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छत्तीसगढ़: सुरक्षाबलों ने मारा था निर्दोष आदिवासियों को
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा से जुड़ी न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्टों पर क्या कभी कोई कार्रवाई होगी? असल में सोमवार को बीजापुर के एडसमेटा कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्तुत की गई.
पहली बार सरकार की ओर से सार्वजनिक की गई इस रिपोर्ट में कहा गया कि बीजापुर के एडसमेटा में 17 मई 2013 को सुरक्षाबल के जवानों ने निर्दोष आदिवासियों को घेर कर एकतरफ़ा गोलीबारी की थी, जिसमें तीन नाबालिग समेत नौ आदिवासी मारे गये थे. तत्कालीन भाजपा सरकार ने तब दावा किया था कि मारे जाने वाले लोग माओवादी थे.
राज्य सरकार के प्रवक्ता और मंत्री रवींद्र चौबे कहते हैं -"हम जब विपक्ष में थे, तब हमने मांग की थी कि मुठभेड़ फर्ज़ी है और प्राइमरी जो रिपोर्ट न्यायिक जांच की सबमिट हुई है, कांग्रेस के जो आरोप थे, वो लगभग उसमें सही पाए गये हैं. अब आगे उसमें एक्शन टेकन के बाद किस तरीक़े से और आदेश जारी होंगे, वो भविष्य की बातें हैं."
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि आयोग ने जो रिपोर्ट दी है, रिपोर्ट में जो अनुशंसा की होगी, उस पर आगे बढ़ना चाहिए.
लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं को भरोसा नहीं है कि सरकार इस पर कोई कार्रवाई करेगी.
बस्तर में आदिवासियों के मामलों में लगातार सक्रिय, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील बेला भाटिया कहती हैं-"एडसमेटा में जो कुछ हुआ, वह बस्तर में कई सालों से हो रहा है. सरकारें इन रिपोर्टों पर कार्रवाई करने में विफल रही हैं."
असल में ये न्यायिक जांच आयोग की कोई पहली रिपोर्ट नहीं है.
जांच आयोग और रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ विधानसभा में 2 दिसंबर 2019 को बीजापुर के सारकेगुड़ा में हुई मुठभेड़ की न्यायिक जांच रिपोर्ट पेश की गई थी. 28-29 जून 2012 की रात बीजापुर के सारकेगुड़ा इलाके में सीआरपीएफ़ और सुरक्षाबलों के हमले में 17 लोग मारे गये थे.
सरकार ने उस समय दावा किया था कि बीजापुर में सुरक्षाबल के जवानों ने एक मुठभेड़ में 17 माओवादियों को मार डाला है. तब राज्य में भाजपा की और केंद्र में यूपीए की सरकार थी. तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने इसे बड़ी उपलब्धि माना था.
लेकिन न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में इस पूरे दावे को फर्जी ठहराते हुए कहा गया कि मारे जाने वाले लोग निर्दोष आदिवासी थे और पुलिस की एकतरफ़ा गोलीबारी में मारे गये थे.
2019 में जब विधानसभा में रिपोर्ट पेश की गई ती, तब राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा था कि सरकार इस रिपोर्ट पर कड़ी कार्रवाई करेगी.
भूपेश बघेल ने कहा था- "17-17 निर्दोष आदिवासी मारे गये हैं और इसके लिये जो भी ज़िम्मेदार हैं, उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी. इस मामले में किसी को बख़्शने का सवाल ही नहीं उठता."
लेकिन इस रिपोर्ट पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.
इसी तरह सुकमा ज़िले के ताड़मेटला, मोरपल्ला व तिम्मापुर में 2011 में 259 आदिवासियों के घरों को जलाए जाने की घटना की न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट इस साल जनवरी में सरकार को सौंपी जा चुकी है. लेकिन रिपोर्ट अब जा कर बुधवार को विधानसभा में पेश की गई. यह जाँच किसी निष्कर्ष पर ही नहीं पहुँची.
यहां तक कि घटना के लगभग नौ साल बाद आई एडसमेटा न्यायिक जांच की रिपोर्ट को पिछले साल जुलाई में ही सरकार को सौंपा गया था. जुलाई और दिसंबर में भी विधानसभा के सत्र थे. लेकिन अब कहीं जा कर सरकार ने न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत किया.
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क्या कहा आयोग ने
बीजापुर के एडसमेटा कांड पर आठ बिंदुओं पर की गई न्यायिक जांच आयोग की 354 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी 'बीज पंडूम' उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए थे.
बीज पंडूम उत्सव में आदिवासी समुदाय, अपनी फसल और मौसम को लेकर पूर्वानुमान लगाते हैं. अलग-अलग इलाक़ों में आम तौर पर अप्रैल से जुलाई तक मंडा, कुंडा, टोंडा, पोदेला के नाम से यह उत्सव चलता है. इसके बाद ही खेती की शुरुआत होती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि सुरक्षा बलों के सदस्यों ने जलती हुई आग और उसके चारों ओर लगभग 25 से 50 व्यक्तियों की भीड़ को देख कर संभवतः उन्हें नक्सली संगठन के सदस्य के रुप में समझा और मान लिया और जैसे दहशत में उन्होंने गोलीबारी शुरु कर दी.
आयोग ने अपनी जांच में पाया कि मारे गये सभी नौ लोग और इस घटना में घायल चार लोगों में से कोई भी नक्सली नहीं था.
जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सुरक्षाबल न तो आवश्यक रक्षा उपकरणों से पूरी तरह सुसज्जित थे, न ही उन्हें उचित जानकारी दी गई थी और ना ही नागरिकों के साथ टकराव से बचने के निर्देश दिए गये थे. मार्चिंग ऑपरेशन शुरु करने से पहले, उचित और आवश्यक सावधानियों का न तो पूरी तरह से पालन किया गया था और ना ही उनका पालन सुनिश्चित किया गया था.
सुरक्षाबल के जवानों में दहशत को लेकर आयोग ने टिप्पणी की है कि कि सुरक्षाबलों द्वारा की गई गोलीबारी आत्मरक्षा में नहीं थी, बल्कि यह गोलीबारी उनकी ओर से 'ग़लत धारणा' और 'घबराहट की प्रतिक्रिया' के कारण प्रतीत होती है. यदि सुरक्षा बलों को आत्मरक्षा के पर्याप्त उपकरणों से सुसज्जित किया गया होता और उन्हें बेहतर खुफिया जानकारी प्रदान की जाती और उन्होंने उचित सावधानी बरती होती तो संभवतः गोलीबारी से बचा जा सकता था.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और बस्तर में फर्जी मुठभेड़ से जुड़े कई मामलों की वकील शालिनी गेरा कहती हैं-"न्यायिक जांच की रिपोर्ट आने से अब तक केवल इतना भर हुआ है कि जिन मामलों में आदिवासियों को माओवादी ठहरा कर मार दिया गया था, कम से कम उनका सच सामने आ जाता है. इस तरह के दूसरे फर्ज़ी मुठभेड़ों के मामलों में, न्यायिक जांच की रिपोर्ट को दृष्टांत की तरह पेश किया जा सकता है."
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झीरम कांड में बदल गये सदस्य
हालांकि, कुछ मामले ऐसी भी हैं, जिनकी रिपोर्ट अब तक अधर में लटकी हुई हैं.
2011 से 2013 के बीच हुई एडसमेटा, ताड़मेटला और सारकेगुड़ा की घटनाओं के लिए जब न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था, तब इन सभी न्यायिक जांच आयोग का कार्यकाल छह महीने रखा गया था. लेकिन छह साल बाद भी आयोग का कार्यकाल लगातार बढ़ता चला गया और अब जाकर रिपोर्ट आई है.
लेकिन कुछ मामलों में जांच का सिलसिला अब भी जारी है.
25 मई 2013 को बस्तर के झीरम घाटी कांड में माओवादी हमले में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं समेत 29 लोगों की मौत की न्यायिक जांच पर भी संशय बना हुआ है.
किसी राजनीतिक दल पर भारत में माओवादियों के इस सबसे बड़े हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष व पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल, पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 29 लोग मारे गये थे.
इस घटना की एनआईए जांच अब तक अटकी हुई है. राज्य सरकार इस मामले की अलग से जांच कर रही है. लेकिन इसके न्यायिक जांच के लिए गठित जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता वाली एकल सदस्यीय आयोग ने 6 नवंबर 2021 को अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को पेश की तो राज्य सरकार ने इसे अधूरी बताते हुए जांच आयोग में नए सदस्यों की नियुक्ति कर दी और जांच के लिए तीन नए बिंदुओं को भी शामिल कर दिया.
ज़ाहिर है, घटना के नौ साल बाद, अभी जांच और लंबी चलने की उम्मीद है.
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क्यों जारी नहीं होतीं जांच रिपोर्ट
बीजापुर के एडसमेटा कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट को लेकर टिप्पणी करते हुए राज्य के पूर्व गृहमंत्री व भाजपा विधायक बृजमोहन अग्रवाल कहते हैं- "जांच रिपोर्ट तो आनी थी झीरम की. जब जांच आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंप दी तो उस रिपोर्ट को क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया? जांच आयोग का कार्यकाल क्यों बढ़ाया गया? उसमें नए सदस्य क्यों जोड़े गए?"
2013 के झीरम कांड की तरह 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा विधायक भीमा मंडावी समेत पांच लोग संदिग्ध माओवादियों के विस्फोट में मारे गये थे. इस मामले की जांच के लिए जस्टिस एससी अग्निहोत्री की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी. इस जांच आयोग की रिपोर्ट अभी तक लंबित है.
बस्तर के आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम कहते हैं-"बस्तर के मामले में सरकारें संवेदनशील नहीं है. जिस कांग्रेस पार्टी का मैं सदस्य हूं, मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आदिवासियों के मामले में पिछले 15 सालों की भाजपा सरकार और अब पिछले 3 सालों की कांग्रेस पार्टी की सरकार में बहुत ज़्यादा फ़र्क मैं नहीं पाता."
नेताम कहते हैं-"हमारी सरकार न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई की कौन कहे, उसे सार्वजनिक तक नहीं करती, इससे अधिक पीड़ादायक और क्या हो सकता है?"
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी इस तरह के न्यायिक जांच आयोग को क़ानून के बजाय जनमत की बाध्यता से जोड़ते हैं.
कनक तिवारी कहते हैं-"इस तरह के न्यायिक जांच आयोग का गठन 1952 के जांच आयोग अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है. जिसकी रिपोर्ट सरकार को जनहित में सार्वजनिक भी करनी चाहिए और उस पर कार्रवाई भी करनी चाहिए. लेकिन इसकी कोई क़ानूनी बाध्यता नहीं है. सरकारें जनमत को हाशिये पर रख कर, ऐसी रिपोर्ट को गोदाम में डाल देती हैं."
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