झारखंड: कोरोना का टीका लेने के बाद बीमारी ठीक होने का दावा, क्या है सच

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए

आपने घुटनों के दर्द से परेशान मधेपुरा (बिहार) के बुज़ुर्ग ब्रह्मदेव मंडल की कहानी शायद पढ़ी-सुनी हो. उन्होंने पूरे 12 बार कोरोना का टीका लगवाया.

मंडल को लगता था कि टीकाकरण के बाद उनके घुटनों का दर्द कम हो रहा है. इस कारण वे बार-बार टीका लेते रहे और अंततः पकड़े गए.

बिहार पुलिस ने ब्रह्मदेव मंडल के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज़ की है.

मंडल ने जिस तरह का दावा किया, करीब- करीब उसी तरह के दावे अब झारखंड के एक शख्स भी कर रहे हैं.

झारखंड के बोकारो ज़िले के दुलारचंद मुंडा का दावा है कि कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड की पहली डोज़ के बाद उनकी नसों में दर्द की समस्या कम हो गई.

दुलारचंद मुंडा क़रीब एक साल से बिस्तर पर पड़े थे. उनका दावा है कि वो अब अपने पैरों पर खड़े हो पा रहे हैं और आवाज़ की लड़खड़ाहट भी ख़त्म हो गई. अब वे ठीक से बोल पा रहे हैं.

वो दावा करते हैं कि ये बदलाव कोरोना के टीके के कारण हुआ.

स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी डॉ. अलबेल केरकेट्टा मुंडा को वैक्सीन दिए जाने की पुष्टि करते हैं और कहते हैं कि एक टीम उनके दावों की जांच कर रही है. वहीं, बोकारो के सिविल सर्जन डॉ. जीतेंद्र कुमार कहते हैं कि टीके ने मुंडा के शरीर पर ऐसा कैसे किया होगा, ये शोध का मामला है.

'सड़क दुर्घटना के बाद हुए लाचार'

दुलारचंद मुंडा बोकारो के पेटरवार प्रखंड के सलगाडीह गांव में रहते हैं. वैक्सीन से जुड़े उनके दावे के बाद टकहा मुंडा टोला स्थित उनके घर पर लोगों की आवाजाही बढ़ गयी है. इनमें सर्वाधिक संख्या मीडिया और टीकाकरण से जुड़े चिकित्सकों और उनके सहयोगियों की है. आसपास के गांवों से भी लोग उन्हें देखने आ रहे हैं.

दुलारचंद मुंडा बताते हैं कि कुछ साल पहले एक सड़क दुर्घटना ने उनकी ज़िंदगी पर मानो ब्रेक लगा दिया. उनकी हड्डियों में असहनीय दर्द होता और उन्हें चलने-फिरने में परेशानी होती थी.

घरवालों ने धनबाद और बोकारो के अस्पतालों में उनका इलाज कराने के बाद जून 2021 में उन्हें रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में भर्ती कराया. वहां के न्यूरो साइंस विभाग में भी वे एक महीने तक भर्ती रहे.

इससे उन्हें थोड़ी राहत तो मिली लेकिन वे पूरी तरह ठीक नहीं हो सके. तबसे वे न तो चल पाते और न ठीक से बोल सकते थे. वे पूरी तरह लाचार हो गए और उनकी ज़िंदगी बिस्तर पर ही कटने लगी. वे अपने हर काम के लिए घरवालों पर निर्भर हो गए.

मुंडा का दावा

दुलारचंद मुंडा ने बीबीसी से कहा, ''बिछावन पर पड़े-पड़े मेरा मन उबने लगता था. पैसा भी नहीं है कि आगे का इलाज कराते. मैं अपने पैरों पर खड़ा होने की हालत में नहीं था. खाना-पैखाना सब घरवालों के सहयोग से ही संभव हो पाता था. अपने दम पर मैं न तो शौच के लिए जा सकता था और न ख़ुद के हाथों से खाना ही खा पाता था. लगता था कि मैं बोझ बन चुका हूं.''

''इस 6 जनवरी को मेरे घर पर टीकाकरण वाले आए और मुझे कोरोना का टीका लगा दिया. इसके अगले ही दिन मेरे हाथों में हरकत हुई. एक दिन बाद तो पैर भी उठाने पर उठने लगा. मेरी आवाज़ भी लड़खड़ानी बंद हो गई और मैं अब साफ़ बोल पा रहा हूं. यह सब टीका के चलते हुआ.''

''मेरी पत्नी ने मुझे सहारा देकर चलाया तो मैं उसकी मदद से चल भी पा रहा हूं. बैठ भी पा रहा हूं. मेरा दर्द कम हुआ है. मैं टीका बनाने वाले और उसे देने वाले को धन्यवाद बोलना चाहता हूं. मैं बहुत ख़ुश हूं.''

क्या है दावे की हक़ीक़त?

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पेटरवार के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अलबेल केरकेट्टा ने मुंडा को कोविशील्ड वैक्सीन देने की पुष्टि की.

डॉ. केरकेट्टा ने बताया कि घर-घर जाकर किए जा रहे टीकाकरण अभियान के तहत उन्हें कोरोना टीके की पहली डोज़ दी गई थी. उन्हें टीका देने वाली टीम में सलगाडीह गांव की सेविका यशोदा देवी और एएनएम सोनी कुमारी शामिल हैं.

डॉ. अलबेल केरकेट्टा ने कहा, ''मैंने उनकी मेडिकल हिस्ट्री देखी है. उन्हें स्पाइनल इंजरी थी. वे चलने और अपना काम ख़ुद करने में लाचार थे, लेकिन कोविशील्ड के पहली डोज़ के बाद उनके शरीर में सकारात्मक बदलाव हुए हैं. उनकी बीमारी में रिकवरी देखने को मिल रही है.''

वे कहते हैं, ''अब यह देखना होगा कि टीके के बाद दुलारचंद मुंडा के शरीर में क्या मॉलिक्यूलर बदलाव हुए या हो रहे हैं. मैंने उनके घर जाकर उनसे बातचीत की है. मैंने सिविल सर्जन साहब को भी सारी बात बतायी. उन्होंने मुझे फिर से उनके घर जाने को कहा है. उनके आदेश के बाद एक टीम इस पूरे मामले की जांच भी कर रही है.''

बोकारो के सिविल सर्जन डॉ. जीतेंद्र कुमार ने कहा कि उन्हें दुलारचंद मुंडा के बारे में जानकारी मिली है. यह शोध का विषय है कि कोरोना टीके ने उनके शरीर में इस तरह का असर कैसे किया. क्योंकि हमलोग ये टीका कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए दे रहे हैं, न कि स्पाइनल बीमारियों के लिए.

सलगाडीह गांव के शिक्षक राजू मुंडा ने बताया कि दुलारचंद मुंडा के बीमार होने के कारण घर के लोगों ने पहले टीका नहीं दिलवाया.

उन्होंने बताया, ''उन्हें डर था कि कहीं इससे उनकी स्थिति और ख़राब न हो जाए. इसलिए उन्होंने पिछले साल टीका नहीं लिया. लेकिन इस साल जब कोविड की तीसरी लहर आ गई, तब हम लोगों ने उन्हें टीका लेने के लिए राजी किया. इसके बाद इस 6 जनवरी को उन्हें कोविशील्ड की ख़ुराक दी जा सकी.

राजू मुंडा ने कहा, ''टीका लेने के बाद जब उनका हाथ-पैर चलने लगा तो उनके घर के लोगों ने मुझे फोन करके बुलाया. क्योंकि, उनका इलाज कराने मैं हर जगह जाता रहा हूं. पहले तो मुझे उनकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ, लेकिन जब उनकी आवाज़ सुनी तो मैं भी अचरज में पड़ गया.''

वे आगे कहते हैं, ''फिर मैंने उन्हें सहारा देकर चलाने की कोशिश की तो वे लाठी के सहारे घर से बाहर तक चलकर आए. अब वे कुर्सी पर बैठकर बात कर पा रहे हैं. यह कैसे हुआ, यह तो नहीं कह सकता लेकिन यह सब टीका लेने के बाद हुआ है. यही सबसे बड़ा सच है.''

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