मध्य प्रदेश: महिला जज को बहाल करने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर क्यों नहीं है एक राय

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- Author, सुचित्र के. मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ़्ते गुरुवार को मध्य प्रदेश की एक महिला जज को एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के पद पर फिर से बहाल करने का आदेश सुनाया.
देश की शीर्ष अदालत के इस आदेश के बाद इस मामले के विभिन्न पहलुओं को लेकर देश के क़ानूनी जानकार आपस में उलझ से गए हैं. कई लोग इस फ़ैसले को महिला जज के साथ हुआ न्याय कहकर इस मामले को यहीं ख़त्म बता रहे हैं.
वहीं कई जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से ज़ाहिर होता है कि अभी भी महिला जज के साथ पूरा न्याय नहीं हुआ है.
क्या हैमामला?
इस प्रकरण की शुरुआत साल 2014 में हुई, जब महिला जज ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक पुरुष जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. उनके आरोपों की जांच के लिए बनी समिति ने आरोपों को सही नहीं पाया.
उसके बाद जजों के ट्रांसफ़र करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट ने महिला जज का ट्रांसफ़र ग्वालियर से दूर राज्य के उत्तर पूर्वी ज़िले सीधी ज़िले में कर दिया . तब महिला जज ने अपनी बेटी की पढ़ाई प्रभावित होने का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पोस्टिंग और ट्रांसफ़र करने वाले अधिकारियों से दो तरह के अनुरोध किए.
एक तो कि उनका ट्रांसफ़र राज्य के चार शहरों में से कहीं कर दिया जाए या ऐसा न हो सके तो उनका ट्रांसफ़र आठ महीने के लिए रोक दिया जाए. उनका तर्क था कि ऐसा करने से 12वीं क्लास की स्टूडेंट रही उनकी बेटी की पढ़ाई पर असर नहीं होगा.
हालांकि उनकी मांग को अधिकारियों ने ख़ारिज कर दिया. बाद में उन्होंने जुलाई 2014 में अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़ा देने के कुछ हफ़्तों बाद उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अपील की और कहा कि उन्हें इस्तीफ़ा देने को मजबूर किया गया, इसलिए उनके साथ न्याय किया जाए.

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सुप्रीम कोर्ट में अपील
लेकिन मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उनका तर्क मानने से इनकार कर दिया और कहा कि अब उन्हें फिर से बहाल नहीं किया जा सकता. हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद महिला जज 2018 में अपना केस लेकर सुप्रीम कोर्ट आईं और अब शीर्ष अदालत ने अपने फ़ैसले में माना है कि वाक़ई उन महिला जज को इस्तीफ़ा देने वाले हालात पैदा किए गए.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से उन्हें एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के पद पर फिर से बहाल करने को कहा है. अदालत ने यह भी कहा है कि उनकी सेवा अवधि में कोई अंतराल नहीं माना जाएगा.
हालांकि बीते साढ़े सात साल के वेतन देने की उनकी मांग सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दी, लेकिन वो सेवा के दौरान मिलने वाले अन्य लाभ पाने की की हकदार होंगीं.
क़ानूनी जानकारों की अलग-अलग राय
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर देश के क़ानूनी जानकार एकमत नहीं हो पा रहे हैं.
कई क़ानूनी जानकार कह रहे हैं कि चूंकि आरोपों की जांच करने वाले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति ने हाई कोर्ट के पुरुष जज (अब रिटायर्ड) के ख़िलाफ़ कोई सबूत न मिलने पर उन्हें दोषमुक्त क़रार दे दिया था, इसलिए अब यह मामला यहीं ख़त्म हो गया है.
दूसरी ओर, कई क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इन-हाउस समिति ने महिला जज के साथ न्याय नहीं किया. इन लोगों का तर्क है कि हाईकोर्ट जज के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न करने के कई सबूत हैं, लिहाजा उनके ख़िलाफ़ नई एफ़आईआर दर्ज़ करते हुए फिर से जांच शुरू की जानी चाहिए.

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जांच समिति पर सवाल
जेसिका लाल, नैना साहनी (तंदूर कांड) और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांडों सहित कई अहम और ऐतिहासिक फ़ैसले देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आरएस सोढ़ी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने चूंकि महिला जज को फिर से बहाल कर दिया है, तो इसका मतलब यह हुआ कि हाई कोर्ट की इन-हाउस समिति ने सही ढंग से अपना काम नहीं किया.
जस्टिस (रिटायर्ड) सोढ़ी ने बीबीसी से कहा, "एक बार जब यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए और यह माना गया कि आरोप अच्छी तरह से स्थापित है. फिर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें (महिला जज को) बहाल भी कर दिया, तो ऐसा लगता है कि इन-हाउस समिति ने सही ढंग से काम नहीं किया."
उनका मानना है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उन जज को अब दोषी ठहराया जाना चाहिए था. उन्होंने कहा, "ताज़ा फ़ैसले के बाद अब एक नई एफ़आईआर दर्ज़ की जा सकती है और वो जज इससे बच नहीं सकते."
उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 10 फ़रवरी के फैसले में महिला जज को नौकरी पर बहाल करने का आदेश और इन-हाउस समिति की रिपोर्ट में हाईकोर्ट जज को दोषमुक्त करना, दोनों एक दूसरे के विरोधाभासी मालूम पड़ते हैं.
जस्टिस (रिटायर्ड) सोढ़ी ने कहा, "प्रशासनिक आदेश (इन-हाउस समिति की रिपोर्ट) को ज्यूडिशियल कोर्ट के सामने भी चुनौती दी जा सकती है और सबूतों को देखते हुए उसे रद्द किया जा सकता है."
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता और आपराधिक मामलों की मशहूर वकील कामिनी जायसवाल ने भी कहा कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 'पुरुष जज के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के पर्याप्त सबूत हैं.'
उन्होंने बीबीसी से कहा, "उन जज के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं. मेरी राय में, यदि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से मुक्त किया जा सकता है, तो उसी आरोप से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उन जज को मुक्त करना एक छोटी सी बात है."

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कामिनी जायसवाल कहती हैं कि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के मामले को देखते हुए 'इतिहास यहां ख़ुद को दोहरा रहा है.' उन पर सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. और उस मामले में भी जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद उन महिला कर्मचारी को भी बहाल कर दिया गया.
जायसवाल ने सवाल उठाते हुए कहा, "यह सिस्टम कैसे काम करता है, यह देखना अजीब अनुभव है." उन्होंने यह भी कहा कि उनकी राय में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज के ख़िलाफ़ फिर से जांच शुरू करनी चाहिए.
'मामला यहीं ख़त्म हो गया '
वहीं सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि ऐसा लगता है कि उन महिला जज ने हताशा में अपना इस्तीफ़ा दिया और हाईकोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने कोई सबूत इकट्ठा नहीं किया.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच होती है. इस मामले में इन-हाउस कमेटी ने पाया कि हाईकोर्ट जज के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप ग़लत हैं. यह भी लगता है कि महिला जज ने उस हताशा में अपना इस्तीफ़ा दिया. इसलिए बहाली और इस्तीफ़े का काम देखने वाले अधिकारियों ने कहा कि वो वैध इस्तीफ़ा नहीं है."
दिल्ली हाईकोर्ट के एक अन्य रिटायर्ड जज ने बीबीसी से कहा कि यह सर्वोच्च न्यायालय का "सबसे न्यायसंगत आदेश" और "सही और उचित फ़ैसला" है. हालांकि, उन्होंने कहा कि यह सही बात है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज ने उन महिला जज को किसी कार्यक्रम वग़ैरह के लिए बुलाया था. यह एक तथ्य है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एसआर सिंह ने बीबीसी को बताया कि इन-हाउस समिति द्वारा हाईकोर्ट जज को क्लीन चिट दिए जाने के बाद इस मामले में अब कुछ भी नहीं बच गया है.
उन्होंने कहा, "यदि अदालत की इन हाउस समिति द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोपों को ग़लत पाया जाता है, तो मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज के ख़िलाफ़ फिर से एफ़आईआर दर्ज़ करने का कोई आधार नहीं है."
उन्होंने स्पष्ट किया, ''चूंकि महिला जज ने हताशा में अपना इस्तीफ़ा दिया, इसलिए हम कुछ नहीं कह सकते. हाईकोर्ट की इन-हाउस समिति ने हाईकोर्ट जज को क्लीन चिट दे दी और सुप्रीम कोर्ट ने भी महिला जज को बहाल कर दिया. इसलिए अब यह मामला तार्किक रूप से ख़त्म हो गया है."
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