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उत्तर प्रदेश चुनाव में योगी आदित्यनाथ की ऐतिहासिक जीत के 6 कारण
- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"बीजेपी कई फ्रंट पर काम कर रही है. वो एक एजेंडे पर चलने वाली पार्टी नहीं है. वो गवर्नेंस पर भी काम करती है, लाभार्थी का भी नैरेटिव बनाती है. वो सुरक्षा के नाम पर, केंद्र सरकार की जो योजनाएं हैं उनके नाम पर महिलाओं को भी आकर्षित करती है. उसके अलावा वो सोशल इंजीनियरिंग पर भी काम करती है. ये सब मिलाकर उसका सम्मिलित प्रभाव ये होता है कि उसे कुल मिलाकर चौथी बार (2014, 2017, 2019, 2022) जीत मिलने जा रही है."
ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का जो बीजेपी के कामों पर पैनी नज़र रखने के लिए जाने जाते हैं.
वे बताते हैं कि "इसके साथ ही योगी आदित्यनाथ एक इतिहास रचने जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश में पहली बार कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा जो पांच साल सत्ता में रहने के बाद फिर से लौट कर आएगा."
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी दोबारा सत्ता हासिल करने की तरफ़ बढ़ रही है. यूपी में (लगभग 55) सीटें कम होने और अखिलेश यादव की सपा के (क़रीब 80) सीटें बढ़ने के बावजूद बीजेपी जीत हासिल करने की ओर बढ़ रही है.
बीजेपी की सत्ता में वापसी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. हालांकि जानकारों का ये भी कहना है कि इसमें रोज़गार जैसे अहम मुद्दे पीछे छुप गए हैं. यहां हम उन कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं जो योगी आदित्यनाथ को सत्ता में वापस लाने की अहम वजह माने जा रहे हैं.
1. रणनीति बहुत पहले बनाना अहम
साल 2014 में केंद्र में सत्ता हासिल करने के बाद से बीजेपी के बारे में जानकार ये कहते रहे हैं कि वो चुनावों की रणनीतियां बहुत पहले ही बना लिया करती है.
प्रदीप सिंह कहते हैं, "इस बार भी ये कहा गया कि जहां अन्य पार्टियां चुनाव के पास आने पर अपनी रणनीतियां बनाती हैं, वहीं बीजेपी बहुत पहले से ही उसे अमल में ले आती है. अखिलेश भी देर से मैदान में कूदे."
"समय पर निर्णय लेना भी बीजेपी के पक्ष में रहा. किसान आंदोलन उनकी गले की फांस बनता दिख रहा था तो केंद्रीय नेतृत्व ने तीन विवादास्पद क़ानूनों को निरस्त करने का फ़ैसला ले लिया और उसे अमली जामा भी पहना दिया."
वे कहते हैं, "बीजेपी की जीत में जातीय संतुलन को साधने में कोई कोर कसर न छोड़ना भी बड़ी वजह रही. अपना दल को उन्होंने नहीं छोड़ा और निषाद पार्टी का साथ भी लिया."
प्रदीप सिंह कहते हैं, "बीजेपी कई फ़्रंट पर चुनाव लड़ती है. आखिरी दम तक चुनाव लड़ती है. प्रधानमंत्री दो-तीन दिन वहीं पर रहे. वो कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. बीजेपी जीतने के लिए लड़ती है. कई मुद्दों पर लड़ती है. बाकी मुद्दे तो साइड में चलते ही रहते हैं, हिंदुत्व का मुद्दा उनके समानांतर लगातार चलता रहता है."
2. हिंदुत्व का एजेंडा और माया का सफाया
हिंदुत्व का मुद्दा इस चुनाव में भी एक बड़ा मुद्दा रहा. हिंदुओं की एकता और राम मंदिर जैसे एजेंडे पर बीजेपी पहले से ही काम करती आ रही है. संघ का ये एक बड़ा रणनीतिक एजेंडा भी है कि सभी हिंदू एक प्लेटफॉर्म पर आएं.
वरिष्ठ पत्रकार पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "संघ हिंदुओं को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के अपने एजेंडे में ये मानता रहा है कि मायावती की पार्टी, लोकदल या अखिलेश की पार्टी इसमें बाधा है. इस चुनाव में उन्होंने एक बाधा हटा दी है. दलितों की पार्टी को उन्होंने ख़त्म कर दिया है. उनका वोट प्रतिशत 9 से 10 फ़ीसद घट गया है. वे इस चुनाव में वे निर्विकार (उदासीन) भाव से लड़ रही थीं."
चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह ने बयान दिया था कि मायावती मजबूती से चुनाव लड़ रही हैं. उसके क्या मायने हैं.
इस पर पूर्णिमा कहती हैं कि एक तो मुसलमान का वोट थोड़ा बंट जाए और दूसरा कि दलित का वोट सपा की तरफ़ न जाए.
"सपा के वोट 21 से बढ़कर 31-32 फ़ीसदी होते दिख रहे हैं. इसका मतलब ये दिख रहा है कि उन्होंने वोट बहुत काटे हैं. ऐसा दिखता है कि ओबीसी में जो बड़ी जातियां हैं अखिलेश उनको अपनी ओर कर सके हैं लेकिन दलित वोटों में से काफी कुछ बीजेपी के पक्ष में जाता दिख रहा है."
लेकिन बीजेपी की सीटें घटती हुई दिख रही हैं. इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि सीटें ज़रूर घटी हैं लेकिन वोट प्रतिशत बढ़ा है.
सीएसडीएस के चुनाव विश्लेषक संजय कुमार भी कहते हैं कि वो जीत को वोट प्रतिशत के आधार पर मानते हैं और उनका आकलन वोट प्रतिशत बढ़ने के आधार पर भी था.
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का आकर्षण बरकरार है. वोट शेयर बढ़ने की पीछे एक अहम कारण वो चुनाव से बीएसपी की बेरुखी को बताते हैं.
वे कहते हैं, "बीएसपी चुनाव में एक्टिव नहीं है लिहाजा उसके वोट ट्रांसफर हुए हैं और उसका लाभ बीजेपी को मिला है."
3. लॉ ऐंड ऑर्डर
योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान अलीगढ़ की रैली में कहा था, "पहले उत्तर प्रदेश की पहचान अपराध और गड्ढों से होती थी. पहले हमारी बहनें और बेटियां सुरक्षित नहीं थीं. यहां तक कि भैंस और बैल भी सुरक्षित नहीं थे. आज ऐसा नहीं है."
बीजेपी ने इस मुद्दे को बहुत बड़ा रूप देने की कोशिश की थी. ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने भी क़ानून-व्यवस्था का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था, "एक दौर था जब शासन प्रशासन गुंडों और माफियाओं की मनमानी से चलता था लेकिन अब वसूली करने वाले माफ़िया राज चलाने वाले सलाखों के पीछे हैं. राजकाज को भ्रष्टाचारियों के हवाले कर दिया गया था. आज योगी जी की सरकार पूरी ईमानदारी से यूपी के विकास में जुटी हुई है."
सी-वोटर्स के यशवंत देशमुख कहते हैं कि राज्य में क़ानून व्यवस्था बेशक एक बड़ा मुद्दा था, उसका श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को.
लेकिन वो साथ ही इससे बड़ा मुद्दा केंद्र की योजनाओं को बताते हैं.
4. शौचालयों की भूमिका और महिलाओं के वोट
यशवंत देशमुख कहते हैं, "बुलडोज़र बाबा की इमेज़ ने एक भूमिका ज़रूर अदा की लेकिन इस जीत में प्रदेश में बनाए गए शौचालयों ने भी अपनी बड़ी भूमिका अदा की."
देशमुख कहते हैं कि "महिलाओं के साथ देश के किसी भी इलाके में जो सबसे अधिक यौन शोषण की घटनाएं होती हैं उनमें एक बड़ा हिस्सा अल सुबह और देर शाम अंधेरे में खेतों में शौच करने जाती महिलाओं के साथ होती हैं. शौचालय का बनना महिलाओं के लिए केवल सफ़ाई का मुद्दा नहीं था ये उनके लिए सुरक्षा, उनकी अस्मिता का मुद्दा था."
"महिलाएं मुद्दे पर आधारित वोट देती हैं. उनका पुरुष या महिला प्रत्याशी के चेहरे से कुछ ज़्यादा लेना देना नहीं होता है. इसे आप उत्तर प्रदेश में ही न देखें, ये आपको उत्तराखंड में भी दिख जाएगा. वहां तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को बदलने के बावजूद बीजेपी बढ़त में दिख रही है. बीजेपी के वर्तमान मुख्यमंत्री हार गए. इसके क्या मायने निकालेंगे."
"लोगों में प्रदेश सरकार, मुख्यमंत्री और विधायकों के प्रति गुस्सा था. ये गुस्सा था तब ही बीजेपी की यूपी में सीटें घटी हैं और सपा की सीटें बढ़ी हैं. लेकिन इस गुस्से को काटते हुए पीएम मोदी की इमेज भी थी और उनकी योजनाएं भी थीं. तो जहां जिन योजनाओं की डिलिवरी हुई है वहां उन पर मोहर लगी है."
"आप गोवा का उदाहरण भी देख सकते हैं. वहां जो हाल था उसके बीच में बीजेपी को दोबारा बहुमत मिल जाता है. मणिपुर में जहां बीजेपी पांच साल पहले नंबर दो की पार्टी थी आज नंबर-1 की पार्टी बन रही है. कहीं न कहीं एक अंडरलाइन सेंटिमेंट है और इसके पीछे बहुत सी चीज़ों की डिलीवरी थी."
5. लाभार्थी योजनाएं और महिलाओं के वोट
2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को मिली जीत को उनके लोकप्रिय उज्ज्वला योजना से बड़े पैमाने पर जोड़ा गया. इसमें ग्रामीण महिलाओं को गैस सिलिंडर का लाभ मिलता है. कई जानकारों की नज़र में इस योजना ने मोदी सरकार के प्रति महिलाओं का समर्थन बढ़ाने का काम किया था.
2019 के चुनावों और उससे पहले असम, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं के वोट अधिक मिले थे.
पूर्णिमा जोशी बताती हैं कि, "राशन के मुद्दे पर यूपी में लोगों के बीच में ये प्रचारित किया गया कि मोदी का नमक खाया है. उसके अलावा गैस, प्रधानमंत्री सम्मान निधि, टॉयलेट जैसे और कई मुद्दे हैं जिन पर लोगों ने वोट दिए हैं."
सी-वोटर्स के यशवंत देशमुख कहते हैं कि, "इसे विकास की जीत से बेहतर गवर्नेंस के डिलिवरी की जीत कहा जाए. राशन मिला है, छत मिली है, शौचालय बने हैं और अकाउंट में रुपये आए हैं. इन सभी मुद्दों के भी ऊपर प्रदेश की महिलाओं ने बीजेपी के पक्ष में वोट दिया. प्रदेश के पुरुषों ने मूल रूप से जाति समीकरण और सांप्रदायिक आधार पर काफी हद तक वोट दिया. महिला मतदाताओं की वजह से भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल हुई है. ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं है."
6. हिंदू-मुसलमान का मुद्दा
चुनाव प्रचार के दौरान हिंदू-मुसलमानों के नाम पर वोटो के धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशें भी की गईं.
इस पर देशमुख कहते हैं, "ये तो इस चुनाव में मुद्दा ही नहीं होना था क्योंकि वोट तो अन्य मुद्दों पर मिलने ही थे. हिंदू और मुसलमानों के वोट तो क्रमशः बीजेपी और सपा को पड़ने ही थे. केवल बीजेपी के हिंदू वोटों की ही बात क्यों करें. सपा का जो वोट ग्राफ़ बढ़ा है वो भी तो मुसलमान वोटों की बदौलत ही बढ़ा है."
लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश ने ऐसा कोई भी बयान नहीं दिया जिनका मतों के धार्मिक ध्रुवीकरण से वास्ता था.
इस पर देशमुख कहते हैं कि "क्या बयान नहीं देने मात्र से ये जो वोट पड़ रहे हैं उसका धार्मिक ध्रुवीकरण जो हुआ उससे कोई वास्ता न होना साबित हो जाता है. फिर जो अखिलेश को वोट पड़े हैं उसमें मुसलमान मतदाताओं का योगदान कैसे ज़्यादा है? वो किस एजेंडे पर है? सिर्फ एक ही एजेंडे पर है न कि हमको किसी भी कीमत पर बीजेपी को हराना है."
वे कहते हैं, "ठीक ऐसे ही योगी की बुलडोज़र बाबा की जो इमेज़ है उसके पीछे धार्मिक एजेंडा नहीं है. माफिया के ख़िलाफ़ उन्होंने जो भी अभियान चलाया उसमें एक साम्प्रदायिक रंग था."
"मैं ये बात मानने से इनकार करता हूं कि मुसलमान बीजेपी को हराने के लिए वोट दें तो वो सेक्युलर वोटिंग है और हिंदू बीजेपी को वोट दे तो ये कम्यूनल वोटिंग है."
अंत में प्रदीप सिंह कहते हैं कि "सपा मुस्लिम यादव से आगे नहीं बढ़ सकी है. इस बार भी जो उसकी सीटें जो बढ़ी हैं उसमें मुस्लिम वोटों का ही उन्हें फायदा मिला है. बीएसपी के वोट का गिरना बीजेपी के लिए तो अच्छे संकेत हैं लेकिन सपा के लिए अच्छा नहीं हैं. क्योंकि अगले चुनाव में 2024 और 2027 में जो बीएसपी के जाटव वोट हैं उसमें और ज़्यादा बंटवारा होगा और ये बीजेपी की तरफ़ जाएगा."
वहीं रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि बीजेपी की ये जीत इस साल होने वाले राज्यसभा चुनाव और राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर बहुत अहम माने जा रहे हैं.
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