टीपू सुल्तान की अंग्रेज़ों पर जीत की पेंटिंग नीलाम, क्यों ख़ास है ये कलाकृति

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- Author, अपर्णा अल्लूरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ 1780 में हुई लड़ाई में भारतीय शासकों की अहम जीत को दिखाने वाली एक पेंटिंग लंदन में नीलाम की गई है.
कलाकृतियों की ख़रीद बिक्री करने वाली कंपनी सूदबी ने इस पेंटिंग को बुधवार को क़रीब 6 करोड़ रुपए में नीलाम किया है.
इस पेंटिंग में तब की मैसूर रियासत के सुल्तान हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान को पोलीलूर की मशहूर लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को हराते हुए दिखाया गया है.
'मैसूर टाइगर' के रूप में प्रसिद्ध टीपू सुल्तान एक समय अंग्रेज़ों के सबसे बड़े दुश्मन बन गए थे. हालांकि 1799 में उन्हें अंग्रेज़ों ने हराते हुए मार दिया था.
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जाने माने इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने पोलिलूर की लड़ाई को उकेरनी वाली इस पेंटिंग को 'उपनिवेशवाद की हार दिखाने वाली भारत की सबसे महान तस्वीर' क़रार दिया है.
उन्होंने अपनी पुस्तक 'द एनार्की' में 18वीं सदी के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय के बारे में विस्तार से लिखा गया है. इस किताब में उस लड़ाई को अंग्रेज़ों की 'सबसे ख़राब हार' क़रार देते हुए इसे 'भारत में ब्रिटेन के शासन का लगभग अंत' कहा है.

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पोलिलूर में टीपू को मिली जीत का महत्व
बीबीसी से बातचीत में विलियम डेलरिंपल ने बताया कि टीपू सुल्तान को पोलिलूर की लड़ाई के लिए सेना की कमान पहली बार सौंपी गई थी और उन्होंने उस ज्वार को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पलट दिया.
उस लड़ाई के नज़ारे को सबसे पहले स्वयं टीपू ने ही 1784 में प्रदर्शित किया था. उन दृश्यों को मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टनम के उनके महल 'दरिया दौलत बाग़' की दीवारों और भित्तिचित्रों पर उकेरा गया था.
इनमें से कई दृश्यों को स्याही और वाटरकलर के सहारे कागज़ों पर कम से कम दो बार पेंट किया गया था.
उन्हीं में से एक को 2010 में हुई नीलामी में बेचा गया था. उसे क़तर के म्यूज़ियम आफ़ इस्लामिक आर्ट ने ख़रीदा था. उसे कर्नल जॉन विलियम फ़्रीज़ भारत से इंग्लैंड लाये थे. वो टीपू की हार के बाद श्रीरंगपट्टनम में थे.
उनके परिवार ने उस पेंटिंग को कई पीढ़ियों तक संजोकर रखा था. आख़िरकार उसे 1978 में एक निजी आर्ट कलेक्टर को बेच दिया गया, जिन्होंने 2010 में उसे बेचा दिया.

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ब्रिटेन कैसे पहुंची यह पेंटिंग
सूदबी अभी जो पेंटिंग बेच रही है, उसके बारे में इतना कुछ नहीं पता. चूंकि यह पेंटिंग भी कर्नल फ़्रीज़ की पेंटिंग जैसी ही है, इसलिए माना जाता है कि इसे भी किसी अंग्रेज़ अधिकारी ने इंग्लैंड लाया होगा.
सूदबी के बेनेडिक्ट कार्टर ने इस बारे में बीबीसी को बताया कि इस पेंटिंग को पहली बार अस्सी के दशक के शुरू में किसी नीलामी में देखा गया था. वो कहते हैं कि हम नहीं जानते है कि उसके पहले के 100 सालों में यह पेंटिंग कहां थी.
इस पेंटिंग में 7 सितंबर, 1780 की सुबह हुई लड़ाई को विस्तार से दिखाया गया है. इसमें टीपू की सेना की ख़ूनी जीत को उकेरा गया है.
विलियम डेलरिंपल बताते हैं कि उस समय टीपू ने कर्नल विलियम बेली के नेतृत्व वाली कंपनी की सेना पर घात लगाकर हमला किया था. उनके अनुसार, यह हमला मद्रास (अब चेन्नई) के क़रीब पोलिलूर गांव के पास किया गया था. टीपू के पिता हैदर अली जब तक अपनी सेना को मज़बूत करने पहुंचते, तब तक 'काफ़ी काम हो चुका था.'
32 फ़ीट लंबी यह पेंटिंग, कागज़ के 10 पन्नों पर फैली है. इसमें टीपू सुल्तान को हाथी के ऊपर बैठकर अपनी सेना का मुआयना करते हुए दिखाया गया है.
इस पेंटिंग के दूसरे छोर पर टीपू की घुड़सवार सेना दोनों तरफ़ कंपनी के सैनिकों पर हमला कर रही है. कंपनी के सैनिक अपने घायल कमांडर विलियम बेली की पालकी के चारों ओर एक वर्ग के आकार में खड़े होकर टीपू की सेना से मुक़ाबला कर रहे हैं.
इस पेंटिंग में गोला-बारूद वाली एक एक गाड़ी को विस्फोट में बर्बाद होते दिखाया गया है.

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क्या है इन पेंटिंग्स की ख़ासियत
विलियम डेलरिंपल ने कर्नल बेली के छोटे भाई जॉन के हवाले से एक रिपोर्ट में इस पेंटिग की ख़ूबी बताई है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने इस पेंटिग को आश्चर्य में डालने वाली कलाकृति बताते हुए इसे अद्भुत क़रार दिया.
उनका मानना है कि इसीलिए क़रारी हार के बाद भी कर्नल फ़्रीज़ जैसे अंग्रेज़ अधिकारियों ने उसे दिखाने वाले चित्रों को संजोकर रखा.
लोगों का यह भी मानना है कि जिन दो पेंटिंग्स की नीलामी हुई, वे शुरुआती थे और उसे नमूनों के तौर पर बनाया गया था.
विलियम डेलरिंपल बताते हैं कि टीपू सुल्तान बाद की लड़ाई में अंग्रेज़ों से हार गए थे.
उनके अनुसार, जब वो हारने लगे तो शांति के संकेत के तौर पर अंग्रेज़ों के साथ लड़ी गई ख़ूनी लड़ाइयों की पेंटिग्स को सफ़ेद रंग से रंगने का आदेश दे दिया. लेकिन आर्थर वेलस्ली के आदेश पर टीपू के समय बने श्रीरंगपट्टनम के भित्तिचित्रों को फिर से बहाल करने का आदेश दिया.
डेलरिंपल कहते हैं कि इस तरह हारने के बावजूद टीपू सुल्तान को उनके शानदार सैन्य कौशल के लिए अंग्रेज़ों ने उनका सम्मान किया.
इसलिए इतिहासकार इसे लेकर अचरच में नहीं हैं कि पोलिलूर की लड़ाई में हारने के बावजूद अंग्रेज़ों ने उसकी निशानी को आगे भी बरक़रार रखने का फ़ैसला किया.

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टीपू सुल्तान का महत्व
डेलरिंपल बताते हैं कि टीपू को अंग्रेज़ों ने सबसे ज़्यादा परेशान किया, क्योंकि भारत के तब के शासकों में वही अकेले थे, जिन्होंने अंग्रेज़ों से कभी कोई समझौता नहीं किया.
18वीं सदी के मध्य तक युद्ध से जुड़ी तकनीकों में काफ़ी बदलाव हुए और उससे लड़ाई करने के तरीक़े और नतीज़े पूरी तरह बदल गए. इसका पूरा फ़ायदा अंग्रेज़ों ने उठाया. लेकिन विलियम डेलरिंपल बताते हैं कि उसके बावजूद टीपू 1780 तक अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करने में सफल रहे.
पोलिलूर की लड़ाई में टीपू सुल्तान की सेना के पास बेहतर बंदूकें और तोपें थीं. उनकी घुड़सवार सेना नई खोजों और लड़ने के तरीक़ों में बहुत अच्छे से तैयार थी.
मज़े की बात ये थी कि टीपू की सेना के पास रॉकेट शक्ति थी, जो उनके ऊंटों से दागे जा सकते थे. रॉकेट तकनीक ऐसी चीज़ थी, जिस पर अंग्रेज़ों ने बाद में काम किया और इसे विकसित करने में कामयाब रहे.
हालांकि लगातार प्रयास करने के बावजूद आख़िरकार टीपू को हारना पड़ा. भारत के रियासतों के बीच आपस में कोई स्थायी सहयोग नहीं था, जिसका नुक़सान उन्हें भी उठाना पड़ा.
भारत में आज तेज़ी से हिंदू राष्ट्रवाद की भावना बढ़ती जा रही है. ऐसे दौर में एक मुसलमान शासक के रूप में टीपू सुल्तान की विरासत का फिर से मूल्यांकन हो रहा है. लेकिन पोलिलूर की लड़ाई हमें याद दिलाती है कि भारत पर अंग्रेज़ों की जीत की राह में कभी उन्होंने बाधा खड़ी की थी.
हालत यह थी कि टीपू लड़ाई में जब मारे गए, तो उन्हें हराने वाले अंग्रेज़ उनकी टेन्ट को ब्रिटेन ले गए. वह टेन्ट वहां आज भी है, जो 'मैसूर टाइगर' को हराने पर मिली ट्रॉफी जैसा गर्व उन्हें देती है.
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