कोरोना के इलाज के लिए नहीं मिली बीमे की रकम, लोगों को लेना पड़ा क़र्ज़

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    • Author, अर्जुन परमार
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा

"अप्रैल 2021 में, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान, मैंने कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए एक लाख रुपए का बिल चुकाया था. मेरे पास मेडिक्लेम इंश्योरेंस पॉलिसी थी. मैं निश्चिंत था कि मुझे बिल का पैसा वापस मिल जाएगा, लेकिन कंपनी ने मेरा सिर्फ़ आधा क्लेम ही मंज़ूर किया."

"मैंने बाक़ी पैसा वापस पाने के लिए मेडिकल लोकपाल को शिकायत दी. लेकिन एक साल भी इस मामले में कुछ नहीं हो सका है."

ये अहमदाबाद में रहने वाले रिटायर कर्मचारी भदरेश शाह की कहानी है. उन्होंने कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हुई वित्तीय परेशानियों को लेकर बीबीसी से बात की.

वो कहते हैं, "उस वक़्त मुझे इलाज मिल सका ये अच्छी बात है. लेकिन मुझे बहुत पैसा ख़र्च करना पड़ा. इंश्योरेंस कंपनी ने मेरा क्लेम नहीं चुकाया है, जिसकी वजह से मुझे बहुत परेशानियां हो रही हैं. मेरे मामले में अभी तक कोई फ़ैसला नहीं हो सका है."

भदरेश शाह पांच लाख के बीमा कवर के लिए एक मेडिक्लेम कंपनी को पिछले सात सालों से प्रीमियम चुका रहे थे. उन्हें ये भरोसा था कि मेडिक्लेम ज़रूरत में उनके काम आएगा. लेकिन जैसी उन्हें उम्मीद थी, मेडिक्लेम से उन्हें वैसी राहत नहीं मिली.

विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना महामारी के दौरान बहुत से मेडिक्लेम ग्राहकों को इस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा है.

एक आरटीआई आवेदन के तहत भारत के बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण से भी ऐसी ही जानकारियां मिली हैं.

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बीबीसी गुजराती ने सूचना के अधिकार के तहत कई सरकारी बैंकों से कोविड के इलाज के लिए दिए गए लोन का ब्यौरा हासिल किया.

इससे जो जानकारी मिली है उससे पता चलता है कि दसियों लाख लोगों ने बैंकों से कोरोना के इलाज के लिए करोड़ों रुपए का लोन लिया. यही नहीं बहुत से लोग ये लोन अब तक वापस नहीं चुका पाए हैं और बैंकों का पैसा डूब रहा है. व्यापार और उद्योग के लिए लिए जाने वाले बहुत से लोन की तरह ही, ये पर्सनल लोन भी अब एनपीए हो गए हैं.

मिली जानकारी के मुताबिक, साल 2021-22 में देश भर में मेडिक्लेम कंपनियों के ख़िलाफ़ आने वाली शिकायतों में भी क़रीब 50 फ़ीसदी की वृद्धि देखी गई है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, कंपनियों के ख़िलाफ़ शिकायतें बढ़ने की मुख्य वजह कोरोना की वजह से बीमार पड़े लोगों के मेडिक्लेम का खारिज हो जाना या तय रकम से कम का स्वीकृत होना है.

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साल 2019-20 में मेडिक्लेम से जुड़ी 30825 शिकायतें दर्ज हुईं थीं जबकि साल 2021-22 में ये संख्या 46198 थी.

बढ़ी हुई शिकायतों के विश्लेषण के लिए बीबीसी गुजराती ने मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों से बात की.

क्या लोगों ने अपनी जेब से पैसा ख़र्च किया?

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के निदेशक और मेडिकल एक्सपर्ट डॉ. दिलीप मावलंकर कहते हैं, "साल 2021-22 में कोरोना महामारी की वजह से सामान्य से अधिक लोग अस्पतालों में भर्ती हुए. ये कहा जा सकता है कि इसी वजह से बहुत बड़ी संख्या में लोग मेडिकल बीमा कंपनियों के क्लेम निर्धारण से नाख़ुश हुए. कोरोना ही इसकी मुख्य वजह है."

वो मेडिक्लेम से जुड़ी शिकायतों के बढ़ने की वजह अस्पतालों के ग़लत रवैये, स्थिति से निबटने के लिए सरकार के अपर्याप्त प्रयासों, लोगों के सरकारी अस्पतालों पर भरोसा न करने और सीमित संसाधनों को मानते हैं.

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डॉ. मावलंकर कहते हैं, "दुर्भाग्य से सरकारी अस्पतालों में संसाधनों का गंभीर संकट था और लोगों को भी सरकारी अस्पतालों के इलाज में भरोसा नहीं था. ऐसे में लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे थे. बहुत से अस्पतालों ने इन परिस्थितियों का फ़ायदा उठाते हुए अधिक फ़ीस ली, इसकी वजह से बहुत से लोग बर्बाद हो गए."

हालांकि, डॉ. मावलंकर ये भी कहते हैं कि ये बात भी सच है कि लोगों का कोरोना संक्रमण के दौरान सरकारी अस्पतालों में बिलकुल मुफ़्त इलाज हुआ. लेकिन महामारी इतनी बड़ी थी कि सरकार के ये सब प्रयास नाकाफ़ी ही साबित हुए.

समस्या बीमा कंपनियों के कतरफ़ा फैसलों से हुई?

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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की एमपीएच ब्रांच की प्रमुख और विशेषज्ञ डॉक्टर मोना देसाई भी मानती हैं कि कोरोना महामारी की वजह से ही हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़ी शिकायतों में बढ़ोतरी हुई है.

वो मानती ही कि इसकी वजह कंपनियों का लचर प्रशासन और एकतरफ़ा फ़ैसले रहे होंगे.

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डॉ. मोना देसाई कहती हैं, "कोरोना महामारी के दौरान बहुत सी मेडिक्लेम कंपनियां लोगों के इलाज का बिल चुकाने में झिझक रहीं थीं. डॉ. की सलाह को नज़रअंदाज़ कर इंश्योरेंस के ग्राहकों का पैसा काटा जा रहा था. इसकी वजह से ही विवाद पैदा हुए."

साल 2020-21 में कम शिकायतें आने की वजह बताते हुए वो कहती हैं कि कोरोना की पहली लहर के दौरान अधिकतर लोगों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती किया गया था जबकि दूसरी लहर के दौरान लोगों ने निजी अस्पतालों में भी इलाज करवाया.

अहमदाबाद हॉस्पिटल एंड नर्सिंग होम एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. भरत गढ़ावी कहते हैं कि "कोरोना महामारी के दौरान मेडिक्लेम कंपनियों ने अपने ग्राहकों की समस्याओं को और बढ़ा दिया. इसकी एक वजह ये है कि इस मामले में सरकार का सीमित दख़ल रहा. अगर सरकार ने मेडिकल क्लेम कंपनियों को मरीजों के दावों का सही निस्तारण करने के आदेश दिए होते तो तस्वीर अलग होती."

इलाज के लिए लिया गया क़र्ज़ हो गया एनपीए?

सूचना

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कोरोना महामारी के दौरान लोगों को हुई वित्तीय परेशानियों को समझने के लिए बीबीसी ने आरटीआई के ज़रिए सूचनाएं प्राप्त की.

बीबीसी ने सरकारी बैंकों से कोरोना के इलाज के लिए लिए गए क़र्ज़ की जानकारी हासिल की.

सूचना के अधिकार से मिली जानकारी से पता चलता है कि ना सिर्फ़ लाखों लोगों ने करोड़ों रुपए का लोन लिया बल्कि बहुत से लोन अब एनपीए भी हो गए हैं.

आरटीआई से मिली जानकारी से पता चलता है कि देशभर में कोरोना के इलाज के लिए 271128 लोगों ने 4,899.7 करोड़ रुपए का लोन लिया. अब तक इनमें से अलग-अलग बैंक क़रीब 13 करोड़ रुपए के लोन को एनपीए घोषित कर चुके हैं.

ऐसे में, कई विश्लेषकों का ये मानना है कि बहुत से लोगों ने मेडिक्लेम खारिज होने की वजह से दिक़्क़तों का सामना किया और उन्हें इलाज के लिए बैंकों से क़र्ज़ लेना पड़ा. इससे ये भी पता चलता है कि सरकारी एजेंसियों ने महामारी के दौरान अपर्याप्त प्रयास किए.

दूसरी तरफ़ सरकार ये दावा करती है कि उसने कई योजनाओं के ज़रिए कोरोना महामारी के दौरान लोगों को सही इलाज मुहैया कराया.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का दावा है कि आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत देश भर में कई करोड़ लोगों को सरकारी और निजी अस्पतालों में मुफ़्त इलाज मुहैया कराया गया.

अस्पतालों के कोरोना के दौरान मनमानी फ़ीस वसूलने की शिकायतों के बारे में सरकार ने कई बार ये कहा है कि उसने फ़ीस नियमित की है और इलाज के पैकेज भी निर्धारित किए हैं ताकि किसी मरीज़ को अधिक पैसे ना चुकाने पड़ें. हालांकि विशेषज्ञ सरकार के नियमों के पालन को लेकर आशंकित हैं.

सरकार ने ये दावा भी किया है कि मेडिकल कंपनियों को बार-बार निर्देशित किया गया था कि वो किसी के सही क्लेम को ख़ारिज ना करें.

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