You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जम्मू और कश्मीर: स्थानीय निकाय चुनाव के साल भर बाद चुनकर आए सदस्य ही क्यों उठा रहे हैं सवाल
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में ज़िला विकास परिषद या डीडीसी के चुनाव के वक़्त गृह मंत्री अमित शाह ने उस घटना को राज्य में 'लोकतंत्र को ग्रास-रूट तक ले जाना वाला क़दम' बताया था.
हालांकि साल भर के भीतर ही ऐसा क्या हो गया कि स्थानीय निकाय के सदस्य कोई काम न होने का हवाला देते हुए चेयरमैन को हटाने की मांगें उठ रही हैं.
चंद दिनों पहले कश्मीर का शोपियां उन चार ज़िलों की लिस्ट में शामिल हो गया, जहां चेयरमैन के ख़िलाफ़ कारवाई की मांग उठी है. हालांकि शोपियां में इस प्रक्रिया की अभी शुरुआत ही हुई है.
लेकिन बड़गाम, गांदेरबल और कुलगाम में पहले ही ऐसे अविश्वास प्रस्ताव पारित हो चुके हैं. हालांकि अभी तक इस मामले में किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
डीडीसी सदस्यों का कहना है कि जिस मक़सद की बात कर स्थानीय निकायों के चुनाव करवाए गए थे, वह पूरी तरह नाकाम रहा है.
2020 के अंत में हुए थे ये चुनाव
भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को अगस्त 2019 में हटाए जाने के एक साल बाद 2020 के अंत में स्थानीय निकाय के चुनाव कराए गए थे.
कहा गया था कि ये विधानसभा की ग़ैर-मौजूदगी को पूरा करेगी और इससे विकास और शासन अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों तक पहुंचेगा. लेकिन साल भर के बाद आरोप लग रहे हैं कि जिन समितियों के माध्यम से काम-काज होना था, उनका गठन ही नहीं हुआ है और न ही परिषद की बैठक ही होती है.
जिन लोगों ने चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और चुनकर आए भी, उनमें से कुछ लगभग नज़रबंद की स्थिति में रखे जाने का इल्ज़ाम सरकार पर मढ़ते हैं. हालांकि शासन का कहना है कि जो सदस्य बाहर नहीं जा पा रहे हैं वो सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जा रहा है.
इस बारे में बीबीसी से हुई बातचीत में उप-राज्यपाल के सलाहकार फ़ारूख़ ख़ान ने कहा कि ज़िला विकास परिषद चूँकि एक नया सिलसिला है, तो इसे पूरी तरह से लागू करने में समय तो लगेगा.
मालूम हो कि इन चुनावों के बाद जम्मू और कश्मीर में कुल परिषदों का गठन किया गया था - 10 कश्मीर में और इतने ही जम्मू में. हर परिषद में 14 चुने हुए सदस्य हैं.
जम्मू और कश्मीर के पंचायती राज क़ानून (1989) के अनुसार, डीडीसी चेयरमैन को साल में परिषद की कम से कम 4 बैठकें ज़रूर बुलानी होती हैं.
क्या हुआ पिछले एक साल में?
कश्मीर में जिन निकायों के सदस्यों ने अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया है, उनके आरोप हैं कि बीते साल भर में परिषद की एक बैठक भी नहीं बुलाई गई.
जुलाई 2021 में बड़गाम डीडीसी के 10 सदस्यों ने चेयरमैन नज़ीर अहमद ख़ान के ख़िलाफ़ लिखित प्रस्ताव लाकर विकास लक्ष्य पूरा न होने का आरोप लगाया. उन पर सदस्यों से बुरे व्यवहार करने के भी आरोप लगाए गए.
कुछ माह बाद ही, अक्टूबर में गांदेरबल ज़िला परिषद के 14 में से 10 सदस्यों ने चेयरमैन नुज़हत इशफ़ाक़ (नेशनल कॉन्फ्रेंस) और वाईस-चेयरमैन बिलाल अहमद (पीडीपी) पर ज़िम्मेदारियों को न निभा पाने का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव पेश किया.
गांदेरबल के एडिशनल डिप्टी कमिश्नर मुज़फ़्फ़र अहमद पीर ने बीबीसी से कहा कि उनके प्रस्ताव को लेकर शासन को भेजी गई चिट्ठी का अभी तक कोई जवाब नहीं आया है.
वहीं पीडीपी से संबंध रखने वाले शोपियां डीडीसी के सदस्य राजा वहीद कहते हैं कि चुनाव तो करवाए गए, परिषद भी तैयार हुए, लेकिन ज़मीन पर इनका कोई वजूद नहीं है. वे कहते हैं कि न किसी तरह का कोई संपर्क है, न ही बैठकें बुलाई जाती हैं, एग्ज़ीक्यूटिव कमिटी का गठन होना चाहिए था, वो भी नहीं हुआ, विकास के मुद्दों पर चर्चा होना तो दूर की बात है.
राजा वहीद ने बीबीसी से कहा, "सरकारी विभागों में डीडीसी वालों की कोई अहमियत नहीं है. हमने इसे उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के सामने उठाना चाहा, तो हमें मुलाक़ात का वक़्त तक नहीं मिल पाया. हाल में जब अमित शाह कश्मीर आए, तो हमने उनके सामने ये सब बातें रखीं, तो उनका जवाब था कि आप इस्तीफ़ा दे दो न, तब लोग सामने आएंगे."
वे कहते हैं, "… आप खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि परिषद को कितना महत्व दिया जाता है. पार्लियामेंट में बड़ी-बड़ी तक़रीरें की जाती हैं. डीडीसी को ज़मीनी स्तर का लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा है नहीं."
सदस्यों पर बैठक में न आने का आरोप
शोपियां ज़िला विकास परिषद की अध्यक्ष बिलक़िस बानो हालांकि कहती हैं कि उन्होंने चुनाव के तुरंत बाद परिषद की बैठक बुलाई थी, लेकिन सदस्य उसमें शामिल नहीं हुए. उनके अनुसार, बाद में बर्फ़बारी के कारण वो मीटिंग नहीं बुला पाईं.
बिलक़िस बानो का संबंध जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी से है.
वहीं कुलगाम डीडीसी के सदस्य गुलज़ार अहमद डार (पीडीपी) ने आरोप लगाया कि सुरक्षा के नाम पर उन्हें अपने समर्थकों तक से नहीं मिलने दिया जाता. वे कहते हैं, "बीते एक साल में मैं दो बार अपने इलाक़े में जा पाया हूं. अगर मैं अपने लोगों की समस्याएं तक नहीं सुन पाता, न ही उन्हें हल कर पाता हूं तो मेरे डीडीसी में होने का क्या फ़ायदा?"
जम्मू और कश्मीर अपनी पार्टी के शोपियां डीडीसी के वाईस-चेयरमैन इरफ़ान मन्हास कहते हैं कि जिन नौजवानों ने जान ख़तरे में डालकर चुनाव में हिस्सा लिया, उन्हें अब बीच सड़क पर छोड़ दिया गया है.
इरफ़ान मन्हास सदस्यों को मिलनेवाली महज़ 15 हज़ार रुपये माहवार पर भी सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, "कहा ये गया था कि बीते 70 सालों में तीन ख़ानदानों ने सूबे पर राज किया और लूट-खसोट की. लेकिन जिन लोगों ने जान दांव पर लगाकर हिंदुस्तान का झंडा उठाया, उन पर गोली चलने का ख़तरा हमेशा बना रहता है. क्या हमारी जान की क़ीमत मात्र 15 हज़ार है?"
बडगाम ज़िले से एक सदस्य निसार अहमद ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि चुनाव के बाद से वे लगभग होटल के कमरे में बंद हैं. हालात इस क़दर ख़राब हैं कि वे अपने घरवालों तक से मिलने नहीं जा पाते.
निसार अहमद कहते हैं, "हमारे साथ एक बड़ा मज़ाक़ किया गया है. अधिकारी डीडीसी सदस्यों का फ़ोन तक नहीं उठाते हैं."
सरकार का पक्ष
कश्मीर में ज़िला विकास परिषद सदस्यों की शिक़ायत पर उप-राज्यपाल के सलाहकार फ़ारूक़ ख़ान ने कहा कि एक नया सिलसिला शुरू किया गया है, जिसे सुचारू रूप से चलने में समय लग सकता है.
फ़ारूक़ ख़ान का कहना था, ''बीते 75 सालों में किसी ने इस सिस्टम को बनने नहीं दिया. अब जबकि ये बन चुका है तो रातोंरात कोई जादू की छड़ी नहीं चल सकती. इख़्तियार दिए जा रहे हैं. फंड्स मिल रहे हैं. आने वाले दिनों में और अधिकार भी मिल जाएंगे.''
सदस्यों को बाहर जाने न दिए जाने के सवाल को उन्होंने सुरक्षा का मसला बताया. हालांकि सदस्यों द्वारा लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव पर उनका कहना था कि ये परिषद का अंदरूनी मामला है और सरकार इसमें दख़ल नहीं दे सकती.
'लोगों से जुड़ने का बेहतर ज़रिया हो सकती है डीडीसी'
जम्मू और कश्मीर पॉलिसी इंस्टीट्यूट के जवैद त्राली मानते हैं कि ये न सिर्फ़ विकास के हवाले से बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के साथ-साथ आम जनता के साथ रिश्ता क़ायम करने के लिए महत्वपूर्ण क़दम साबित हो सकता था.
जवैद त्राली कहते हैं, "डीडीसी चुनाव में चुने गए लोग ग्रासरूट कार्यकर्ता हैं, जो प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव ला सकते हैं. लेकिन नौकरशाही पूरे मामले को जिस तरह से हैंडल कर रही है, उससे बहुत ग़लत संदेश जा रहा है."
जावेद का कहना है कि इसकी सही भूमिका को समझकर जल्दी ही सुधार करने की ज़रूरत है.
जम्मू और कश्मीर अपनी पार्टी के उपाध्यक्ष ग़ुलाम हसन मीर डीसीसी के अप्रभावी रहने की एक और वजह बताते हैं.
वो कहते हैं,"चूँकि कश्मीर में विधानसभा मौजूद नहीं है, इसलिए सत्ता नौकरशाहों के हाथों में है. ऐसे में वे ऐसे हालात में डीडीसी सदस्यों के सामने क्यों जवाबदेह होना चाहेगी? "
इस बारे में राज्य बीजेपी के महासचिव अशोक कौल का कहना है जो दिक्क़तें आ रही हैं, उन पर विचार किया जाएगा.
वो कहते हैं," परिषद सदस्य आये रोज़ अविश्वास प्रस्ताव लाते हैं, ऐसे में जब ये लोग ख़ुद साथ नहीं हैं, तो हम किसकी बात सुनें?"
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)