प्रवासी मज़दूरों के पलायन के लिए कौन ज़िम्मेदार- फ़ेक न्यूज़ या सरकारी उदासीनता

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"लॉकडाउन की अवधि के बारे में फ़र्ज़ी समाचारों से उत्पन्न भय के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार का प्रवासन शुरू हो गया था और लोग, विशेषकर प्रवासी कामगार, भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और आश्रय जैसी मलूभूत आवश्यकताओं की पर्याप्त आपूर्ति के बारे में चिंतित थे. तथापि, केंद्र सरकार इस बात के प्रति सजग थी और उसने यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय किए कि अपरिहार्य लॉकडाउन की अवधि के दौरान कोई भी नागरिक भोजन, पेयजल, चिकित्सा सुविधाओं आदि की मूलभूत सुविधाओं से वंचित न हो."

इसके साथ ही केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में केवल दो शब्दों में ये बयान कर दिया कि बंटवारे के बाद भारत के इतिहास की संभवत: सबसे बड़ी मानव त्रासदी आख़िर क्यों हुई. और वो शब्द थे - फ़र्ज़ी समाचार.

लेकिन ये पहला मौका नहीं था जब केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों के पलायन के लिए फ़र्ज़ी समाचारों को ज़िम्मेदार ठहराया हो.

लॉकडाउन की शुरुआत से लेकर कई हफ़्तों तक केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट से लेकर टीवी चैनलों तक प्रवासी मजदूरों के पलायन के लिए विपक्षी दलों और फ़र्ज़ी ख़बरों को ज़िम्मेदार ठहराती रही है.

ऐसे में सवाल उठता कि क्या फ़ेक न्यूज़ सच में प्रवासी मजदूरों को मिली यातनाओं के लिए ज़िम्मेदार थी?

इसके लिए आपको सरकार की ओर से कहे गए, लिखे गए और दिए गए हर बयान को एक बार फिर से पढ़ना और समझना होगा.

चार घंटों में देश बंद

ये बात शुरू होती है, दिन मंगलवार, 24 मार्च से जब शाम आठ बजे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "आज रात 12 बजे से संपूर्ण देश में संपूर्ण लॉकडाउन होने जा रहा है. हिंदुस्तान को बचाने के लिए, हिंदुस्तान के हर नागरिक को बचाने के लिए, आपको बचाने के लिए, आपके परिवार को बचाने के लिए, आज रात 12 बजे से, घरों से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जा रही है."

प्रधानमंत्री मोदी ने ये भी कहा कि "आप इस समय देश में जहां भी हैं, वहीं रहें. अभी के हालात को देखते हुए देश में ये लॉकडाउन 21 दिन का होगा. तीन सप्ताह का होगा. ... इस दौरान घर में रहें, घर में रहें और सिर्फ घर में ही रहें."

प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऐलान में कहा कि जो जहां है, वहीं रहे, और लोग घर में ही रहें.

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने देश की आबादी के उस वर्ग के बारे में कुछ भी नहीं कहा जो बहुमंज़िली इमारतों के निर्माण कंस्ट्रक्शन मज़दूर के तौर पर काम करता है और झुग्गियों या फुटपाथ पर चटाई बिछाकर सो जाता है.

अगले 21 दिन तक समाज का ये वर्ग अपना गुजर-बसर कैसे करेगा, इस बारे में सोचना शायद उस वक़्त कोरोना महामारी को फैलने से रोकने की चिंता से ज़्यादा ज़रूरी नहीं लगा होगा.

अमूमन ट्विटर पर काफ़ी सक्रिय रहने वाले पीएम मोदी तब इस मसले पर ख़ामोश ही दिखे कि उनकी सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए क्या इंतज़ाम कर रही है.

यही नहीं, 24 मार्च से लेकर 29 मार्च तक जब देश के हर टीवी चैनल से लेकर सोशल मीडिया पर प्रवासी मजदूरों के पलायन का मुद्दा छाया हुआ था तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल्स @NarendraModi और @PMOIndia की ओर से एक इस मुद्दे पर एक भी ट्वीट नहीं किया.

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन पाँच दिनों में पीएम केयर्स फंड में दान दे रही हस्तियों का धन्यवाद ज़रूर किया.

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प्रवासी मजदूरों के प्रति उदासीनता

जानकार मानते हैं कि सरकार के पास प्रवासी मज़दूरों और दिहाड़ी पर काम करने वाले लोगों को आंकड़ा होता है और लॉकडाउन लागू करने से पहले उनके लिए एहतियाती इंतज़ाम किए जा सकते थे.

इसी वजह से सरकार पर मजदूरों के प्रति उदासीन रवैया अपनाने के आरोप लगे. ये सवाल उठे कि जब ये आशंका थी कि लॉकडाउन होने पर रोज़ कमाने खाने वाले इस वर्ग के सामने कुछ ही घंटों में जीवन का संकट खड़ा हो जाएगा तो इस वर्ग के लिए किए जा रहे इंतज़ामों का ज़िक्र क्यों नहीं किया गया?

केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने अपने बयान में दावा किया है कि केंद्र सरकार प्रवासी मजदूरों की चिंताओं के प्रति सजग थी.

लेकिन अगर केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की ओर से 25 मार्च को दिया गया बयान सुनें तो संकेत मिलते हैं कि 25 मार्च तक भी केंद्र सरकार के पास प्रवासी मजदूरों के बारे में कहने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं था.

जावड़ेकर ने लॉकडाउन के ठीक बाद 25 मार्च को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिहाड़ी मजदूरों के पलायन को रोकने या सुगम बनाने की किसी सरकारी योजना का ज़िक्र नहीं किया.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि दिल्ली से लेकर सूरत और तमाम शहरों में प्रवासी मजदूर दर दर की ठोकरे खा रहे हैं, क्या इन मजदूरों को यहां से निकालने के लिए सरकार कोई कदम उठाएगी.

इस सवाल पर जावड़ेकर ने कहा, "सरकार की इस स्थिति पर नज़र है. लेकिन हमें समझना चाहिए कि वे यहां काम करते थे तो कहीं रहते भी थे, तो अभी सरकार की सलाह ये है कि जहां हैं वहां रहो, 21 दिन के लिए. क्योंकि वहां जाकर, वहां क्या परिणाम होता है, वो भी एक अलग मुद्दा होता है."

जावड़ेकर ने जो जवाब दिया उससे स्पष्ट होता है कि 25 मार्च तक केंद्र सरकार के पास प्रवासी मजदूरों के रहने-खाने, उन्हें बस या ट्रेन के माध्यम से उनके गाँव-घर तक पहुंचाने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि नित्यानंद राय किस आधार पर ये कह रहे हैं कि सरकार प्रवासी कामगारों की चिंताओं के प्रति सजग थी?

हालांकि मई में मोदी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत पैकेज की घोषणा की और प्रवासी मज़दूरों की संख्या के बारे में आधिकारिक तौर पर ये माना कि उनकी सरकार आठ करोड़ प्रवासी मज़दूरों के लिए विशेष प्रावधान कर रही है.

सड़कों पर क्यों उतरे मज़दूर?

एक सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या प्रवासी मजदूरों ने फ़ेक न्यूज़ से पैदा हुए भय के चलते महानगरों को छोड़ना शुरू किया?

प्रवासी मजदूरों की आपबीती सुनें तो ये बात सामने नहीं आती है. बल्कि पता चलता है कि सरकार से नाउम्मीद होना पलायन की एक बड़ी वजह थी.

बीबीसी संवाददातानितिन श्रीवास्तव ने लॉकडाउन की पहली सुबह यानी 25 मार्च को दिल्ली से पैदल चलकर भरतपुर जाते हुए कुछ मजदूरों से बात की थी.

इन मजदूरों ने कहा था, "हम दिल्ली के पश्चिम विहार से आ रहे हैं, सुबह छह बजे निकले थे. हम पत्थर का काम करते हैं. चार-पांच दिनों से काम बंद है. खाने के लिए कुछ नहीं है. अब क्या करें. यहां भूखे मरते हम. इसलिए गाँव जा रहे हैं."

ये उस मानव त्रासदी की शुरुआत भर थी जो भारतीय इतिहास की सबसे भयावह मानव त्रासदी की शक्ल अख़्तियार करने जा रही थी.

इसके बाद हर घंटे के स्तर पर देश भर की सड़कों पर प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ती दिखी.

अगले तीन दिनों के भीतर यानी मार्च 28 आते आते देश भर की सड़कों, रेलवे लाइनों और कच्चे रास्तों पर कंधों पर झोले और बच्चे सहेजे हुए प्रवासी मजदूरों का पलायन दिखने लगा.

मुंबई से लेकर दिल्ली और अहमदाबाद से लेकर पंजाब के बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों ने विकल्पहीनता की स्थिति में पैदल ही अपने घरों के लिए निकलना शुरू कर दिया.

कई-कई लोगों को कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में छह छह दिन का समय लगा.

कई लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. कई माँओं ने सड़क पर बच्चों को जन्म दे दिया. तो कई बच्चों की सड़क पर चलते चलते तो कुछ दुधमुंहे बच्चों की मौत माँ की गोद में ही हो गई

प्रवासी मजदूरों के प्रति सरकारी संवेदनशीलता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाँच दिनों की चुप्पी के बाद अपने मन की बात कार्यक्रम में लॉकडाउन की वजह से लोगों को हो रही परेशानी के लिए माफ़ी मांगी.

उन्होंने कहा, "मैं सभी देशवासियों से दिल से माफ़ी मांगता हूं. मुझे लगता है कि आप मुझे माफ़ कर देंगे."

उन्होंने कहा, "चूंकि कुछ फ़ैसले लेने पड़े जिससे आपके सामने तमाम मुश्किलें आ पड़ी हैं. जब मेरे ग़रीब भाइयों और बहनों की बात आती है तो वे सोचते होंगे कि उन्हें कैसा पीएम मिला है, जिसने उन्हें मुश्किलों में झोंक दिया है. मैं दिल की गहराई से उनसे माफ़ी मांगता हूं."

सवाल ये उठता है कि क्या नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के कार्यकाल में प्रवासी मजदूरों को जो यातना झेलनी पड़ रही थी, उसके प्रति वो ज़रा भी संवेदनशील थी? जबकि दर्द की ये कहानियां दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींच रही थीं.

ये सवाल इसलिए अहम है क्योंकि जहां एक ओर प्रवासी मजदूरों को महानगरों से निकलना पड़ रहा था, वहां उन्हें हर ज़िले की सीमा पर पुलिस की ओर से उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था.

ऐसे में अगर केंद्र या राज्य सरकारें मजदूरों की स्थिति को लेकर लेशमात्र भी संवेदनशील थीं तो एक आदेश जारी क्यों नहीं किया गया कि प्रवासी मजदूरों के साथ प्रेम पूर्ण व्यवहार किया जाए.

संभवत: इस बात को याद रखा जाएगा कि अपने बेहतरीन सूचना तंत्र के लिए चर्चित मोदी सरकार के दौर में देश की राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों में प्रवासी मजदूरों के लिए कोई भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी कि उन्हें कहां जाना है, कौन सी ट्रेन मिलेगी या कौन सी बस उनके लिए उपलब्ध कराई जा रही है.

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने दिल्ली में अंबाला से भूखे प्यासे बच्चों के साथ नंगे पाँव पलायन कर रहे प्रवासी मजदूरों से बात की थी.

अपने बच्चों को लेकर चल प्रवासी मजदूर ने कहा था, "मोदी जी ने जो किया है न, वो अच्छा किया है. हमारे लिए सही किया है. हमारे लिए बढ़िया किया है. हम तो जैसे तैसे भोग लेंगे. पर वो तो एक जगह बैठे हैं न, कम से कम. अरे, उन्हें कम से कम ये तो सोचना चाहिए कि ग़रीब आदमी हैं, उनको परेशानी है. उनके लिए कुछ करना तो चाहिए न. कि नहीं करना चाहिए?...चलो ठीक है, हम तो जैसे है, वैसे ही निकल जाएंगे. मर जाएंगे. जैसे भी होगा. हम निकल जाएंगे, बच्चों को लेकर...हम बहुत परेशान हैं. साहब. हम बहुत परेशान हैं. किसी की टूटी हुई साइकिल ली थी. पाँच सौ रुपये में. आज छह दिन हो गए हैं. वैसे ही चल रहे हैं."

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इस प्रवासी मजदूर ने बताया कि उन्हें अंबाला से दिल्ली के रास्ते में कई जगहों पर पुलिस की ओर से उत्पीड़न झेलना पड़ा.

उन्होंने कहा, "यहां से जाएंगे, तो वहां डंडे मारेंगे पुलिस वाले, कोई यहां से भगा देता है, अभी एक बंदे को इतना मारा है कि गिरा दिया डंडे मार मार कर."

प्रतिदिन 280 रुपये दिहाड़ी कमाने वाले ये मजदूर अंबाला से मध्य प्रदेश के छतरपुर की यात्रा कर रहे थे.

लॉकडाउन के ठीक बाद देश भर से प्रशासन की ओर से प्रवासी कामगारों के साथ अमानवीय व्यवहार की तमाम घटनाएं सामने आई थीं.

इनमें मजदूरों को पुलिसकर्मियों द्वारा पीटे जाने से लेकर, उनके ऊपर कैमिकल से छिड़काव किए जाने और उन्हें अंधेरी इमारतों में बिना पानी और खाने के पशुओं की माफ़िक ताला बंद करने की घटनाएं सामने आई थीं.

प्रवासी मजदूरों तक सरकारी मदद

केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के ऐलान के महीने भर बाद मई में प्रवासी मजदूरों के लिए आत्म निर्भर भारत पैकेज़ के तहत खाने पीने का सामान देने की घोषणा की. इस योजना के तहत प्रत्येक प्रवासी कामगार परिवार को पाँच किलोग्राम अनाज और एक किलोग्राम चना देने की घोषणा की.

लेकिन उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़, सितंबर आते आते इस योजना के तहत आवंटित किए गए 8 लाख किलोग्राम अनाज में से सिर्फ 33 फीसदी अनाज प्रवासी मजदूर परिवारों में वितरित हो सका.

सरकार की ओर से मकानमालिकों द्वारा किराया न माँगने और नौकरियों से न निकाले जाने की अपील भी नाकाफ़ी साबित हुई.

सेंटर फ़ॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक़, लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोग अपने काम से हाथ गंवा चुके हैं. अधिकतर लोग असंगठित और ग्रामीण क्षेत्र से हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार की प्रवासी मजदूरों को काम पर वापस बुलाने की कोशिशें कितनी कामयाब होती दिख रही हैं.

खाने-पीने की कमी

केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने अपने 88 शब्दों के बयान में दावा किया है कि सरकार ने "सभी आवश्यक उपाय किए कि अपरिहार्य लॉकडाउन की अवधि के दौरान कोई भी नागरिक भोजन, पेयजल, चिकित्सा सुविधाओं आदि की मूलभूत सुविधाओं से वंचित न हो."

लेकिन दिल्ली से बिहार जाने वाली तमाम श्रमिक ट्रेनों में प्रवासी मजदूरों के साथ अमानवीय व्यवहार के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते देखे गए. इन ट्रेनों में क्षमता से अधिक प्रवासी मजदूरों को बिठाया गया और इसके बाद कई कई घंटों तक ट्रेन में बच्चे भूख-प्यास से बिलखते रहे.

पलायन की इसी यातना को जीने वालीं पूजा कुमारी बताती हैं, "मेरे रूम में खाने पीने के लिए कुछ नहीं था. तीन दिन तक हम चीनी का शर्बत बनाकर पिए. चावल-दाल कुछ नहीं था. मेरा गैस भी ख़त्म हो गया था. फिर कॉल किए 100 नंबर पर. वो जो हेल्पलाइन नंबर शुरू किए थे. उस पर कॉल किया."

"उन्होंने कहा कि वो खाना लेकर आ रहे हैं. हम बोले ठीक है... इसके बाद भी राशन तो नहीं आया लेकिन सात नंबर गली में बना हुआ खाना लेकर आए. जब खाने के लिए जा रहे थे तो मेरे पति को पुलिस ने डंडा मारकर गिरा दिया."

"मतलब, खाने के लिए भी नहीं जाने दिया. फिर किसी तरह तीन दिन काटे. उसके बाद इतनी हालत ख़राब हो गया था कि क्या बताएं... फिर घर जाने के लिए थाने में आधार कार्ड और लोकेशन वग़ैरह जमा किए. लेकिन कोई कॉल या मैसेज भी मोबाइल में नहीं आया. तब सोचे कि मैसेज भी नहीं आ रहा है, खाने के लिए कोई सुविधा भी नहीं है, रूम में. रूम वाला भी भाड़ा माँग रहा था. तब सोचा कि नहीं कुछ होगा तो पैदल निकल पड़ेंगे. बहुत दूर पैदल सफ़र किया."

"नोएडा से मोदीनगर पहुँच गए. फिर वहां प्रशासन ने हमें रोक लिया, डंडा मारने लगे और कहने लगे कि रूम पर वापस जाओ. हम लोगों ने कहा कि रूम पर क्यों जाएं...मकान मालिक भाड़ा माँग रहा है. क्या करें...फिर वो चले गए. और कुछ देर बाद हमें मोदीनगर में एक जगह ले गए."

"वहां पर हम इंतज़ार करते रहे कि गाड़ी आएगी. गाड़ी आई अगले दिन दोपहर 1 बजे. इसके बाद हम लोग गाज़ियाबाद में ट्रेन पर बैठे. लेकिन ट्रेन में कुछ सुविधा नहीं, पानी तक नहीं मिल रहा था ट्रेन में."

"ट्रेन में एक महिला थी, उसे पूरे रास्ते बहुत दर्द होता रहा. फिर मीडिया वालों को फोन किया. वो शायद भूख-प्यास से तड़प रही थी. मीडिया वालों को कॉल किया तो उन्होंने भुट्टे, पानी का बोतल दिया. इसके बाद सासाराम में कुछ मिला. लेकिन सब्जी सब ख़राब हो गया था."

उत्तर प्रदेश के कानपुर रेलवे स्टेशन पर खाने के पैकेट्स को लेकर प्रवासी मजदूरों के बीच हाथापाई होती देखी गई.

एनडीटीवी की ख़बर के मुताबिक़, जिस ट्रेन में लोगों के बीच हाथापाई हुई, उसमें सफर करने वाले यात्रियों ने बताया था कि ट्रेन के टॉयलेट तक में पानी की व्यवस्था नहीं की गई थी.

अन्य मीडिया संस्थानों और बीबीसी के साथ बात करते हुए श्रमिक ट्रेनों के यात्रियों ने पानी की बोतलों के लिए संघर्ष और ट्रेन में काफ़ी गंभीर स्तर के संघर्ष सामने आने की पुष्टि की है.

इसी बीच जब श्रमिक ट्रेनें चलाई जा रही थीं, तभी अपुष्ट सूत्रों से ट्रेन में प्रवासी मजदूरों की मौत होने की ख़बरें आईं.

लेकिन कुछ मामलों में इसकी पुष्टि भी हुई जिसमें मुज्जफ्फरपुर स्टेशन का मामला भी शामिल है.

श्रमिक ट्रेन में एक महिला की मौत होने के बाद मुज्जफ्फरपुर के ज़िलाधिकारी चंद्रशेखर सिंह ने स्पष्टीकरण दिया था कि महिला की मौत किसी बीमारी की वजह से हुई है, और ट्रेन में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी.

कितने लोगों की मौत हुई?

लॉकडाउन के दौरान घर लौटते हुए कितने लोगों की मौत हुई? ये एक ऐसा सवाल है कि जिसका जवाब केंद्र सरकार के पास नहीं है.

केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने इसके जवाब में कहा है कि अपने गृह राज्य को लौटते समय मरने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या से संबंधित ब्यौरे केंद्रीयकृत रूप से नहीं रखे जाते हैं.

इसके साथ ही जब बीती 14 सितंबर को लोकसभा में केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार से पूछा गया कि घर लौटते हुए कितने प्रवासी मजदूरों की मौत हुई और क्या सरकार ने पीड़ित परिवार को कोई मुआवज़ा या आर्थिक सहायता प्रदान की है?

इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री गंगवार ने बताया कि ऐसे कोई आँकड़ें नहीं रखे जाते हैं और इस उत्तर को ध्यान में रखते हुए दूसरे प्रश्न का सवाल खड़ा नहीं होता है. ऐसे में केंद्र सरकार ने देश की संसद के सामने बताया है कि केंद्रीय स्तर पर ऐसे आँकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं.

लेकिन न्यूज़ वेबसाइट वायर हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारतीय रेल ने आरटीआई आवेदन के जवाब में बताया है कि अब तक कुल 80 लोगों की मौत रेल यात्रा के दौरान हुई है.

बीबीसी ने विभिन्न स्तरों पर आँकड़े एकत्रित करके पता लगाया था कि 24 मार्च से 1 जून तक 304 लोगों की मौत हो चुकी थी. इनमें से 33 लोगों की थकान से, 23 लोगों की रेल हादसों में, 14 लोगों की अन्य वजहों से, और 80 लोगों की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में मौत हुई थी.

प्रवासी मजदूरों पर जो बीती उसके लिए कौन ज़िम्मेदार?

केंद्र सरकार ने आख़िरकार अपनी ज़िम्मेदारी फ़ेक न्यूज़ पर मढ़ते हुए खुद को बाइज़्ज़त बरी कर लिया है.

लेकिन इस देश में संभवत: जब जब लॉकडाउन की बात की जाएगी तो याद की जाएगी प्रधानमंत्री मोदी की वो माफ़ी जो उन्होंने प्रवासी मजदूरों से माँगी थी.

और पूछे जाएंगे सवाल कि क्या वो और उनकी सरकार इतनी असमर्थ थी कि सैकड़ों मजदूरों को परेशानी से नहीं बचा सकी.

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