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CUET: अंडरग्रैजुएट प्रवेश परीक्षा को लेकर किए जा रहे दावे और उठ रहे सवाल
- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में 12वीं की पढ़ाई करनेवाले हर छात्र के सामने अगला सवाल आता है कि अगर इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे विषयों की प्रवेश परीक्षाओं में ना हुआ, जिनसे कि अमूमन करियर 'सेट' हो जाता है, या अगर कुछ और करने की इच्छा है, तो आगे का रास्ता क्या हो, कहाँ एडमिशन लिया जाए?
और यहीं से जद्दोजहद शुरू होती है देश के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में दाख़िल होने की. देश भर से छात्र दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में स्थित कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाना चाहते हैं.
सीटें सीमित होती हैं, एडमिशन लेने की चाह रखने वाले छात्रों की संख्या ज़्यादा. ऐसे में चयन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है.
तरीक़े दो ही थे इसके. एक- कि 12वीं में जितने नंबर आए, उनके आधार पर एडमिशन हो. और दूसरा - कि प्रवेश परीक्षा कराई जाए.
कई बड़े कॉलेज/विश्वविद्यालय बरसों से एंट्रेंस एग्ज़ाम करवाते रहे हैं, जैसे जेएनयू, बीएचयू, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, एएमयू आदि.
मगर कई विश्वविद्यालय और कॉलेज 12वीं के अंकों के आधार पर दाख़िला देते थे.
लेकिन इस साल से ये कोशिश शुरू हुई है कि पूरे देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाख़िले के लिए एक ही परीक्षा करवाई जाए. इस परीक्षा का नाम रखा गया है सीयूईटी.
क्या है इसका मक़सद?पिछले साल तक जो व्यवस्था थी, उसमें क्या कोई दिक़्क़त आ रही थी? और क्या अब नई व्यवस्था से चीज़ें दुरुस्त हो जाएंगी?
मौजूदा सरकार इस व्यवस्था की हिमायत कर रही है, वो अपने तर्क देती है. दूसरी ओर, इसके आलोचक भी हैं और उनकी अपनी चिन्ताएँ हैं.
सीयूईटी (CUET) क्या है?
इस साल देश में पहली बार कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट यानी विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा करवाई जा रही है.
ये परीक्षा मुख्य तौर पर देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों या उनके अधीन आने वाले कॉलेजों में अंडरग्रैजुएट कोर्सों में एडमिशन के लिए हो रही है.
मगर प्रदेश सरकारों के विश्वविद्यालय, प्राइवेट विश्वविद्यालय और डीम्ड विश्वविद्यालय भी अपने यहाँ दाख़िले के लिए इसे अपना सकते हैं.
परीक्षा और आवेदन की पूरी प्रक्रिया समझने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - CUET: आवेदन शुरू- जानिए क्या करना होगा
सीयूईटी की ज़रूरत क्यों? क्या कहते हैं पक्षधर?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के अध्यक्ष एम जगदीश कुमार ने मीडिया में कई बार इस बारे में स्थिति साफ़ की है, और वो इस बारे में ट्वीट भी करते रहे हैं.
उनका कहना है कि वर्ष 2020 में घोषित नई शिक्षा नीति में पूरे देश में अंडरग्रैजुएट कोर्सेज़ के लिए एक ही प्रवेश परीक्षा करवाने की परिकल्पना की गई थी, और सीयूईटी को लागू किया जाना, नई शिक्षा नीति के ही एक हिस्से को लागू करना है.
इसके पीछे की भावना को स्पष्ट करते हुए वो कहते हैं कि ये टेस्ट छात्रों की भलाई को ध्यान में रखकर शुरू किया जा रहा है.
एक इंटरव्यू में वो कहते हैं, "छात्रों के ऊपर बहुत दबाव होता था कि वो 98 प्रतिशत, 99 प्रतिशत नंबर लाएँ क्योंकि कई विश्वविद्यालयों में अगर इतने ज़्यादा परसेंट नंबर नहीं आए तो दाख़िला नहीं मिलता था. इसके साथ ही छात्रों को देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित अलग-अलग विश्वविद्यालयों के लिए प्रवेश परीक्षाओं में बैठना पड़ता था."
वो साथ ही कहते हैं कि एक परीक्षा से छात्रों और उनके अभिभावकों के पैसे बचेंगे क्योंकि उन्हें अलग-अलग परीक्षाओं के लिए फ़ीस भी देनी पड़ती थी.
मगर सीयूईटी लाए जाने के पीछे सबसे बड़ी वजह अलग-अलग परीक्षा बोर्डों में मार्किंग व्यवस्था के अंतर को बताया जा रहा है, क्योंकि बहुत लंबे समय से ये देखा जा रहा था कि कुछ ख़ास बोर्डों के तहत परीक्षा देनेवाले छात्रों को दूसरे बोर्डों के मुक़ाबले ज़्यादा नंबर मिला करते थे, और ऐसे में 12वीं के नंबरों के आधार पर होनेवाली चयन प्रक्रिया में उनका पलड़ा भारी रहता था.
जगदीश कुमार इस बारे में कहते हैं, "अलग-अलग बोर्ड जिस तरह से अलग-अलग तरीके़ से नंबर देते हैं, उससे छात्र एक समान परिस्थिति में चयन प्रक्रिया से नहीं गुज़रते."
जगदीश कुमार ने कहा है कि सीयूईटी के पीछे मुख्य उद्देश्य ये है कि पूरे देश के अंडरग्रैजुएट कोर्सेज़ में एडमिशन के लिए एक ही परीक्षा करवाई जाए, मगर इस वर्ष केवल सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए इसे अनिवार्य किया गया है.
सीयूईटी को लेकर क्या हैं चिंताएँ? क्या कह रहे हैं आलोचक?
सीयूईटी पर सवाल उठाने वाले लोगों की सबसे पहली दलील ये है कि जिस समस्या को सुलझाने के नाम पर इसे लागू किया जाएगा, उसका निदान इससे नहीं निकल सकता.
वामपंथी छात्र संगठन आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन) का आरोप है कि इस व्यवस्था का मक़सद छात्रों को प्रवेश देना नहीं बल्कि उन्हें छाँटना है.
आइसा ने एक बयान जारी कर आरोप लगाया है कि समस्या की असल जड़ ये है कि सरकार 12वीं से आगे की पढ़ाई कर उच्च शिक्षा हासिल करने की चाह रखनेवाले छात्रों को पर्याप्त मौक़े नहीं देना चाहती.
दरअसल, 12वीं से आगे की पढ़ाई के लिए मारामारी इसलिए मचती है क्योंकि छात्र ज़्यादा होते हैं, और सीटें कम.
दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में फ़िजिक्स की प्राध्यापिका डॉक्टर आभा देव हबीब कहती हैं कि सीयूईटी मुख्य रूप से छात्रों को रोकने का तरीक़ा है.
वो कहती हैं, "ये फ़िल्टर लगाने का एक तरीक़ा है कि जितनी सीटें हैं हमें उतने ही छात्र सिस्टम के अंदर चाहिए. तो राहत तो उतने ही छात्रों को मिलेगी, वो चाहे सीयूईटी से हो या परसेंटेज की प्रक्रिया से. समस्या तब तक नहीं सुलझेगी जब तक सीटों की संख्या नहीं बढ़ेगी, जब तक और कॉलेज-विश्वविद्यालय नहीं खुलेंगे."
इस टेस्ट को लेकर एक सवाल ये भी उठ रहा है कि 12वीं की परीक्षा पास कर कॉलेजों में प्रवेश लेते रहे छात्रों के ऊपर अब एक और परीक्षा लाद दी गई है.
कोचिंग संस्थानों के लिए नया बाज़ार
साथ ही एक और बड़ी चिंता ये जताई जा रही है कि अब इस परीक्षा के लिए भी कोचिंग का बाज़ार खड़ा हो जाएगा.
इसके संकेत दिखने भी लगे हैं. बहुत सारे कोचिंग संस्थानों के यहाँ सीयूईटी परीक्षा को 'क्रैक' करवाने का दावा करने वाले कोर्सेज़ के विज्ञापन दिखने शुरू हो गए हैं.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दो महीने पहले इस साल जनवरी में ही अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि सीयूईटी परीक्षा के लिए कोचिंग सेंटर कमर कस चुके हैं, और कई ने कोर्स शुरू भी कर दिए हैं.
ऐसे में इस नई व्यवस्था के आलोचकों की चिंता है कि इससे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कोचिंग संस्थानों का दबदबा उसी तरह बढ़ जाएगा जैसा कि जेईई, नीट, क्लैट जैसी परीक्षाओं के मामले में एक लंबे समय से देखा जा रहा है.
डॉक्टर आभा देव हबीब कहती हैं,"जहाँ-जहाँ फ़िल्टर के नाम पर कोई भी सेंट्रलाइज़्ड परीक्षा रखी गई, चाहे बैंक की परीक्षा हो, चाहे सिविल सेवा की, चाहे जेईई हो, चाहे नेट हो, या नीट हो, वहाँ-वहाँ कोचिंग खुल गए हैं, और एडमिशन उनके पॉकेट में चला जाता है जिनके पास कोचिंग करने के लिए रुपये हैं."
बहरहाल, इस साल केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उनके अधीन आनेवाले कॉलेजों के कैम्पस में पहुँचने की इच्छा रखनेवाले छात्रों के लिए कोई विकल्प नहीं रह गया है.
वर्ष 2022-23 में के लिए सीयूईटी की प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. 6 मई फ़ॉर्म भरने की आख़िरी तारीख़ है. परीक्षा जुलाई में होगी.
सीयूईटी की तरफ़दारी करने वालों का कहना है, इससे नंबरों को लेकर होनेवाली मारामारी कम होगी, छात्र तनाव से बचेंगे.
लेकिन समस्या के हल के लिए सुझाया गया नुस्ख़ा कहीं नई समस्या तो नहीं बन रहा - आलोचक इसपर बारीक़ी से निगाह लगाए बैठे हैं.
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