राजस्थान: अशोक गहलोत के घर के पास उन्माद, क्या है चुनावी बिसात?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक महीने के अंतराल में राजस्थान में दो अलग-अलग जगह साम्प्रदायिक हिंसा हुई.

पहली करौली में जहां दो अप्रैल को हिंदू नववर्ष के मौक़े पर हिंदू संगठनों ने बाइक यात्रा निकाली थी. इसमें 22 लोग ज़ख़्मी हुए थे.

दूसरी बार 3 मई को ईद के मौके पर जोधपुर में सांप्रदायिक तनाव देखा गया. पूरा विवाद झंडे और लाउडस्पीकर हटाने से शुरू हुआ, जिसके बाद कर्फ्यू लगाने की नौबत तक आ गई. करीब 30 लोग इसमें घायल हुए हैं.

3 मई को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का जन्मदिन होता है. बुधवार को वो 71 साल के हो गए. हालांकि उन्होंने जोधपुर में हिंसा के बाद अधिकारियों समेत दो मंत्रियों को वहाँ भेजने का फैसला किया. लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अपने जन्मदिन में व्यस्त रहे, राज्य की क़ानून व्यवस्था पर उनकी पकड़ ढीली हो रही है.

ग़ौर करने वाली बात ये है कि तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले अशोक गहलोत का जोधपुर गृह ज़िला भी है. जोधपुर के सरदारपुरा से ही वो जीत कर आते हैं.

'इस हिंसा में किसी की जान नहीं गई' - अशोक गहलोत इसी को अपनी उपलब्धि की तरह गिना रहे हैं.

इस वजह से भी विपक्ष गहलोत सरकार पर ज़्यादा हमलावर है.

राजस्थान बीजेपी के नेताओं ने गहलोत सरकार पर एक एक कर निशाना साधा. वसुंधरा राजे सिंधिया, अर्जुन मेघवाल, गजेंन्द्र सिंह शेखावत, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ सब ने एक के एक बाद क़ानून व्यवस्था को लेकर बयान जारी किए.

राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा का रिकॉर्ड

2023 के अंत तक राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसके बाद 2024 का लोकसभा चुनाव है. राज्य में जीत और हार ना सिर्फ विधानसभा के समीकरण पर असर डालेगी, बल्कि लोकसभा की सीटों पर भी असर देखने को मिलेगा.

लेकिन राज्य में क्या इस तरह की साम्प्रदायिक हिंसा आम बात है?

साल 2014 के बाद से ही एनसीआरबी, सांप्रदायिक हिंसा के आँकड़े अलग से प्रकाशित करती आई है.

तब राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में बीजेपी का शासन हुआ करता था. 2018 में कहानी बदली और अशोक गहलोत की सरकार बनी.

दोनों के शासन काल के आँकड़े कमोबेश एक जैसी कहानी ही कह रहे हैं. साल 2020, राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा के तीन मामले सामने आए थे, जब प्रदेश ज़्यादतर समय लॉकडाउन में ही रहा था.

इस बार एक महीने के अंतराल में दो-दो साम्प्रदायिक हिंसा की ख़बरे राजस्थान के लिए कितनी नई बात है?

साल 2023 में विधानसभा चुनाव

प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसे भाजपा का प्रयोग करार देते हैं. जोधपुर हिंसा से दो दिन पहले करौली हिंसा पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "करौली हिंसा भाजपा का एक प्रयोग था, हमने रोक दिया"

हालांकि दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संपादक एलपी पंत कहते हैं, " मुझे नहीं लगता कि करौली और जोधपुर की घटना पूर्व नियोजित थी लेकिन घटना के बाद जिस तरह से उसका प्रबंधन हो रहा है वह प्लानिंग की तरह ही है. कांग्रेस और भाजपा दोनों भय को एक भावना के साथ जोड़ रहे हैं. भाजपा ने धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण की अपनी सारी सरहदें खोल दी हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमलावर है और उन्हें एक समुदाय का हितैषी बताते हैं. भाजपा 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी मज़बूत ज़मीन तैयार कर रही है."

राजस्थान की राजनीति में कहा जाता है कि हर पाँच साल में सत्ताधारी पार्टी बदल जाती है. साल 1993 और 1998 इसमें अपवाद हैं.

इस लिहाज से देखें तो बीजेपी साल 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी के सपने ज़रूर देख रही होगी.

लेकिन सच ये भी है कि ज़िला जोधपुर मुख्यमंत्री का गृह ज़िला है, तो बीजेपी के प्रयोग को विफल करने की ज़िम्मेदारी उनकी भी उतनी है. राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उनकी है. बीजेपी पर जिम्मेदारी डाल कर वो अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते.

एलपी पंत कहते हैं, "मुख्यमंत्री के तौर पर अशोक गहलोत काफी मुखर है लेकिन क़ानून व्यवस्था के मोर्चे पर वे पिछड़ते हुए दिख रहे हैं. राजस्थान में पहले कहा जाता था कि अफसर सरकार चला रहे हैं और अब कहा जा रहा है कि विधायक सरकार चला रहे हैं. विधायकों के दबाव में पुलिस अफसरों की नियुक्तियों में जिस तरह सोशल इंजीनियरिंग हो रही है वह भी बढ़ती हिंसा की एक वजह है."

सोशल इंजीनियरिंग से एलपी पंत का मतलब जातिगत समीकरण से है.

यूपी-बिहार से अलग है राजस्थान की राजनीति

राज्य की राजनीति को करीब से कई दशकों से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी कहते हैं कि राजस्थान की राजनीति यूपी-बिहार- मध्यप्रदेश की तरह नहीं है.

वो कहते हैं,"यहाँ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी की राजनीति उतनी नहीं चलती बल्कि जातिगत राजनीति ज्यादा प्रभावी है.

राजस्थान में क्षत्रिय, गुर्जर, मीणा जैसे अलग अलग जातिगत समूहों के अपने-अपने मैनेजर हैं, जो तय करते हैं कि वोटों का बंटवारा कैसे होगा. इन जातियों का वोट बीजेपी-कांग्रेस के बीच बंटता है. चुनाव वही जीतता है जो इस बंटवारे में जीतता है. जैसे बैंसला बीजेपी के नेता थे जिनका गुर्जरों में बहुत प्रभाव था. उसी तरह से कांग्रेस नेता राजेश पायलट को गुर्जरों के वोट बैंक का मैनेजर माना जाता था. सचिन पायलट इस बात को जानते हैं, लेकिन वैसा करने में सक्षम नहीं दिखते.

जातिगत राजनीति में हर समूह को मोह लेने में महारत बीजेपी में वसुंधरा राजे सिंधिया के पास है और कांग्रेस में अशोक गहलोत के पास. बीजेपी और कांग्रेस में इन दोनों नेताओं के अलावा वैसी फॉलोइंग बाक़ी दूसरे नेताओं की नहीं है - फिर चाहे वो केंद्रीय मंत्री गजेंन्द्र सिंह हों या फिर कांग्रेस नेता सचिन पायलट.

मीडिया में आए दिन बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया की पार्टी के केंद्रीय नेताओं से नाराज़गी की ख़बरे छपती रहती हैं. इस वजह से बीजेपी बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की राजनीति राजस्थान में चलाने की कोशिश कर रही है."

ओम सैनी की इन बातों को तथ्य से जोड़ कर देखने की जरूरत भी है.

निशाने पर कांग्रेस

वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पहली बार बीजेपी ने बिना गठबंधन वाली सरकार राजस्थान में बनाई थी. उससे पहले भैरों सिंह शेखावत जब भी मुख्यमंत्री बने गठबंधन से बने. अशोक गहलोत इस बार भले ही गठबंधन से सत्ता में आए हों लेकिन बीएसपी सांसदों के पार्टी में विलय के बाद वो पूर्ण बहुमत वाली सरकार चला रहे हैं.

राज्य की 200 विधानसभा सीटों में कांग्रेस के पास 120 विधायकों का समर्थन है जिनमें बीएसपी के 6 विधायक भी शामिल हैं जबकि बीजेपी के पास सहयोगियों को मिला कर 76 विधायक हैं.

अशोक गहलोत को एक साथ दो फ्रंट पर घिरे नज़र आते हैं. बीजेपी के निशाने पर तो वो हैं ही. साथ ही रह रह कर उनके और सचिन पायलट के बीच खींचतान की ख़बरे निकल कर सामने आती है.

हाल ही में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ये तक कहना पड़ा कि उनका एक इस्तीफ़ा सोनिया गांधी के पास परमानेंट रखा हुआ है.

बीजेपी की मुश्किलें

वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा कहते हैं, "राजनीति का तक़ाज़ा है कि दुश्मन पर चोट तब करो जब वो सबसे कमज़ोर हो. इसलिए बीजेपी राज्य में इस वक़्त मुखर हैं.

हालांकि वैसी ही गुटबाज़ी की खबरें बीजेपी खेमे से भी आ रही है.

वसुंधरा राजे की नाराज़गी के बीच, जोधपुर से सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, ओम माथुर, अर्जुन मेघवाल जैसे नाम भी मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी मौके मौके पर पेश करते रहे हैं.

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए राजस्थान की अहमियत इससे भी पता चलता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हाल फिलहाल में दो बार राजस्थान का दौरा करके गए हैं. जल्द ही राजस्थान को लेकर एक और बैठक मई के अंत में प्रस्तावित है.

कांग्रेस का बहुप्रतीक्षित चिंतन शिविर भी इसी महीने राजस्थान के उदयपुर में होना है.

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