बजट 2022 : पीएलआई स्कीम के जरिये 60 लाख नौकरियां देने के दावे में कितना दम

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोविड-19 की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था को लगे झटके ने बेरोज़गारी में भारी इज़ाफ़ा किया है. संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है. लिहाजा मोदी सरकार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा रोज़गार पैदा कर खपत को बढ़ावा और अर्थव्यवस्था को रफ़्तार देने का काम बड़ा चैलेंज बन गया है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज अपने बजट भाषण में रोज़गार को लेकर अपनी सरकार का रुख साफ़ कर दिया.

वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की ओर से चल रही पीएलआई स्कीम ( Production Linked Incentive Scheme) अगले 5 साल में 60 लाख नए रोज़गार पैदा कर सकती है.

उन्होंने कहा, "आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को पाने के लिए शुरू की गई पीएलआई स्कीम को काफी अच्छा समर्थन मिला है इससे अगले पांच साल में 60 लाख नई नौकरियां पैदा होंगी और 30 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त उत्पादन होगा."

क्या है पीएलआई स्कीम?

पीएलआई यानी प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव स्कीम के तहत मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

फिलहाल यह स्कीम 13 उद्योगों के लिए चल रही है. शुरुआत में पांच साल के लिए लाई गई इस स्कीम के तहत सरकार मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को कैश इन्सेंटिव देगी ताकि वे उत्पादन बढ़ाएं और भारत को ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने में मदद करे.

इसके जरिये देश में बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा करने का लक्ष्य है. ऑटो, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, टेक्सटाइल समेत 13 उद्योग इस स्कीम के दायरे में हैं.

निर्मला सीतारमण

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सीएमआईई (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हाल के दिनों में कृषि के क्षेत्र में रोज़गार बढ़ा है. दिहाड़ी मजदूरों को भी तेज़ी से काम मिल रहा है. लेकिन दिसंबर 2021 तक नौकरी गवां चुके वेतनभोगी लोगों की तादाद बढ़ कर 95 लाख तक पहुंच गई है.

इस साल अकेले जनवरी में अपना रोज़गार करने वाले लगभग दस लाख लोगों का कारोबार ख़त्म हो गया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि पीएलआई स्कीम के जरिये आने वाले 60 लाख नए रोज़गारों से बेरोज़गारी की मार झेल रहे लोगों को कितनी राहत मिलेगी. क्या पीएलआई स्कीम के तहत अलग-अलग उद्योगों को मिलने वाले प्रोत्साहन से सचमुच इतनी नौकरियां पैदा करने का मिशन पूरा होगा.

'सरकार के दावे में दम है'

देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और डॉ. बीआर अंबेडकर स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स, बेंगलुरू के वाइस चासंलर डॉ. एनआरबी भानुमूर्ति का कहना है कि यह संभव है. क्योंकि पीएलआई स्कीमों के तहत आने वाले उद्योगों में बड़ी तादाद में लोग काम करते हैं. नब्बे फ़ीसदी से अधिक लोग कॉन्ट्रैक्ट पर होते हैं. इसलिए मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के तहत आने वाले उद्योगों में ज़्यादा रोज़गार मिलता है.

भानुमूर्ति कहते हैं कि अगर हॉस्पेटिलिटी सेक्टर को भी पीएलआई स्कीम के तहत कवर किया जाता है तो रोज़गार काफी बढ़ सकता है. इससे एमएसएमई (MSME) सेक्टर में भी रोज़गार बढ़ सकता है. सरकार ने 2022-23 के लिए पूंजीगत खर्च का अनुमान बढ़ा कर 10.68 लाख करोड़ रुपये कर दिया है. इससे जीडीपी में इज़ाफ़ा होगा. निश्चित तौर पर इससे रोज़गार बढ़ने में मदद मिलेगी.

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पीएलआई स्कीम पर ही उठ रहे सवाल

इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस में मैलकॉम एसए. चेयर के प्रोफ़ेसर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री अरुण कुमार, भानुमूर्ति के इस तर्क के कायल नहीं हैं.

अरुण कुमार का कहना है कि रोज़गार के लिहाज से सरकार को बजट में जो करना चाहिए था वो उसने नहीं किया है. बेरोज़गारी चरम पर है. मनरेगा का बजट 98 हज़ार करोड़ रुपये से घटा कर 73 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है. इसके अलावा ज़्यादातर जगहों पर 100 दिनों के बजाय 50 दिनों का ही काम मिल रहा है. ऐसे में ग्रामीण इलाकों में तो पहले ही रोज़गार कम हो गया है. शहरी इलाकों में रोज़गार गारंटी की जो बात थी वह अब तक सिरे नहीं चढ़ पाई है."

अरुण कुमार को सरकार के पूंजीगत खर्च बढ़ाने की बात पर भी भरोसा नहीं है.

वह कहते हैं, "सरकार पूंजीगत खर्च बढ़ाने की बात कर रही है. लेकिन अब तक वह इस साल के लिए निर्धारित 5.4 लाख करोड़ रुपये का आधा भी खर्च नहीं कर पाई है. अब बाकी के तीन-चार महीने वो बाकी आधी रक़म कैसे खर्च कर लेगी. मुझे सरकार के पूंजीगत खर्च से जुड़े आंकड़े सही नहीं लगते. देखा जाए तो न सामान्य खर्च बढ़ता नज़र आ रहा है और न ज़्यादा पूंजीगत खर्च की स्थिति बन रही है. ऐसे में पूंजीगत खर्च के ज़रिए रोज़गार बढ़ाने की बात बेमानी लगती है."

पीएलआई स्कीम के ज़रिए 60 लाख नौकरियां पैदा करने के दावे में भी अरुण कुमार को कोई दम नज़र नहीं आता.

वे कहते हैं, "पीएलआई स्कीम तभी काम करेगी, जब या तो हमारा निर्यात लगातार बढ़े या फिर आंतरिक खपत में इज़ाफ़ा हो. लेकिन फिलहाल यह होता नहीं दिख रहा है. दूसरे, पीएलआई स्कीम के तहत संगठित क्षेत्र के उद्योग आते हैं, जहां ऑटोमेशन पर ज़ोर है. मशीनों से ज़्यादा काम हो रहा है. इसलिए हाथ से काम करने वाले श्रमिकों के लिए रोज़गार की गुंजाइश कम है."

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रोज़गार के नाम पर 'लॉलीपॉप'?

वरिष्ठ अर्थशास्त्री और आर्थिक मामलों के विश्लेषक भरत झुनझुनवाला का भी मानना है, "पीएलआई स्कीम के ज़रिए रोज़गार बढ़ाने की बात करना भुलावा है. सरकार पीएलआई स्कीम के ज़रिए रोज़गार बढ़ाने की तो बात कर रही है लेकिन ये तो नहीं बता रही है न कि उत्पादन रोबोट से बढ़ेगा या मानव श्रम से?"

वह कहते हैं, "संगठित क्षेत्र में रोज़गार घट रहा है. तमाम आंकड़े बता रहे हैं कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उत्पादन घट रहा है. अगर आप उत्पादन थोड़ा बढ़ा भी लेंगे तो रोज़गार थोड़े ही बढ़ेगा. दरअसल पीएलआई स्कीम के ज़रिए रोज़गार बढ़ाने की बात करना जनता को लॉलीपॉप पकड़ाने जैसा है."

झुनझुनवाला का कहना है, "कॉन्ट्रैक्ट पर काम होने की वजह से रोज़गार अधिक मिल सकता है. यह संभव है. लेकिन अगर आप आंकड़ों को देखें तो कॉन्ट्रैक्ट पर लोगों को लाने के बावजूद रोज़गार नहीं बढ़ा रहा है. मु्ख्य मुद्दा यह है कि आप प्रोडक्शन करते कैसे हैं? अगर प्रोडक्शन में ऑटोमेशन का ज़ोर होगा तो रोज़गार कैसे बढ़ेगा. ऐसे हालात में मुझे रोज़गार बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं दिखती. आप पिछले आठ साल के दौरान इस सरकार के रोज़गार के आंकड़ों को देख लीजिये. सबकुछ समझ आ जाएगा."

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