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दिल्ली अग्निकांड: 'मैंने तीन-चार लोगों को बचाया मगर अपने भाई को नहीं बचा सका'
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल से
"कभी नहीं सोचा था कि भाई मुझसे दूर हो जाएगा. हर चीज़ मुझसे पूछता था कि भैया ये कर रहा हूं, वो कर रहा हूं. आग लगी थी तो भी मुझे फ़ोन किया और बोला भैया बचा लो. मगर मैं उसे नहीं बचा पाया."
दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में बैठे एक शख़्स बिलखते हुए फ़ोन पर किसी को ये सब बता रहे थे. दो लोगों ने उन्हें संभाला हुआ था. उनका भाई बबलू भी उसी फ़ैक्ट्री में काम करता था जहां रविवार सुबह आग लग गई.
बबलू के भाई मोहम्मद हैदर को मलाल इस बात का है कि वह समय रहते घटनास्थल पर पहुंच गए थे मगर अपने भाई को बचा नहीं पाए.
हैदर कहते हैं, "मैं पहुंच तो गया था मैं. इस बीच किसी ने कहा कि तुम्हारे भाई को निकाल दिया है. मेरी टेंशन कम हो गई. तीन-चार लोगों को बचाया भी मगर भाई अंदर रह गया. उस तक पहुंच नहीं पाया. जब मिला तो मुर्दाघर में पड़ा हुआ था."
पास ही बैठे एक और शख़्स ने फ़ोन पर भारी आवाज़ में किसी से कहा, "बबलू भी डेड कर गया, राजू भी डेड कर गया. तौक़ीर भी डेड कर गए."
एलएनजेपी अस्पताल में कई लोग ऐसे हैं जो घटना की ख़बर लगने के बाद अपनों की तलाश में यहां आए हैं और बड़ी हिम्मत करके फ़ोन पर घरवालों को यहां का हाल बता रहे हैं.
सूजी हुई लाल आंखें, उतरे हुए चेहरे, सुस्त क़दम, सिसकियां और रह-रहकर उठते दर्द भरी आवाज़ें. जब हम अस्पताल पहुंचे तो यही मंज़र था.
रविवार को दिल्ली की एक अनाज मंडी में लगी आग से मरने वालों और घायल हुए लोगों को यहां लाया गया है. कुछ घायलों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल भी ले जाया गया है.
'जिससे काम सीखने आया वही नहीं रहा'
28 साल के मोहम्मद अफसाद फैक्ट्री में जैकेट सिलने का काम करते थे. उनके छोटे भाई उनसे काम सीखने के लिए दिल्ली आए थे.
लेकिन अब उन्हें काम सिखाने वाला कोई नहीं बचा क्योंकि फैक्ट्री में रविवार को लगी आग में अफसाद की मौत हो गई.
एलएनजेपी अस्पताल में उनके छोटे भाई उनसे मिलने पहुंचे. उनका कहना है कि "हमसे आधार कार्ड और राशन कार्ड लाने के लिए कहा गया है, हमें घर से मंगाना पड़ेगा."
उन्होंने कहा कि "तीन दिन पहले वो मुझसे मिलने आया था. वो सोमवार को घर जाने वाला था, सोमवार की टिकट थी उसकी. इसके लिए मुझसे कुछ सामान लेने आए थे. मैं रविवार को उसके लिए कुछ सामान खरीदने वाला था."
"उसके घर में मां, पिता हैं, बहन हैं, पत्नी और दो बच्चे हैं. सभी घर चलाने के लिए उन्हीं पर निर्भर हैं."
अस्पताल पहुंचे मोहम्मद सद्दाम के चाचा के बेटे के साथ ये हादसा हुआ है. उन्होंने अपने घर पर फ़ोन किया तो उन्हें घटना का पता चला.
सद्दाम ख़ुद चांदनी चौक में चश्मे का काम करते हैं.
उन्होंने कहा कि "कारखाने में पहुंच कर मैंने उनका शव देखा. उनके अभी-अभी एक बच्चा हुआ है जिसकी अब तक उसने शक्ल भी नहीं देखी. वो सोमवार को घर जाने वाला था, लेकिन जा नहीं पाया. घर पर वो अकेला कमाने वाला था."
"हमें राशन कार्ड लाने के कहा जा रहा है. यहां पर आधार कार्ड था जो जल गया, अब घर जा कर देखेंगे कि क्या राशन कार्ड में उनका नाम है."
एक परिवार के दो बेटे, एक साथ....
मोमिना और रुख़्साना के दो रिश्तेदार (दो भाई) इस हादसे का शिकार हो गए हैं.
बिहार के सहरसा जिले के नरियार का ये परिवार दिल्ली में रहता है. उनका कहना है कि एक भाई की मौत हो गई है जबकि एक भाई से अब तक वो मुलाक़ात भी नहीं कर पाई हैं.
वो कहती हैं कि "दोनों भाई जैकेट सिलने का काम करते थे और मिल कर 20-25 हज़ार महीना कमा लेते थे. उन्हीं की कमाई से घर चलता था."
"उनके पिता कमाने लायक स्थिति में नहीं हैं. परिवार में इन दोनों के अलावा चार बहने हैं जो इन्हीं पर निर्भर हैं."
दोनों कहती हैं कि उन्हें अभी शव को बिहार ले कर जाना उनके बस में नहीं है क्योंकि उनके पास पैसे नहीं हैं.
वो कहती हैं कि मदद न मिली तो वो शव लेकर गांव भी नहीं जा सकेंगी.
'मेरे परिवार का ध्यान रखना'
एलएनजेपी अस्पताल के पास मौजूद शोभित कुमार नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि उनके मित्र मोहम्मद मुशर्रफ़ इसी कारखाने में काम करते थे.
शोभित बताते हैं कि 32 साल के मुशर्रफ की तीन बेटियां और एक बेटा हैं. वो सिलाई का काम करते थे.
सवेरे उनकी बात अपने मित्र से हुई थी जिन्होंने फ़ोन पर उन्हें बताया कि "फैक्ट्री में आग लग गई है, मेरे पीछे मेरे परिवार का ध्यान रखना."
शोभित ने उन्हें फैक्ट्री से कूद कर जान बचाने के लिए कहा लेकिन उनके मित्र ने कहा कि यहां से कूदने की कोई जगह नहीं है.
शोभित कहते हैं कि "अगर कोई बचने का रास्ता होता, कोई दरवाज़ा होता तो बचने की कोशिश तो करते."
मोहम्मद मुशर्रफ़ के फूफा ख़ालिद हुसैन ने बताया वो रविवार को ही ख़बर मिलने के बाद दिल्ली पहुंचे हैं.
वो बताते हैं कि मुशर्रफ़ 2007 से दिल्ली में काम करते थे. हालांकि वो इस फैक्ट्री में कब से काम करते थे इसकी उन्हें जानकारी नहीं है.
"वो बेहद ग़रीब परिवार से हैं. उनके सिवा उनके परिवार में कोई और काम करने वाला नहीं है. उनकी छोटी बेटी एक साल की है और बड़ी बेटी केवल चार साल की है."
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