You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मुंडका अग्निकांड: 'चारों तरफ आग थी और मैं शीशा तोड़ कर नीचे कूद गई'
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
36 साल की मुसर्रत का ढाई साल का बेटा मां के बारे में बार-बार पूछ रहा है. लेकिन उसकी फुआ (बुआ) के पास कोई जवाब नहीं. वो इस छोटे बच्चे को सिर्फ इतना दिलासा दे रही हैं कि काम ज़्यादा है इसलिए उसकी मां आने में लेट हो रही है.
दिल्ली के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के मुर्दाघर के सामने खड़े मुसर्रत के पति अकबर ये कहते हुए फूट-फूट कर रोने लगते हैं कि वो 'मुसर्रत के बिना अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों को कैसे संभालेंगे.'
मुंडका अग्निकांड में झुलसे शवों की शिनाख्त के लिए जब उन्हें बुलाया गया तो वो अपने पत्नी को उनमें नहीं खोज सके. वो कहते हैं कि शव पहचानने लायक स्थिति में नहीं थे.
मुसर्रत पिछले एक साल से नौकरी कर रही थीं. पेशे से पेंटर पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वो घर चला रही थीं और तीन बच्चों, एक बीमार सास का भी पूरा ख़्याल रख रही थीं. लेकिन उनके लापता होने के बाद से घर के सभी लोग बिखर-से गए हैं.
बीतते हर पल के साथ परिवार के लिए मुसर्रत के ज़िंदा होने की उम्मीद धुंधलाती जा रही है. अकबर की बहन कहती हैं, "मुसर्रत की एक सहेली भी लापता है. उसका बच्चा तो और भी छोटा है. अल्लाह रहम करे... हम तो बस अब यही सोच रहे हैं कि जल्दी डीएनए हो जाए और हम शव घर लेकर जाएं."
एक ही घर की तीन बेटियां लापता
उन्हीं के बगल में खड़े दो भाई महिपाल और राकेश की हथेलियों पर घर की तीन बेटियों की पासपोर्ट साइज़ तस्वीरें हैं. तीनों बेटियां उसी कंपनी में काम करती थीं और आग लगने की घटना के बाद से उनका कुछ पता नहीं है.
भरी आंखों से महिपाल बताते हैं कि उनकी दो बेटियां 23 साल की कीर्ति और 20 साल की पूनम ही नौकरी करके घर चला रही थीं.
वो कहते हैं, "वो देखती थीं कि परिवार ग़रीब है. मैं अब काम नहीं कर पाता. बेटा बहुत छोटा है. इनकी मां बीमारी में बिस्तर पर पड़ी है. बेटियां ही सहारा थीं. बोलती थीं पापा फिक्र मत करना, मां की बीमारी और अपनी शादी के लिए खुद ही पैसा जोड़ लेंगी. लेकिन कुछ भी नहीं हो पाया और हमारा सब लुट गया."
महिपाल के भाई की बेटी भी उन्हीं के साथ काम पर जाती थी. हादसे के बाद से उनका भी कुछ पता नहीं चल पा रहा है.
दिल्ली के मुबारकपुर के रहने वाले महिपाल बेबसी में कहते हैं, "बेटियों ने चार बजे फ़ोन किया कि पापा आग लग गई है, हम बचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन भीड़-भाड़ ज़्यादा थी. नंबर ही नहीं आया होगा निकलने का."
एक मां का यकीन
कुछ ऐसी ही बात राजरानी भी कहती हैं. शवों की शिनाख्त करके आने के बाद से वो अपने 25 साल के बेटे नरेंद्र का नाम पुकार-पुकार कर बेसुध हो चुकी हैं.
किसी तरह घर वालों ने संभाला, फिर बताती हैं, "वहां किसी चश्मदीद ने बताया कि दो-तीन लड़कों के बाद उसका निकलने का नंबर था, लेकिन सामने एक औरत आ गई. वो बोला कि आप पहले निकल जाइए. इस चक्कर में अंदर ही रह गया."
वो यकीन से कहती हैं कि मुर्दाघर में रखे शवों में उनका बेटा नहीं है. वो बस कह रही हैं कि उनका बेटा कोई वापस लाकर दे दे.
मुबारकपुर की ही रहने वालीं पूजा की मां भी शिनाख्त के लिए गईं. लेकिन उन्हें भी यकीन है कि बेटी वहां नहीं है. वो कहती हैं कि बेटी ने हाथ में दो कड़े पहने हुए थे, जो किसी शव के हाथ में नहीं दिखे.
वो बेटी की एक दिन पहले की बातों को याद कर रही हैं. बताती हैं कि एक दिन पहले ही उसे तनख्वा मिली थी. बहुत खुश थी और कह रही थी कि कल नए कपड़े लेने जाएगी.
तीन महीने पहले जब से नौकरी शुरू की थी तबसे पूजा उत्साहित थीं. पिता के बाद बच्चों को मां ने घरों में झाड़ू-पोझे लगा-लगाकर पाला. लेकिन नौकरी लगने के बाद पूजा ने मां से कह दिया था कि वो अब बाहर काम करने ना जाया करें और घर में ही आराम किया करे.
पूजा को तनख्वा के रूप में 6-7 हज़ार ही मिल रहे थे, लेकिन उसके सपने बड़े थे. वो कहती थी कि वो बड़ा बिज़नेस करेगी. अंबानी-टाटा-बिरला जैसी बनेगी.
मां बताती हैं, 'तसल्ली देते थी कि मां तू चिंता मत कर. लग रहा था कि अब हालात धीरे-धीरे ठीक हो जाएंगे. घर का किराया दे पा रहे थे.'
पूजा रोज़ साढ़े छह बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन जब शुक्रवार को बहुत देर तक नहीं आई तो उनकी मां घर से उन्हें ढूंढने निकल पड़ी.
मुंडका में कंपनी पर पहुंची तो लोगों की भीड़ देखी. किसी ने बताया कि पीड़ितों को यहां से निकालकर संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया है, जिसके बाद वो वहां भागीं. तब से भूखे-प्यासे वो बस बेटी के मिल जाने की आस में हैं.
घटना स्थल से जब दो घायल लड़कियों को अस्पताल लाया गया और उन्होंने किसी को कहते सुना कि एक और घायल लड़की घटनास्थल पर अभी-अभी मिली है तो मां के दिल में एक उम्मीद जगी और वो तुरंत उस तरफ भागीं. लेकिन उनके हाथ निराशा ही लगी.
लेकिन वो अब भी कहती हैं, "मुझे लग रहा है कि वो कहीं तो है. बस किसी अस्पताल से पता कर दो."
'जान बचाने के लिए दूसरी मंज़िल से कूदीं तनु'
अपनों की खोज में दर-दर भटकते इन परिजनों की भीड़ में तनु भी मिली. जिनके हाथ पर पट्टियां बंधी थीं. वो उन खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिन्होंने वक़्त रहते दूसरी मंज़िल से कूदकर अपनी जान बचा लगी थी.
उस वक़्त को याद करते हुए वो बताती हैं कि उस वक़्त मीटिंग चल रही थी, इसलिए किसी को पता नहीं चला कि बाहर क्या हो रहा है. फिर देखते ही देखते मंज़र बदल गया.
उनके मुताबिक़, "हम लोग वहां पर भटकते रहे कि प्लीज़ हेल्प करो, हेल्प करो. बिल्डिंग के नीचे लोग इकट्ठा हो गए थे. हम चिल्ला रहे थे. अंदर ज़्यादातर औरतें थीं."
तनु और उनके साथ की लड़कियों ने कांच तोड़ना शुरू किया लेकिन बहुत कोशिश के बाद भी तोड़ नहीं पाईं. फिर साथ काम करने वाले लड़कों ने कांच को जैसे-तैसे तोड़ा.
पूरी फैक्ट्री में एक ही एक्ज़िट डोर है. जो सीड़ियों के रास्ते नीचे जाता है. लेकिन सीड़ियों की ही तरफ से धुंआ और आग उठने की वजह से वो लोग वहां से नहीं निकल पाए.
वो बताती हैं, "हम सांस नहीं ले पा रहे थे. हमें बस वहां से निकलना था. दूसरी तरफ जहां सर का ऑफिस था, वहां से किसी ने शटर उठाया और वहां से रस्सा बांधकर वो दूसरी मंज़िल से नीचे कूदे."
वो बताती हैं कि इस सब मशक्कत में डेढ़ घंटे का वक़्त लग गया. उनके मुताबिक़, वहां 250 लोग थे, जिनमें ज़्यादातर महिलाएं ही थीं. इस पूरे वाक्ये के दौरान उनकी कुछ साथ की सहेलियां उनसे बिछड़ गईं.
उनकी एक दोस्त के भाई संजय गांधी अस्पताल में थककर पेड़ के नीचे बैठे इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कोई आकर उनकी बहन के बारे में उन्हें बता दे.
हादसे के बाद कंपनी के मालिक वरुण गोयल और उनके भाई हरीश गोयल को गिरफ़्तार कर लिया गया है. कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हादसे में इनके पिता अमरनाथ गोयल की भी मौत हो गई है.
तनु बताती हैं कि 'मीटिंग में अमरनाथ गोयल मौजूद थे और क्योंकि वो बहुत बूढ़े थे और चलने में भी उन्हें दिक़्क़त थी, इसलिए वो बिल्डिंग से बाहर नहीं निकल पाए और बिल्डिंग में ही उनकी मौत हो गई होगी.'
मुंडका अग्निकांड की आग तो बुझ गई लेकिन पाड़ितों की चीखें लंबे वक़्त तक सिस्टम के कानों में गूंजती रहेंगी.
ऐसे हादसे दिल्ली में पहले भी हुए हैं. तारीखें बदलती हैं और जगहें बदलती हैं. बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं. ऐसे हादसे जब दोबारा होते हैं तो लगता है कि सरकार और एजेंसियां इनसे कुछ सबक नहीं लेतीं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)