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मुंडका अग्निकांड: 'मेरा आदमी भी मर गया, अब मेरी बेटी भी चली गई'
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पश्चिमी दिल्ली के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के बाहर लोगों की भीड़ है. यहां कुछ आंखों में आंसू हैं और कुछ में सवाल. भीड़ के बीच एक युवा बमुश्किल अपने आंसुओं को थामे गुमसुम खड़ा है.
अपने आप को संभालते हुए वो बताता है, "मेरी गर्लफ्रेंड भी आग में फंसी थी. उसने मुझे वीडियो कॉल किया. मैं उसकी हिम्मत बढ़ा रहा था. धीरे-धीरे धुआं बढ़ता जा रहा था. और फिर कॉल कट गई."
इस युवक की गर्लफ्रेंड अब लापता है. संजय गांधी अस्पताल के बाहर कई ऐसे परिवार हैं जिनके अपने आग की घटना के बाद से लापता हैं.
14 साल की मोनी अपनी बहन पूजा को खोजते हुए अस्पताल पहुंची हैं. 19 साल की उनकी बहन उसी सीसीटीवी कंपनी के ऑफ़िस में नौकरी करती थीं जिसमें आग लगी.
मोनी कहती हैं, "हमें न्यूज़ से आग लगने का पता चला और हम दौड़ते हुए यहां आए. हमें नहीं पता कि हमारी बहन कहां है, प्रशासन ने बस इतना ही कहा है कि संजय गांधी अस्पताल में पता करो."
लापता लोग और दर-बदर भटकते परिजन
मोनी की बहन पूजा घर में सबसे बड़ी थीं और नौकरी करके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं. अपनी बहन को याद करते हुए मोनी कहती हैं, "वो सुबह नौ बजे ऑफ़िस गई थी. वो डेटा एंट्री का काम करती थी, उसके पास फ़ोन नहीं था तो वो हमें फ़ोन भी नहीं कर सकी."
सुनीता की 20 साल की बेटी सोनम लापता हैं. मंगोलपुरी के संजय गांधी अस्पताल में सुनीता अपनी छोटी बेटी के साथ बीती रात से दर-दर भटक रही हैं. उन्हें इंतज़ार है कि कोई उन्हें बता दें कि आखिर उनकी बड़ी बेटी सोनम कहां और किस हाल में हैं.
बीबीसी संवाददाता अभिनव गोयल से बात करते हुए सुनीता फूट-फूट कर रोने लगती हैं. वह कहती हैं, "जब से आग लगी है तब से हर जगह खोज लिया कुछ पता नहीं है. कोई पुलिस वाले आगे नहीं बढ़ने देते. मेरा आदमी भी मर गया मेरी बेटी भी चली गई. इससे पहले मैं सफ़दरजंग अस्पताल गई फिर एक और प्राइवेट अस्पताल गई थी, बिल्डिंग चार मंज़िला बना दिया लेकिन दरवाजा एक ही दिया, आग लगी तो दरवाज़ा ही नहीं बाहर आने का, मेरी बेटी कहां से निकलती. मुझे आगे ही नहीं जाने दिया मैं कैसे खोजती मेरी बेटी को. मेरी बेटी वहां एक साल से काम कर रही थी, दूसरी मंज़िल पर काम करती थी और वाई-फाई का एंटीना लगाने का काम करती थी. "
दीक्षा रावत की सास अपनी बहू को घायल हालत में अस्पताल लेकर आई हैं. वो उसी बिल्डिंग में काम करती थीं.
उनकी सास बताती हैं, "कल जब आग लगी तो देखा कि पूरा धुंआ-धुंआ था. मैंने टेबल मारा जब जा कर दरवाज़ा टूटा. पूरे बिल्डिंग में एक ही दरवाज़ा है. मैं अपनी बहू को ऑटो से अस्पताल लेकर आई हूं."
नौशाद अपनी मामी को खोजते हुए संजय गांधी अस्पताल पहुंचे हैं. आग की घटना का पता चलने के बाद से ही नौशाद अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं लेकिन उन्हें अपनी मामी के बारे में कुछ पता नहीं चल सका.
वो कहते हैं, "मैं सफ़दरजंग अस्पताल गया, एम्स ट्रॉमा सेंटर गया, राम मनोहर लोहिया गया, कहीं कुछ पता नहीं चला. अब यहां आया हूं शायद यहां कुछ पता चल जाए."
पंकज अपने भाई प्रवीण को खोजने अस्पताल पहुंचे थे. पंकज ने आसपास के सभी अस्पतालों के चक्कर काटे लेकिन भाई के बारे में कुछ पता नहीं चल सका.
पंकज बताते हैं, "मेरा भाई प्रवीण कंपनी में पिछले आठ साल से काम करता था. वो ग्राफ़िक डिज़ाइनर है. हमें उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है."
पंकज को एक दोस्त से हादसे के बारे में पता चला था. वो कहते हैं, "हमसे कहा गया है कि सभी बॉडी संजय गांधी अस्पताल में ही हैं. हमसे कहा गया है कि हो सकता है पहचान के लिए डीएनए टेस्ट भी करवाना पड़े."
40 साल की मोनी भी हादसे का शिकार हुई कंपनी में काम करती थीं. आग लगने के बाद से ही वो लापता हैं. हालांकि उनके फोन की घंटी लगातार बज रही है.
उनकी मां अस्पताल में हताश खड़ी हैं. वो कहती हैं, "मेरी बेटी का फ़ोन लगातार मिल रहा है लेकिन कोई जवाब नहीं आ रहा है. बहुत सी लड़कियों को सीढ़ी और क्रेन लगाकर उतारा गया है. हमने वीडियो देखा है जिसमें ऐसा लग रहा है जैसे उसे इमारत से निकाल लिया गया है. लेकिन वो हमें नहीं मिल रही है. हम नहीं जानते वो कहां है."
हादसे का शिकार बहुत से लोग मुश्किल के वक्त अपने परिजनों से बात नहीं कर सके. लेकिन कुछ ने तुरंत घर पर जानकारी दे दी थी.
'मैंने अपनी बहन को आग में फंसा देखा लेकिन कुछ ना कर सका'
नांगलोई की रहने वाली और सीसीटीवी कंपनी में काम करने वाली 21 वर्षीय मुस्कान ने आग लगते ही अपने भाई इस्माइल को फ़ोन किया. इस्माइल पंद्रह मिनट के भीतर इमारत के बाहर पहुंच गए थे. लेकिन वो अपनी बहन को नहीं बचा सके. अब मुस्कान लापता हैं.
इस्माइल कहते हैं, "मैं जब यहां पहुंचा तो वो मुझे बिल्डिंग में फंसी हुई दिखाई दी थी. मैंने उससे फोन पर कहा कि वो पीछे के रास्ते से निकले. इसके बाद से मेरी उससे कोई बात नहीं हुई है."
इस्माइल और उनके परिजन मुस्कान को हर अस्पताल में खोज चुके हैं लेकिन उन्हें कोई ख़बर नहीं मिली है.
इस्माइल ने बिल्डिंग के अंदर घुसकर अपनी बहन को खोजने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
जब इमारत की आग लगभग बुझाई जा चुकी थी तो अपनी बहन की तलाश में वो इमारत में घुसे. शीशा लगने से उनके हाथ में भी चोट लग गई है.
इस्माइल कहते हैं, "हम उसे खोज-खोजकर थक गए हैं लेकिन कुछ पता नहीं चल पा रहा है. काश हम उसे बचा पाते, काश वो हमें मिल जाए."
आग की शिकार ज़्यादातर महिलाएं
जिस इमारत में आग लगी यहां अधिकतर महिला कर्मचारी काम करती थीं. परिजनों के मुताबिक उनका वेतन औसतन 12 से 15 हज़ार रुपये के बीच था.
आग बुझाए जाने के बाद जब हम इमारत के क़रीब पहुंचे तो बाहर महिलाओं की दर्जनों सेंडल पड़ी हुई नज़र आईं.
लापता हुई पूजा ने तीन महीने पहले ही नौकरी शुरू की थी. उनके पिता नहीं हैं और वो अकेले ही अपने घर का ख़र्च चला रही हैं.
उनकी मां अस्पताल के बाहर बिलकुल गुमसुम खड़ी थीं. वो एक शब्द भी नहीं बोल पा रही थीं. उनकी छोटी बहन मोनी कहती हैं, "उसके बिना हमारा गुज़ारा कैसे होगा?"
वहीं मुस्कान के भाई इस्माइल कहते हैं, "मेरी बहन एक ख़ुशमिजाज़ लड़की है. वो तीन साल से यहां काम कर रही थी और अपने सपने पूरे कर रही थी. हम दुआ करते हैं कि वो सलामत हो और किसी भी तरह से हमें मिल जाए."
दिल्ली पुलिस ने लापता लोगों के लिए एक कंट्रोल रूम भी बनाया है. अधिकारियों के मुताबिक अब तक यहां लापता हुए 19 लोगों के बारे में पूछताछ की गई है. इनमें चार पुरुष और पंद्रह महिलाएं हैं.
लापता लोगों के परिजन अपनों को पा लेने की उम्मीद में अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं.
दिल्ली पुलिस ने हादसे में घायल लोगों के नाम तो जारी किए हैं लेकिन मरने वालों की पहचान अभी ज़ाहिर नहीं की गई है.
इस बारे में पुलिस अधिकारियों का कहना था, "बहुत से शव बुरी तरह जल गए हैं. उनकी पहचान के लिए डीएनए एनेलिसिस की ज़रूरत होगी."
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