सीट से सांसद थे.

उनके विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही ये सीट खाली हुई थी. भगवंत सिंह मान और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने इस सीट पर जमकर प्रचार किया था.

भगवंत मान ने संगरूर लोकसभा सीट को साल 2014 में 2.11 लाख वोटों के अंतर से और 2019 लोकसभा चुनावों में 1.10 लाख वोटों के अंतर से जीता था.

इस साल फ़रवरी में राज्य में हुए विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने कुल 117 में से 92 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था. चुनावी नतीजों के बाद ये कहा गया था कि पंजाब के लोग पांरपरिक रूप से राज्य में सत्ता चलाती रही पार्टियों की जगह नए दल को मौक़ा देना चाहते थे.

पिछले कुछ महीनों में आप के लिए क्या ग़लत हो रहा है?

पंजाब में ये धारणा बन रही है कि पंजाब सरकार को दिल्ली से नियंत्रित किया जा रहा है और यही आम आदमी पार्टी के लिए भारी पड़ रहा है.

इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिवेलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं कि आम आदमी पार्टी को अपने शासन के मॉडल को पंजाब आधारित बनाना होगा.

डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं कि आमतौर पर सत्ताधारी दल ही उपचुनाव जीत लेता है. हालांकि बीते तीन महीनों में पंजाब में आम आदमी पार्टी की स्वीकार्यता गिर रही है.

पार्टी को उस सीट पर हार मिली है, जिसे मौजूदा मुख्यमंत्री ने खाली किया है.

डॉ. प्रमोद कहते हैं कि आप के पास मज़बूत वोटर तो है लेकिन राजनीतकि मशीनरी नहीं है. उनके विधायकों के पास कोई स्वायत्तता नहीं है और जनता से उनका संवाद कमज़ोर है.

पंजाब में एक और बड़ा कारण लगातार ख़राब हो रही क़ानून-व्यवस्था है. सिद्धू मूसेवाला की हत्या ने पंजाब की क़ानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं कि विधानसभा चुनावों के दौरान महिलाओं और युवाओं ने आप के लिए वोट किया था. लेकिन इस बार युवाओं ने सिमरनजीत सिंह मान के समर्थन में मतदान किया.

पहले किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन (उग्राहां) भी आम आदमी पार्टी का समर्थन करती रही थी लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस बार बीकेयू ने भी आप के पीछे से अपने हाथ खींच लिए.

जगतार सिंह कहते हैं कि ये आम लोगों के बीच ये धारणा भी बढ़ रही है कि पंजाब की सरकार एक कठपुतली सरकार है, जिसे दिल्ली से नियंत्रित किया जा रहा है.

सिमरनजीत सिंह मान कौन हैं?

1945 में शिमला में पैदा हुए सिमरनजीत सिंह मान एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं. उन्होंने ऑपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में सेवा से त्यागपत्र दे दिया था.

उस समय सिमरनजीत सिंह मान फ़रीदकोट के एसपी थे. उन्होंने अपना इस्तीफ़ा तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को सौंपा था. सिमरनजीत सिंह मान खालिस्तान समर्थक हैं और लोकतांत्रिक तरीक़े से खालिस्तान की स्थापना की मांग करते रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह के मुताबिक़ इस्तीफ़ा देने के बाद सिमरनजीत सिंह मान अंडरग्राउंड हो गए थे. दरअसल, सिमरनजीत मान के ख़िलाफ़ वॉरंट जारी किया गया था.

बाद में सिमरनजीत सिंह मान को गिरफ़्तार भी किया गया था. उनका नाम इंदिरा गांधी हत्याकांड में भी आया था. खालिस्तान से जुड़े कई मामलों में भी सिमरनजीत सिंह मान का नाम आया था.

संगरूर लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद जनता का शुक्रिया अदा करते हुए सिमरनजीत सिंह मान ने खालिस्तान का भी ज़िक्र किया.

शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान ने संगरूर लोकसभा सीट जीतने के बाद अपनी जीत का श्रेय अपने कार्यकर्ताओं और जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तालीम की जीत को दिया है.

सिमरनजीत सिंह मान ने आगे कहा कि जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने शांतिपूर्ण संघर्ष के ज़रिए जीने का जो रास्ता बताया था, यह उसी की जीत है.

उन्होंने दावा किया, ''हमने कांग्रेस, अकाली दल और आप जैसी सभी प्रमुख पार्टियों की कमर तोड़ दी है. और इस जीत का असर विश्व राजनीति पर भी पड़ेगा. लंबे अरसे के बाद उनकी पार्टी की जीत हुई है. लोगों का साहस ऊंचा है और वे चुप नहीं बैठेंगे.''

पहले भी सांसद रह चुके हैं

सिमरनजीत सिंह मान जब जेल में बंद थे, तब उन्होंने 1989 लोकसभा चुनाव 4.5 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीता था.

उन्होंने अपनी कृपाण के बिना संसद भवन में दाख़िल होने से इनकार कर दिया था और इसके विरोध में त्यागपत्र दे दिया था. 1999 में वो फिर से लोकसभा के लिए चुने गए थे. उसके बाद से वो कोई चुनाव नहीं जीत सके थे.

77 वर्षीय सिमरनजीत सिंह मान फतेहगढ़ साहिब ज़िले के तलानिया गांव के रहने वाले हैं. उनकी पत्नी का नाम गीतिंदर कौर है. सिमरनजीत सिंह मान ने पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के अधीन एक सरकारी कॉलेज से 1966 में बीए ऑनर्स तक की पढ़ाई की है. वह 1989 में तरनतारन और 1999 में संगरूर से सांसद रह चुके हैं.

इसके अलावा, 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में, सिमरनजीत सिंह अमरगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे और आम आदमी पार्टी के जसवंत सिंह गज्जन माजरा से हार गए थे.

चुनाव आयोग में दाखिल हलफनामे के मुताबिक़, सिमरनजीत सिंह मान के पास 60 लाख रुपये से अधिक की चल संपत्ति और चार करोड़ 30 लाख रुपये से अधिक की अचल संपत्ति है और उन पर 18 लाख रुपये से अधिक का क़र्ज़ है. उनके ख़िलाफ़ फरीदकोट के बाजाखाना में 2021 में बरगाड़ी गांव में धरना देने का मामला दर्ज है.

1984 से 1989 तक जेल में रहे

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह के मुताबिक़ सिमरनजीत सिंह मान 1984 से 1989 तक जेल में रहे और जेल में रहकर ही 1989 का लोकसभा चुनाव लड़ा. ये चुनाव मान ने साढ़े चार लाख से अधिक वोटों से जीता था.

उस साल पंजाब में सबसे बड़ी जीत सिमरनजीत सिंह मान को ही मिली थी. इस चुनाव में मान की पार्टी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (सिमरनजीत सिंह मान) ने पंजाब में सात लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. इनमें लुधियाना, रोपड़, फरीदकोट, फिरोजपुर, तरनतारन, संगरूर और बठिंडा शामिल थे.

जगतार सिंह के मुताबिक़ इसके बाद सिमरनजीत सिंह मान यूनाइटेड अकाली दल के संयुक्त अध्यक्ष बने, लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चला और अकाली दल भंग हो गया. इसके बाद ही मान ने अपनी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) बनाई. मान ने 1999 में संगरूर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता. हालांकि 1999 के बाद से मान कोई चुनाव नहीं जीत सके थे.

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