बीजेपी की बेबी रानी मौर्य की तुलना मायावती से क्यों होती है?

बेबी रानी मौर्य
    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, आगरा

भारतीय जनता पार्टी नेता बेबी रानी मौर्य ने कहा है कि उनका बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती से कोई मुक़ाबला नहीं है.

बेबी रानी मौर्य ने कहा है कि वो और मायावती एक ही समाज से आते हैं लेकिन वो उनका 'चेहरा नहीं लेना चाहती' हैं.

बेबी रानी मौर्य ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा, "मैं मायावती जी को न तो अपना कॉम्पटीटर (प्रतिस्पर्धी) मानती हूँ. न उनका चेहरा बनना चाहती हूं. मैं भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता हूँ. बेबी रानी मौर्य हूँ और बेबी रानी मौर्य ही रहना चाहती हूँ."

बेबी रानी मौर्य बीजेपी की राष्ट्रीय‌ उपाध्यक्ष हैं. वो उत्तराखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं और बीजेपी के प्रमुख दलित चेहरों में गिनी जाती हैं. 1990 के दशक में वो आगरा की मेयर भी रह चुकी हैं.

बीजेपी ने उन्हें 'दलितों की राजधानी' कहे जाने वाले आगरा ज़िले की ग्रामीण (सुरक्षित) सीट से विधानसभा उम्मीदवार बनाया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे पार्टी के बड़े नेता चुनाव प्रचार के दौरान दावा कर रहे हैं कि अगर बेबी रानी मौर्य चुनाव जीतती हैं और प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है तो उन्हें 'बड़ी ज़िम्मेदारी' दी जाएगी.

इसके साथ जहां ये सीट हाई प्रोफ़ाइल मानी जाने लगी है वहीं, बेबी रानी मौर्य की बहुजन समाज पार्टी प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ तुलना होने लगी है. कई राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में 'मज़बूत वोट बैंक' माने जाने वाले दलित समुदाय के बीच बीजेपी उन्हें मायावती के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश में है.

चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती उत्तर प्रदेश में दलितों की सबसे बड़ी नेता मानी जाती हैं. साल 2014 के आम चुनाव से बीएसपी के प्रदर्शन में काफ़ी गिरावट आई है, लेकिन फिर भी पार्टी का वोट प्रतिशत बीस फ़ीसदी के क़रीब रहा है.

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषकों का दावा कि बीजेपी बेबी रानी मौर्य को आगे करके मायावती और 'बीएसपी के वोट बैंक में सेंध' लगाना चाहती है.

कई दूसरे दल और नेता भी इस कोशिश में हैं.

आगरा के दलित मतदाता

'जुड़ रहे हैं जाटव'

हालाँकि, बेबी रानी मौर्य कहती हैं कि वो मायावती से किसी तरह के मुक़ाबले की कोशिश में नहीं हैं. बेबी रानी मौर्य कहती हैं कि मायावती की तरह ही वो भी जाटव समुदाय से आती हैं और समाज के साथ उनका हमेशा सीधा जुड़ाव रहा है.

बेबी रानी मौर्य ने कहा, "आपने मायावती जी के लिए कहा, मैं भी उन्हीं के समाज से आती हूँ. मैंने आगरा में मेयर रहते हुए समाज के लिए बहुत कार्य किया है. मैंने राज्यपाल होते हुए भी उनके लिए बहुत कार्य किए हैं तो उनको मेरे से जुड़ने में कोई वो (दिक़्क़त) नहीं लग रहा कि हम क्यों जुड़ रहे हैं बेबी रानी से या भाजपा से."

वो आगे कहती हैं, "मेरे समाज के लोग मेरे से बहुत जुड़ रहे हैं और आप इस चुनाव के बाद देखेंगे कि जाटव समाज भी बेबी रानी से जुड़ रहा है."

बेबी रानी मौर्य की कोशिश मायावती के विकल्प के रूप में उभरने की है, इस दावे की एक और वजह है.

हाल में कई बार बीजेपी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनके नाम के साथ 'जाटव' जोड़कर उनकी जातिगत पहचान उभारने की कोशिश की है.

बेबी रानी मौर्य इसे लेकर भी सफ़ाई देती हैं.

वो कहती हैं, "नहीं ये अचानक तब्दीली नहीं है. देखिए, हम इस ब्रज में रहते हैं, यहाँ पर जाटव मौर्य लिखते हैं और पूर्वांचल में मौर्य वो लिखते हैं जो बीसी (पिछड़ा वर्ग) में आते हैं तो एक कन्फ्यूज़न था कि मैं जाटव हूँ कि बीसी में आती हूँ, मैं ये क्लीयर करना चाहती थी कि मैं जिस समाज से आती हूँ मेरी पहचान उस समाज से होनी चाहिए. "

वो आगे कहती हैं, "इसीलिए ये बताने के लिए कि मैं जाटव हूँ, बीसी में नहीं आती हूँ अन्य समाज में नहीं आती हूँ, इसीलिए वहाँ जाटव लिखने की ज़रूरत पड़ी."

बेबी रानी मौर्य की सभा

बेबी रानी की 'अग्निपरीक्षा'

बेबी रानी मौर्य को बीजेपी ने आगरा की जिस सीट से उम्मीदवार बनाया है, उस पर साल 2017 में बीजेपी हेमलता दिवाकर ने जीत हासिल की थी.

पार्टी ने इस बार उन्हें टिकट नहीं दिया है. स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में इसकी वजह क्षेत्रीय लोगों की नाराज़गी बताई जाती है. ये दावा किया जाता है कि बड़े अंतर से जीत हासिल करने के बाद वो लंबे समय तक अपने क्षेत्र से दूर रहीं. कई इलाक़ों में लोगों ने उन्हें 'लापता बताते हुए पोस्टर' भी लगा दिए.

विरोधी दल इसे लगातार मुद्दा बना रहे हैं.

मायावती की बहुजन समाज पार्टी के सेक्टर प्रभारी गोरेलाल दावा करते हैं कि इस बार आगरा ग्रामीण (सुरक्षित) सीट के वोटर बीएसपी के साथ हैं.

वो कहते हैं, "अब ये अनुमान लगा लेना कि बड़ी पार्टी की राज्यपाल आई हैं तो सक्सेस हो जाएंगी, ये तो ग़लत बात है. जनता के हाथ में सारी चीज़ें हैं. जनता वहाँ पर बीएसपी के पक्ष में है."

बीएसपी ने इस सीट पर किरण प्रभा केसरी को उम्मीदवार बनाया है.

बीएसपी नेताओं को ये भी अंदाज़ा है कि बेबी रानी मौर्य की तुलना मायावती से हो रही है.

गोरेलाल ऐसी तुलना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "ऐसा कुछ नहीं है, बेबी रानी एक बार मेयर बनीं, फिर राज्यपाल बनीं, राज्यपाल तो नॉमिनेट होता है, जनता से तो है नहीं (चुनाव). "

वो आगे कहते हैं, "अब जनता से सामना है, बेबी रानी ख़ुद ही बता देंगी, उनकी पोज़ीशन क्या है? बेबी रानी मौर्य को वोट कौन कौन दे रहा है, पहले वो तय करें. बेबी रानी मौर्य जीत जाएंगी तब कहीं वो स्टैंड हो पाएंगी"

मायावती

इमेज स्रोत, Getty Images

उधर, राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी से उम्मीदवार महेश जाटव भी बेबी रानी मौर्य की चुनौती को ख़ारिज कर कर रहे हैं.

वो दावा करते हैं, "मेरा गठबंधन बहुत मज़बूत है. काठ की हांडी एक बार चढ़ती है. लोगों को झूठी आशा दी गई. बीजेपी से आशा थी कि प्रधानमंत्री जी 15-15 लाख रुपये देंगे. मगर ऐसा हुआ नहीं. बेबी रानी भी मेहरबानी से राज्यपाल बनीं. ज़मीन पर भी इनका कोई असर नहीं है."

स्थानीय मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक भी आगरा ग्रामीण (सुरक्षित) सीट को बीजेपी के लिए मुश्किल बता रहे हैं, लेकिन बेबी रानी मौर्य का दावा है कि बीजेपी सिर्फ़ उनकी नहीं बल्कि आगरा की सभी नौ सीटों पर जीत हासिल करेगी. बीजेपी ने साल 2017 में भी नौ सीटें हासिल की थीं.

बेबी रानी मौर्य कहती हैं, "मुझे नहीं लग रहा है कि मेरे लिए ये बहुत टफ़ फ़ाइट है. मैं बिल्कुल आराम से चुनाव लड़ रही हूं और मैं सोच रही हूँ कि मेरी लड़ाई किसी से नहीं है, भारतीय जनता पार्टी ये सीट जीत रही है."

वो आगे कहती हैं, "देखिए, मेरे लिए कोई कठिन परीक्षा नहीं है. मैं भारतीय जनता पार्टी की एक कार्यकर्ता हूँ. पार्टी ने जब भी जो भी दायित्व मुझे दिया. मैंने उसे बड़ी लगन और निष्ठा से निभाया है. इसे भी निभाऊँगी. आप देख रहे हैं यहाँ जितने भी लोग बैठे हैं, मेरी बहनें बैठी हैं, भाई खड़े हैं, नौजवान साथी खड़े हैं, सबमें आज भी उतना ही उत्साह और उतना ही जुनून है, वोट डालने के लिए भारतीय जनता पार्टी को. किसी व्यक्ति से नाराज़गी हो सकती है. पार्टी से कोई नाराज़गी नहीं है. ये आज भी ये भारतीय जनता पार्टी को वोट करेंगे. "

जीत के बाद बड़ा पद मिलने के दावे के बारे में पूछे जाने पर वो कहती हैं, "ये तो पार्टी का निर्णय होगा. वो जो भी निर्णय लें. अभी तो मैं केवल विधानसभा का चुनाव लड़ रही हूँ."

पार्टी उम्मीदवारों के विरोध के सवाल पर वो कहती हैं, "हो सकता है हमारा जो भी विधायक होता है, वो जितनी कार्यकर्ताओं को अपेक्षा होती है उतनी नहीं कर पाता तो उनसे थोड़ी बहुत नाराज़गी हो

सकती है, लेकिन वोट वो बाद में भाजपा को ही देगा."

उत्तर प्रदेश

क्या हैं प्राथमिकताएँ

आगरा के दूसरे इलाकों के मुक़ाबले इस विधानसभा के अधिकतर क्षेत्र पिछड़े हुए दिखते हैं. बीबीसी टीम ने जिस क्षेत्र में बेबी रानी मौर्य से मुलाक़ात की उस कुंवरगढ़ नाम के गाँव में कई महिलाओं ने शिकायत की कि उनके पास शौचालय तक नहीं है.

बेबी रानी मौर्य को भी महिलाओं ने अपनी शिकायतें बताईं.

क्षेत्र के लिए उन्होंने क्या प्राथमिकताएँ तय की हैं, इस सवाल पर बेबी रानी मौर्य कहती हैं, "खड़ंजे नहीं हैं, नालियाँ नहीं हैं, वो ठीक कराना है. एक यहाँ का पुल है, उसको पूरा कराना है."

वो आगे कहती हैं, "दूसरा यहाँ की जो महिलाएँ हैं वो मेरा फ़ोकस हैं. मैं महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करना चाहती हूँ. उनके अंदर जो टैलेंट है, कला है, उसे उभारना चाहती हूँ. यहाँ के बच्चे अच्छे से पढ़ें-लिखें, अच्छी नौकरियों में जाएं. नौजवान साथी हमारे वो भी कुछ कारोबार करें. आप देख रहे कि कृषि बाहुल्य क्षेत्र है मेरी विधानसभा तो इसको हम और उन्नत करेंगे, जिससे नौकरी न मिले तो अपना कारोबार तो अच्छा करे."

हालाँकि, इन प्राथमिकताओं को हाथ में लेने से पहले बेबी रानी मौर्य को विरोधियों की चुनौती से पार पाना होगा.

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