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कांग्रेस के चिंतन शिविर के बाद कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ी या घटी?
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उदयपुर में चला कांग्रेस पार्टी का तीन दिवसीय चिंतन शिविर रविवार को ख़त्म हो गया. इसे 'नव संकल्प शिविर' का नाम दिया गया और इस दौरान पार्टी को फिर से मज़बूत करने की रणनीति बनाई गई.
चिंतन शिविर का फ़ोकस पार्टी नेतृत्व में युवाओं को जगह देने और देश को फिर से पार्टी के साथ जोड़ने पर रहा.
आज़ादी के बाद से भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाली और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस मौजूदा राजनीतिक हालात में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.
पिछले दो लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हुई और अब सिर्फ़ दो राज्यों की सत्ता तक सिमटी कांग्रेस पार्टी में अब ये समझ बन रही है कि ये 'करो या मरो' की स्थिति है.
इस नव संकल्प शिविर में पार्टी ने देशव्यापी पद-यात्रा निकालने, कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने, 'एक व्यक्ति, एक पद' नियम लागू करने, मंडल कांग्रेस समितियों का गठन करने और संगठन में रिक्त पदों को समय पर भरने का निर्णय लिया गया है. इसके अलावा पार्टी में युवाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण देना भी तय किया गया है.
2024 के लोगसभा चुनाव या आगामी राज्य चुनावों को लेकर पार्टी की कोई रणनीति इस चिंतन शिविर से निकलकर सामने नहीं आई है.
इस चिंतिन शिविर के बाद जहां पार्टी कार्यकर्ता ये कह रहे हैं कि उनमें जोश भरा है, वहीं विश्लेषकों का मानना है कि कोई ऐसा ठोस निर्णय नहीं लिया गया है जिससे पार्टी का कायापलट हो जाए या चुनावों में उसकी संभावना मज़बूत हो जाए.
कांग्रेस की राजनीति पर बारीक नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "नव संकल्प शिविर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नरेंद्र मोदी सरकार से त्रस्त लोगों को कुछ उम्मीद थी. उन्हें लग रहा था कि नई ऊर्जा का संचार होगा. विपक्ष की सक्रिय भूमिका में कांग्रेस सामने आएगी. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को लेकर असमंजस की जो स्थिति है वो दूर होगी. इन बुनियादी मुद्दों पर कोई साफ़ बात नज़र नहीं आई है."
क्या जनता तक संदेश पहुंचा पाएगी कांग्रेस?
जानकार कहते हैं कि हाल के चुनावों में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती ये रही है कि वो अपना संदेश आम जनता या अपने संभावित वोटरों तक पहुंचाने में कामयाब नहीं रही है. बीजेपी के मुक़ाबले पार्टी सोशल मीडिया पर कमज़ोर है और मीडिया की बहसों में भी पार्टी के मुद्दों को जगह नहीं दी जाती है.
हाल के सालों में बीजेपी ने मीडिया और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने सियासी नैरेटिव को सेट करने और अपना संदेश लोगों तक पहुंचाने में कामयाबी से किया है. लेकिन कांग्रेस इस मोर्चे पर कमज़ोर नज़र आती रही है. पार्टी ने अब तय किया है कि देशव्यापी पदयात्रा निकालकर लोगों को जागरूक किया जाएगा.
क्या पदयात्रा से पार्टी ज़मीनी स्तर पर मज़बूत हो सकेगी इस सवाल पर रशीद किदवई कहते हैं, "यात्रा निकालना एक पुराना मॉडल है. महात्मा गांधी से लेकर चंद्रशेखर तक कई नेताओं ने ये किया और इससे उन्हें फ़ायदा भी हुआ. लेकिन आज सोशल मीडिया के ज़माने में राजनीतिक फ़िज़ा बदल चुकी है. आज धर्म और आस्था का राजनीति में मिश्रण किया जा रहा है. पुराने गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं. इस तरह के मुद्दों से सत्ता मिल रही है.
सवाल ये है कि क्या भारत में बहुसंख्यकवाद रहेगा? बहुसंख्यकों की जो धारणाएं हैं, या जो धारणाएं बनाई जा रही हैं उन पर ही राजनीति चलेगी. या जो कहा जा रहा है सबका साथ-सबका विकास, उसका अनुसरण भी होगा. इन तमाम चीज़ों पर यात्राएं निकालने से कोई बहुत ज्यादा लाभ नहीं होने वाला है."
इसी सवाल पर कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "पार्टी सिर्फ़ पदयात्रा की बात नहीं कर रही है, पार्टी ने और भी बहुत से संकल्प लिए हैं. पदयात्रा उन संकल्पों का एक हिस्सा है. पदयात्रा का मतलब ये नहीं है कि राहुल कश्मीर से चलकर कन्याकुमारी तक पैदल जाएंगे. पदयात्रा मतलब ग़रीब जनता तक, आम जनता तक पहुंचना है.
हमें ये लगता है कि तकनीक के दौर में भी, भागदौड़ के दौर में भी पदयात्रा को पुरातन कहकर नकारा नहीं जा सकता है. जब गांधी जी ने पदयात्राएं कीं तब तो संसाधन और भी कम थे. गांधीजी ने पदयात्राएं कीं और देश को जोड़ा, हम भी यही करने जा रहे हैं."
लेकिन क्या मीडिया और सोशल मीडिया के इस दौर में पदयात्रा जैसा संकल्प प्रभावी हो पाएगा, इस पर इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "जहां तक नई तकनीक और मीडिया का सवाल है, भाजपा इसी का इस्तेमाल देश को तोड़ने में, लोगों को बांटने में कर रही है. हम तकनीक और पदयात्रा का इस्तेमाल लोगों को जोड़ने के लिए, एक-दूसरे के क़रीब लाने के लिए करने जा रहे हैं. कांग्रेस पार्टी जनता के बीच में जाने के लिए हर माध्यम का इस्तेमाल करेगी और पदयात्रा भी एक माध्यम होगी."
ये सवाल भी उठता रहा है कि कांग्रेस पार्टी के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और पार्टी का संगठन भी कमज़ोर है. इस सवाल पर इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "कांग्रेस के पास संसाधन मौजूद हैं. देश के कोने-कोने में आज भी कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं. देश के हर हिस्से में पार्टी के कार्यकर्ता मौजूद हैं. हां ये सच बात है कि पिछले कुछ चुनावों में, देश के कुछ हिस्सों में पार्टी कमज़ोर हुई है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हमारे कार्यकर्ता ख़त्म हो गए हैं या उनका हौसला समाप्त हो गया है. हमारे पास संसाधन मौजूद हैं."
कांग्रेस के चिंतन शिविर में 'भारत जोड़ो' का नारा भी दिया गया. कांग्रेस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर देश में विभाजन की राजनीति करने और धार्मिक और जातीय समूहों के बीच भेदभाव करने का आरोप लगाती रही है.
इमरान प्रतापगढ़ी कहते हैं, "पार्टी ने देश में यात्रा करने और भारत को जोड़ने की बात की है क्योंकि भाजपा लगातार देश को तोड़ने की कोशिश कर रही है, धर्मों को बांट रही है, जातियों को अलग-अलग कर रही है. ऐसे में राहुल गांधी ने जो बात रखी है और पार्टी की तरफ़ से जो संकल्प लिया गया है उसमें साफ़ कहा गया है कि हम भारत को जोड़ेंगे और पार्टी फिर से उठ खड़ी होगी."
चिंतन शिविर में क्या-क्या हुआ?
इस चिंतन शिविर में पार्टी के 430 नेताओं ने हिस्सा लिया. तीन दिन के शिविर में पार्टी नेताओं को समूहों में बांटा गया था और उन्होंने 'पार्टी को कैसे मज़बूत करें, क्या नया किया जाए' ऐसे विषयों पर चर्चा की.
इमरान कहते हैं, "चिंतन शिविर में मैं जिस ग्रुप का हिस्सा था उसमें बीजेपी से आए हुए लोग भी थे. यशपाल आर्य पांच साल बीजेपी में रहकर फिर से कांग्रेस में आए हैं. वो चिंतन शिविर में तीन दिन हमारे ग्रुप का हिस्सा थे. वो स्वयं कह रहे थे कि 'भाजपा और आरएसएस हमें दलितों के मुद्दों पर बोलने का मौका ही नहीं देती'. लेकिन कांग्रेस में हम खुलकर बात रख सकते हैं. मैंने ये बताया कि किस तरह मुसलमानों और ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं और पार्टी को इस दिशा में क्या किया जाना चाहिए."
"हमने चिंतन शिविर में एक दिन ये बात रखी और अगले ही दिन सामाजिक न्याय सलाहकार परिषद का गठन किया गया जो सामाजिक न्याय के मुद्दों पर पार्टी को सलाह देगी. इन तीन दिनों के चिंतन शिविर में हमने सभ्यता सीखी, हमने सीखा कि देश को बचाने के लिए कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है."
आगामी गठबंधन का कोई संदेश नहीं
कांग्रेस के चिंतन शिविर पर नज़र रख रहे विश्लेषकों का मानना है कि इससे भविष्य में कांग्रेस के संभावित गठबंधनों को लेकर किसी रणनीति का कोई संकेत नहीं मिला है.
रशीद किदवई कहते हैं कि पार्टी को सत्ता के क़रीब आने के लिए प्रभावशाली गठबंधनों की ज़रूरत है, लेकिन ऐसा लगता है चिंतिन शिविर में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई.
किदवई कहते हैं, "बात दो टूक और साफ़ है कि चुनावों में, ख़ासकर 2024 आम चुनाव में कांग्रेस और विपक्ष (जो बिखरा हुआ है) क्या लामंबद हो पाएंगे. क्या वो नरेंद्र मोदी और भाजपा को कम से कम तीन सौ-साढ़े तीन सौ सीटों पर चुनौती दे पाएंगे? उसके लिए कांग्रेस को करना ये होगा कि 2014 में जो 44 सीटें आई थीं या 2019 में जो 52 सीटें आई थीं उसे बढ़ाकर कम से कम सौ सीटें करना होगा. वहीं क्षेत्रीय पार्टियों को डेढ़ सौ सीटों पर अपने आप को प्रभावशाली बनाना होगा और इन सीटों को जीतना होगा. ये अगर हुआ तब ही नरेंद्र मोदी या भाजपा को चुनौती दी जा सकेगी."
किदवई कहते हैं, "लेकिन अगर इस संदर्भ में देखें तो नव संकल्प शिविर या चिंतन शिविर से कोई उम्मीद पैदा होती नहीं दिख रही है. ना ही कांग्रेस ने ये स्पष्ट किया है कि वो विपक्ष के गठबंधन का नेतृत्व करेगी और ना ही ये बताया है कि वो विपक्षी दलों से बातचीत करके एक नया फ़्रंट बनाने का प्रयास करेगी और नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश करेगी."
रशीद किदवई मानते हैं कि इस नव संकल्प शिविर से कोई नया विचार नहीं निकला है. वो कहते हैं, "कांग्रेस की सोच अभी भी 80 या 90 के दशक से आगे नहीं बढ़ी है. उसे ये लगता है कि हमारे बाप-दादा ने घी खाया है, हमारी हथेली सूंघ लो. लेकिन आज राजनीति बहुत बदल चुकी है."
विश्लेषक ये मान रहे हैं कि कांग्रेस अभी भी वर्तमान की राजनीतिक परिस्थितियों और उनमें अपनी जगह को नहीं समझ पा रही है.
किदवई कहते हैं, "आज कांग्रेस को तृणमूल या आम आदमी पार्टी जैसे गैर-भाजपा राजनीतिक दल चुनौती दे रहे हैं. अब कांग्रेस के पास अपनी सिर्फ़ दो राज्य सरकारें हैं, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में. उसी तरह आम आदमी पार्टी की भी दो सरकारें आ चुकी हैं दिल्ली और पंजाब में. कांग्रेस को अपने यथार्थ के धरातल पर अपनी ताक़त और कमज़ोरियों को आंकना होगा और उसी के हिसाब से अपनी योजना बनानी होगी."
नेतृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं
कांग्रेस नेता राहुल गांधी पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ चुके हैं और अंतरिम ज़िम्मेदारी उनकी मां सोनिया गांधी निभा रही हैं.
चिंतन शिविर में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं. नेतृत्व को लेकर असमंजस पार्टी कार्यकर्ताओं को असहज कर सकती है.
किदवई कहते हैं, "कांग्रेस में काफ़ी समय से अंतरिम अध्यक्ष हैं. सोनिया गांधी ये ज़िम्मेदारी निभा रही हैं. राहुल गांधी 'कभी हां कभी ना' की भूमिका में हैं. चिंतन शिविर में उन्होंने कहा है कि पार्टी जो ज़िम्मेदारी देगी, मैं उसे निभाऊंगा लेकिन उन्होंने ये नहीं कहा कि सितंबर में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के जो चुनाव हो रहे हैं उसमें वो लड़ेंगे. उन्होंने किसी भी क़िस्म की दावेदारी पेश नहीं की है.
अगर कांग्रेस में इस तरह की संस्कृति रहेगी तो उससे जनता मायूस ही होगी क्योंकि जनता और कांग्रेस के समर्थक ये चाहते हैं कि वो ज़िम्मेदारी संभाले और क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा को घेरे, इस दिशा में कोई प्रयास नज़र नहीं आता है."
वहीं इमरान प्रतापगढ़ी का कहना है कि चिंतन शिविर में पार्टी ने ठोस निर्णय और संकल्प लिए हैं और अगर उन्हें लागू किया गया तो पार्टी फिर से उठ खड़ी होगी.
प्रतापगढ़ी कहते हैं, "हमने जो नव संकल्प लिए हैं यदि हम उन्हें अमली जामा पहना पाए और मुझे भरोसा है कि हम ऐसा कर पाएंगे, तो फिर हमें यक़ीन है कि पार्टी फिर उठ खड़ी होगी."
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