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पीएम मोदी के कोरोना काल में मज़दूरों के पलायन के दावे और सवाल
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
24 मार्च 2020 को कोरोना के ख़तरों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में 21 दिनों के पहले संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी. कोरोना को रोकने के लिए घरों से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई थी. देश में हर गली, मोहल्ले, कस्बे, ज़िले में लॉकडाउन लगा दिया गया.
फिर देखते-देखते देश के अलग इलाकों में कामगारों के सामने कोरोना के साथ-साथ रोज़ी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया. चौतरफा मुसीबतों के बीच अधिकतर श्रमिकों के सामने यही रास्ता बचा था कि वो किसी तरह अपने घर लौट जाएँ. लेकिन लॉकडाउन में यातायात पर प्रतिबंध लगा हुआ था.
ऐसे मुश्किल हालात में लाखों की संख्या में श्रमिक अपने बूते घरों की तरफ चल दिए. कोई पैदल था, कोई साइकिल से, कहीं ट्रकों में भरकर तो कहीं ट्रेन की पटरियों पर चलते हुए लोग अपने घरों की तरफ पहुंच रहे थे. अधिकतर श्रमिकों का पलायन उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ हो रहा था. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पंजाब, अहमदाबाद जैसी जगहों से लंबे समय तक पलायन जारी रहा.
पहले लॉकडाउन के करीब दो साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रमिकों के पलायन के लिए अब महाराष्ट्र और दिल्ली सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है.
सोमवार को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने कहा, "पहली लहर के दौरान देश जब लॉकडाउन का पालन कर रहा था. सारे हेल्थ एक्सपर्ट कह रहे थे कि जो जहां है वहीं पर रुके. सारी दुनिया में ये संदेश दिया जाता था, क्योंकि मनुष्य कहीं जाएगा और वो कोरोना से संक्रमित है तो कोरोना साथ ले जाएगा. तब कांग्रेस के लोगों ने क्या कहा, मुंबई के रेलवे स्टेशन पर खड़े रहकर, मुंबई छोड़कर जाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, मुंबई में श्रमिकों को टिकट दिया गया, मुफ्त में टिकट दिया गया. लोगों को प्रेरित किया गया कि जाओ. महाराष्ट्र में हमारे ऊपर जो बोझ है वो जरा कम हो, तुम उत्तर प्रदेश के हो, तुम बिहार के हो, जाओ वहां कोरोना फैलाओ, आपने बहुत बड़ा पाप किया.''
प्रधानमंत्री ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा, "उस समय दिल्ली में ऐसी सरकार थी, जो है. उस सरकार ने जीप पर माइक बांधकर दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में गाड़ी घुमा कर के लोगों को कहा संकट बड़ा है, भागो, गांव जाओ, घर जाओ, और दिल्ली से जाने के लिए बसों ने भी आधे रस्ते छोड़ दिया और श्रमिकों के लिए मुसीबतें पैदा की. उसका कारण हुआ कि यूपी में, उत्तराखंड में पंजाब में जिस कोरोना की इतनी गति नहीं थी. इतनी तीव्रता नहीं थी इस पाप के कारण कोरोना ने वहां भी अपनी चपेट में ले लिया.''
पीएम मोदी के बयान पर पलटवार
प्रधानमंत्री के बयान पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री जी का ये बयान सरासर झूठ है. देश उम्मीद करता है कि जिन लोगों ने कोरोना काल की पीड़ा को सहा, जिन लोगों ने अपनों को खोया, प्रधानमंत्री जी उनके प्रति संवेदनशील होंगे. लोगों की पीड़ा पर राजनीति करना प्रधानमंत्री जी को शोभा नहीं देता.''
सीएम अरविंद केजरीवाल के बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी पीएम मोदी के बयान का जवाब दिया. गोवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रियंका गांधी ने कहा, "क्या पीएम मोदी ये चाहते थे कि गरीबों को असहाय छोड़ दिया जाता, जब वे पैदल ही अपने घर लौटना शुरू हो गए थे. जिन लोगों को उन्होंने छोड़ दिया था, उनके पास घर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा था. वे लोग पैदल ही अपने घर जाना शुरू हो गए थे. क्या वे ये चाहते थे कि किसी को उनकी मदद नहीं करनी चाहिए थी? मोदी जी चाहते क्या थे? मोदी जी चाहते क्या हैं?''
ऐसे में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कोरोना महामारी को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के इस आक्रामक रवैये की क्या वजह हो सकती है?
लखनऊ में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "कोरोना काल में यूपी में जिस तरह लोग परेशान हुए. गंगा में लाशें बहीं और जो तबाही हुई वो एक चुनावी मुद्दा बन गई है. सरकार बचाव में सफाई देती हुई दिख रही है. सरकार अपनी गलती छुपाने की कोशिश कर रही है. सरकार बचाव की मुद्रा में है.''
लॉकडाउन को लेकर कितनी तैयार थी केंद्र सरकार ?
दो साल पहले हुए श्रमिकों के पलायन पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है. लेकिन क्या श्रमिकों के पलायन को रोका जा सकता था ? क्या पलायन से कोरोना फैला ? जब केंद्र सरकार ने कोरोना की रोकथाम की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए जब देशभर में लॉकडाउन लगाया, तो उसने इसके लिए कैसी तैयारी की थी?
सूचना के अधिकार क़ानून 2005 के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए, बीबीसी ने केंद्र सरकार की प्रमुख एजेंसियों, संबंधित सरकारी विभागों और उन राज्य सरकारों से संपर्क किया था, जो इस महामारी के असर से सीधे तौर से निपटने में जुटे थे.
बीबीसी ने पूछा था कि प्रधानमंत्री की घोषणा से पहले, क्या उन्हें पता था कि देश भर में एक साथ लॉकडाउन लगने वाला है? या फिर उन्होंने अपने विभाग को सरकार के इस क़दम के बाद की स्थिति से निपटने के लिए कैसे तैयार किया? उन्होंने किन क्षेत्रों में काम किया, जिससे कि वो लॉकडाउन को प्रभावी ढंग से लागू कर सकें और इसके विपरीत असर से भी निपट सकें?
बीबीसी ने अपनी व्यापक पड़ताल में पाया था कि लॉकडाउन के बारे में न तो पहले से किसी को कोई जानकारी थी और न ही बीबीसी को इसकी तैयारी किए जाने के कोई सबूत मिले.
इस पड़ताल को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं- कोरोना लॉकडाउन का फ़ैसला मोदी सरकार ने आख़िर किसकी सलाह पर लिया? -बीबीसी पड़ताल
पहले लॉकडाउन के दौरान मुंबई के अलग अलग रेलवे स्टेशनों पर हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. तब महाराष्ट्र सरकार पर सवाल उठे कि जब महाराष्ट्र में कोरोना के संक्रमण के सबसे ज़्यादा मरीज़ हैं तो आख़िर वहां हज़ारों की संख्या में लोग स्टेशन पर कैसे जमा हो गए? क्या ये उनके खुफिया तंत्र की नाकामी नहीं है? प्रशासन को इसकी भनक कैसे नहीं लगी?
महाराष्ट्र सरकार ने तब अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए बीजेपी शासित गुजरात के सूरत में श्रमिकों की हिंसा का मामला उठा दिया. महाराष्ट्र सरकार के मंत्री आदित्य ठाकरे ने कहा था, "बांद्रा में जुटी भीड़ हो या सूरत में भड़की हिंसा, इसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है जो प्रवासी मजदूरों के घर वापस लौटने की व्यवस्था नहीं कर पा रही है. प्रवासी मजदूर शेल्टर या खाना नहीं चाहते, वो अपने घर जाना चाहते हैं.''
ऐसे ही पहले लॉकडाउन के बाद दिल्ली के आनंद विहार रेलवे और बस स्टेशन पर हजारों श्रमिकों की भीड़ उमड़ी थी. इसके बाद दिल्ली सरकार की कई डीटीसी बसें यूपी के श्रमिकों को यूपी बॉर्डर तक छोड़ती दिखाई दी. वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपनी बसों से श्रमिकों को घर तक छोड़ा.
श्रमिकों के पलायन से फैला कोरोना?
जब प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी होने लगी तो राज्य सरकारें सतर्क हो गई. खासकर यूपी और बिहार लौटे श्रमिकों के लिए क्वारंटीन सेंटर तैयार किए गए जहां पलायन कर आए श्रमिकों को रखा जाता था. वहाँ से जाँच के बाद ही उन्हें गांव जाने की इजाज़त दी जाती थी.
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के असिस्टेंट प्रोफेसर प्राचीन कुमार घोडसकर कहते हैं कि दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में पहले से ही अस्पताल और चिकित्सा व्यवस्था चरमरा-रही थी, ऐसे में प्रवासी मज़दूर भले ही मजबूरी में अपने गांव लौटे लेकिन इसमें उनका एक भला भी हो गया.
प्रोफेसर घोडसकर कहते हैं , "लोग अगर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं तो ट्रांसमिशन की संभावना बढ़ती है लेकिन जो प्रवासी मज़दूर पलायन करके गए हैं. वो दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में बहुत कम जगह में रह रहे थे. यहां तक कि एक कमरे में दस-दस लोग रह रहे थे. ऐसे में शहरों में श्रमिकों के बीच कोरोना वायरस के फैलने का खतरा ज्यादा था. अगर श्रमिक शहरों में रुकते तो कोरोना यहां बम की तरह फटता.''
घोडसकर आगे बताते हैं, "गांवों में आबादी का घनत्व कम है. गांव का इलाका खुला होता है. घर में भी काफी जगह होती है. उस समय गांव में सांस लेने की जगह थी. प्रवासी मज़दूर गंदी कंडीशन से अच्छी कंडीशन की तरफ भाग रहे थे.''
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