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उत्तर प्रदेश चुनाव में आम लोगों ने बीजेपी को वोट क्यों दिया
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में धमाकेदार जीत के साथ सरकार बनाने की ओर क़दम बढ़ा दिए हैं.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने 250 से ज़्यादा, उत्तराखंड में 45 से ज़्यादा, गोवा में 20 और मणिपुर में 32 सीटों पर जीत दर्ज की है.
ये चुनाव नतीजे कई मायनों में बहुत अहम हैं क्योंकि ये एक ऐसा चुनाव था जिसमें तमाम विश्लेषकों ने बीजेपी को नुक़सान होने की आशंकाएं जताई थीं.
इस आकलन के लिए महंगाई, बेरोज़गारी से लेकर किसान आंदोलन, आवारा पशुओं की समस्या, कोरोना की दूसरी लहर में फैली अव्यवस्था से उपजी नाराज़गी आदि वजहों को ज़िम्मेदार बताया जा रहा था.
कहा जा रहा था कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की सरकार बन सकती है. लेकिन गुरुवार को आए चुनावी नतीजों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि इन मुद्दों का चुनाव पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा.
ऐसे में सवाल उठता है कि इस चुनाव में ज़मीन पर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से बीजेपी को जीत और समाजवादी पार्टी को विपक्ष में बैठने का मौका मिला है.
साथ ही एक समय में काफ़ी मजबूत पार्टी मानी जाने वाली कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा है.
बीबीसी ने इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए हिंदू बिज़नेसलाइन अख़बार की राजनीतिक संपादक पूर्णिमा जोशी, वरिष्ठ पत्रकार सुहास पलशिकर और वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती से बात की है.
बीजेपी की ये जीत ख़ास क्यों?
भारतीय जनता पार्टी ने भारत में राजनीतिक रूप से सबसे ज़्यादा प्रभावशाली माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है.
इस जीत के साथ योगी आदित्यनाथ बीजेपी में एक बड़े नेता के रूप में उभरकर सामने आए हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी ने बेरोज़गारी, किसान आंदोलन और महंगाई जैसे ज़मीनी मुद्दों को लेकर आम लोगों की नाराज़गी के बावजूद इतना प्रचंड बहुमत कैसे हासिल किया है.
गुरुवार सुबह से आ रहे रुझानों और इसके बाद नतीजों में बदले जीत के आंकड़ों को गहनता से देखने के बाद वरिष्ठ पत्रकार सुहास पलशिकर बीजेपी की इस जीत का श्रेय उसके विशेष राजनीतिक कौशल को देते हैं.
वे कहते हैं, "बीजेपी ने एक ऐसी स्किल हासिल की है जिसकी वजह से लोगों की ज़िंदगियां सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले मुद्दे मतदान के मुद्दों में नहीं बदल पाते. मतदान अलग मुद्दों पर होता है. मतदान के दौरान जो मुद्दे अहम हो जाते हैं, उनमें से पहला मुद्दा है, हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विभाजन का मुद्दा.
बीजेपी ने एक हिंदू वोट बैंक तैयार कर लिया है. बीजेपी ने स्पष्ट रूप से बता दिया है कि हमारी पार्टी मोदी जी की पार्टी है और इस व्यक्तित्व का असर लोगों के दिलो-दिमाग़ के साथ-साथ मतदान पर भी दिखता है.
और तीसरी बात ये रहती है कि सरकार की जो ख़ामियां हैं, वो राज्य सरकार की ख़ामियां मानी जाती हैं. उन्हें केंद्र सरकार की कमियां नहीं माना जाता है. इसका परिणाम ये रहता है कि जो भी कमियां होती हैं, उनके बावजूद लोग बीजेपी को वोट देते रहते हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में ये कारण दिखाई पड़ते हैं."
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बीजेपी क्यों जीती, सपा क्यों नहीं?
बीते कई महीनों से जारी चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने कई योजनाओं की शुरुआत की. विकास के मुद्दे से लेकर अलग-अलग जातियों और महिलाओं की सुरक्षा से लेकर अपराध एवं राशन देने जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ने की कोशिश की.
इसके साथ ही साथ समय-समय पर 'अस्सी बनाम बीस' जैसे बयान भी आते रहे. ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी की जीत में किस रणनीति का कितना योगदान रहा.
क्या महिला सुरक्षा जैसे ज़मीनी मुद्दों पर बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल में समर्थन मिला या वजह कुछ और रही.
इस मुद्दे पर हिंदू बिज़नेस लाइन की राजनीतिक संपादक पूर्णिमा जोशी मानती हैं कि बीजेपी की रणनीति के कोर में हिंदुत्व है और उसके साथ तमाम अन्य मुद्दे हैं.
वे कहती हैं, "बीजेपी के बारे में कहा जा सकता है कि वह अलग-अलग मोर्चों पर चुनाव लड़ते हुए आख़िरी दम तक संघर्ष करती है. पीएम मोदी सातवें चरण के मतदान से पहले दो-तीन दिन तक बनारस में रहे. वे कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. ऐसे में बात ये है कि बीजेपी जीतने के लिए पूरे दम से लड़ती है.
रणनीति की बात करें तो हिंदुत्व तो एक लगातार उठाया जाने वाला मुद्दा है. उसमें कोई उतार-चढ़ाव रहता नहीं है. उसमें 80-20 के नारे और साइकिल पर बम जैसे नारे आते ही रहते हैं. कहते हैं कि एक जाति है हिंदुत्व और उसमें कई जातियां सम्मिलित होती जाती हैं. इसमें लाभार्थी भी मिल जाते हैं. महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ जाता है. बुलडोज़र का मुद्दा भी जुड़ जाता है.
शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के लिए उनकी सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा था. साथ ही बीजेपी ने परसेप्शन की लड़ाई जीती है, उसे आप गोदी मीडिया कह लीजिए या कुछ और. लेकिन बीजेपी परसेप्शन की लड़ाई में हमेशा सबसे आगे रहती है. ऐसे में हिंदुत्व के साथ महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा, बुलडोज़र बाबा की छवि और इसके साथ ही कल्याणकारी योजनाओं की वजह से लाभार्थियों का समर्थन बीजेपी को मिला. इसके साथ ही प्रशासन का तंत्र उनके साथ था. उनका अपना संगठन उनके साथ रहता है. दूसरी पार्टियों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है. समाजवादी पार्टी के साथ जातियां जुड़ी हुई हैं. लेकिन कांग्रेस के साथ तो ये भी नहीं है."
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नतीजों से भविष्य के लिए संकेत
गुरुवार शाम के बाद से ही चुनावी नतीजों और इसके बीजेपी की आंतरिक संरचना और राष्ट्रीय राजनीति पर असर को लेकर चर्चा जारी है.
सोशल मीडिया से लेकर टीवी तक पर लोग इन चुनावी नतीजों का अपने-अपने अंदाज़ में आकलन कर रहे हैं.
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या बीजेपी के लिए ये एक और चुनाव जीत जाना है, जैसे पश्चिम बंगाल में एक चुनाव हार जाना था, या इसके कुछ अलग मायने हैं.
बीबीसी और इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बारों के साथ जुड़ी रही वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती मानती हैं कि ये बीजेपी की वैचारिक जीत है.
वे कहती हैं, "आंकड़ों के आधार पर उत्तर प्रदेश में जिस स्तर की आर्थिक बदहाली है, महंगाई का मुद्दा है और बेरोज़गारी की समस्या जैसे गंभीर मुद्दे हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ करके बीजेपी की राजनीति को समर्थन दिया गया है. ऐसे में ये जनता की बात है.
मैं यहां ये बात स्पष्ट रूप से कहना चाहती हूं कि जैसे समाजशास्त्री एक दौर को कांग्रेस के युग की संज्ञा दिया करते थे. उसी तरह इस समय आप बीजेपी के युग की शुरुआत को देख रहे हैं. इस समय जिस एक विपक्षी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है, वह आम आदमी पार्टी है. क्षेत्रीय पार्टियां जैसे बसपा, अकाली दल जैसी पार्टियों का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा है.
ये चुनावी नतीजे बीजेपी की वैचारिक जीत हैं क्योंकि लोगों के हालात बद से बदतर हुए हैं, इसके बाद भी उन्होंने बीजेपी को वोट दिया है. ऐसे में इसे समझने और स्वीकार करने की ज़रूरत है."
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