मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम की तर्ज़ पर पटना के गायघाट शेल्टर होम की बातें क्यों हो रहीं है

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"पटना की सड़कों पर पिछले पाँच दिनों से एक बेटी न्याय की भीख माँग रही है. हर जगह गई लेकिन अब तक एफ़आईआर नहीं दर्ज की गई. उस बिटिया की शिकायत मात्र उसकी शिकायत नहीं है. अगर वो वहां (गायघाट शेल्टर होम) गई और अंदर की चीज़ें बता रही तो यह इक्कीसवीं सदी के भारत को शर्मसार करने वाला मामला है."
सुप्रीम कोर्ट की वकील सीमा कुशवाहा ने गुरुवार को पटना में एक प्रेस वार्ता कर यह बातें कहीं.
पिछले चार-पाँच दिनों से पटना और बिहार की मीडिया में एक किशोरी द्वारा 'गायघाट शेल्टर होम' की अधीक्षिका वंदना गुप्ता पर लगाए गए आरोप सुर्ख़ियों में हैं.
वह किशोरी कह रही हैं कि उनके साथ पटना के गायघाट इलाक़े में स्थित शेल्टर होम के भीतर कथित तौर पर दुष्कर्म हुआ.
उनका आरोप है कि उन्हें शेल्टर होम में नशीली दवाइयां खिलाई गईं और इस सबसे परेशान होकर उन्होंने आत्महत्या की भी कोशिशें की.

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क़ानूनी लड़ाई
उनका आरोप है कि यह सब सिर्फ़ उनके साथ ही नहीं हुआ बल्कि शेल्टर होम की दूसरी लड़कियों को भी कई बार बाहर भेजा जाता है, और कई बार बाहर से भी लोग भीतर आते हैं.
इन्हीं किशोरी के समर्थन में वकील सीमा कुशवाहा ने महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली कुछ दूसरी महिला कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर प्रेस से बात की.
सीमा कुशवाहा हाल के दिनों में उत्तरप्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ हुए गैंगरेप के मामले में क़ानूनी लड़ाई लड़ने के कारण सुर्ख़ियों में आईं हैं. हाल में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी ज्वॉइन किया है.
गुरुवार को पटना में प्रेस से बात करते हुए उन्होंने कहा, "उसके साथ रेप किया जाता है. उस बच्ची को इंजेक्शन दिया जाता है. मना करने पर मारपीट की जाती है. वह शेल्टर होम की अधीक्षिका वंदना गुप्ता पर सीधा आरोप लगा रही है. उसके अलावा और भी कई पीड़ित लड़कियां हैं."
सीमा कुशवाहा ने बिहार सरकार पर हमला करते हुए कहा, "समाज कल्याण विभाग ने लड़की के आरोपों की गंभीरतापूर्वक जाँच-पड़ताल करने के बजाय उसे ही विक्षिप्त और उद्दंड क़रार देते हुए एक लेटर जारी कर दिया."

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शेल्टर होम
गायघाट के शेल्टर होम में 250 से 300 बच्चियां रहती हैं.
सीमा कुशवाहा ने उच्च न्यायालय से राज्य के भीतर संचालित शेल्टर होम की निगरानी करने और समय-समय पर वहां से रिपोर्ट मंगाने की अपील की.
किशोरी का आरोप है कि उन्होंने पुलिस से लेकर ज़िलाधिकारी सबसे मदद की अपील की लेकिन उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिली.
शेल्टर होम की अधीक्षिका वंदना गुप्ता ने मीडिया से बात करने से इनकार कर दिया. बीबीसी की ओर से भी दो बार फ़ोन पर बातचीत की कोशिश की गई. पर उन्होंने बस इतना ही कहा कि वह इस मसले पर बात करने के लिए अधिकृत नहीं और इस मामले में बिहार समाज कल्याण विभाग के निदेशक से बात की जाए.
वहीं, समाज कल्याण विभाग के वरीय अधिकारी उक्त लड़की के आरोप पर उसके इतिहास और पुराने रिकॉर्ड का हवाला देने लगे कि वह कब और कैसे रही है. वह कब और कैसे उन्हें मिली. कैसे और किन परिस्थितियों में उसकी शादी हुई.

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बिहार की सियासत
वरीय अधिकारी का आगे कहना था कि उनकी टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच की लेकिन कोई तथ्य नहीं पाया. मीडियाकर्मियों द्वारा जब इस मामले में एफआईआर कराए जाने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने पलटकर पूछा कि एफआईआर क्यों दर्ज होगा?
पटना के उक्त शेल्टर होम के सुर्खियों में आने से पूर्व सूबे के ही 'मुजफ्फरपुर शेल्टर होम' के भीतर होने वाली अनैतिक क्रियाकलापों और उसके संचालकों के सियासी गठजोड़ को लेकर बिहार की सियासत खासा गर्म रही है.
तब नैतिकता और पारदर्शिता के सवाल पर समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा को इस्तीफा तक देना पड़ा था. बाद में कोर्ट ने एनजीओ के संचालक ब्रजेश ठाकुर समेत 19 अभियुक्तों को दोषी ठहराया.
उच्च न्यायालय के स्वत: संज्ञान के बाद मामला हुआ हाईलाइट- मीडिया में इस घटना से जुड़ी खबरें आने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने जुवेनाइल जस्टिस मॉनिटरिंग कमेटी की अनुशंसा पर स्वत: संज्ञान लिया और पटना पुलिस द्वारा इस मामले में प्राथमिकी दर्ज न किए जाने को लेकर नाराजगी जाहिर की.
कमिटी के सदस्यों द्वारा शेल्टर होम के दौरे के दौरान भी कई तरह की खामियां पाई गईं. जैसे समाज कल्याण विभाग के अधिकारी जिन सीसीटीवी कैमरों के हवाले से किशोरी के आरोपों को नकार रहे. उन सीसीटीवी कैमरों में से तो कई काम ही नहीं करते. इसके अलावा उन्हें वहां रहने और खाने-पीने की व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं दिखी.

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क्या कहती हैं किशोरी की वकील?
इस मामले के संदर्भ में हमने किशोरी की ओर से केस लड़ रहीं एडवोकेट मीनू कुमारी से भी बात की. मीनू कुमारी कहती हैं, "हाई कोर्ट की ओर से स्वत: संज्ञान लेने के बाद से हम इस मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं, और अपना पक्ष रख रहे हैं.
महिला विकास मंच और पीड़िता भी हस्तक्षेप कर रही है. एसआईटी गठित हो. हम उपलब्ध तथ्यों को ऑन रिकॉर्ड लाकर कोर्ट की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं कि कोर्ट किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचे."
इस पूरे मामले में 'समाज कल्याण विभाग' और सरकार की भूमिका और सहयोग के सवाल पर उनका कहना था कि समाज कल्याण विभाग और सरकार की भूमिका काफी निराशाजनक और अरुचिकर रही.
यहां अंत में इस बात को सूबे के संदर्भ में बताना बेहद जरूरी हो जाता है कि वैसे तो इस बीच महिलाओं से जुड़े कई मामलों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, जबकि उन पर ध्यान दिया जाना जरूरी था. जैसे इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय के स्वत: संज्ञान लेने के बाद से थोड़ी सी सुगबुगाहट देखी जा रही.
साथ ही 'महिला विकास मंच' नामक महिला संगठन ने अपनी भूंमिका बखूबी अदा की लेकिन बिहार में बीती सरकार के गठन के बाद से ही महिला आयोग को नया अध्यक्ष नहीं मिल सका है. न जाने कितने ही मामले पर्याप्त मीडिया कवरेज और न्यायपालिका के दखल के बिना दम तोड़ देते हैं.
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