NEET आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्या हैं मायने?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

शुक्रवार को दिए एक अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2021 के लिए एनईईटी स्नातकोत्तर (पीजी) पाठ्यक्रमों के लिए काउंसलिंग को आगे बढ़ाने के लिए अनुमति दे दी.

इसके साथ ही डॉक्टरों की भर्तियों में हो रही देरी की समस्या सुलझने का मार्ग प्रशस्त हो गया है.

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने कहा है कि ओबीसी का 27 फ़ीसदी कोटा और आर्थिक रूप से कमज़ोर (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण बरकरार रहेगा.

ईडब्ल्यूएस कोटा निर्धारित करने के लिए जो मानदंड इस्तेमाल किए गए हैं उनकी वैधता पर सुप्रीम कोर्ट मार्च ने विस्तृत सुनवाई करेगी.

इस अंतरिम फैसले का सीधा मतलब ये है कि 2021-22 के लिए एनईईटी पीजी काउंसलिंग ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण निर्धारित करने के मौजूदा मानदंडों के अनुसार आयोजित की जा सकेगी.

रेज़िडेंट डॉक्टर्स को राहत

पिछले साल दिसंबर के अंत में दिल्ली में डॉक्टर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे.

उनका ये कहना था कि काउंसलिंग न होने की वजह से नए डॉक्टरों की भर्ती नहीं हो पा रही थी और कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के समय में डॉक्टरों को अतिरिक्त घंटे बिना आराम काम करना पड़ रहा था. विरोध प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों की मांग ये थी कि मामले की सुनवाई जल्दी हो और काउंसलिंग और प्रवेश प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए ताकि ने डॉक्टरों की भर्ती हो सके.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद फेडेरशन ऑफ़ रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. मनीष ने इस मामले पर मीडिया से बातचीत की.

उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट का फैसला रेज़िडेंट डॉक्टर्स के लिए बहुत राहत की बात है. हम शुरू से कह रहे कि हमारे अस्पतालों में मैनपॉवर की काफी कमी है. और अब जब हमारा देश कोरोना की तीसरी लहर की चपेट में है और हमारे डॉक्टर्स हर दिन कोविड पॉजिटिव आते जा रहे हैं, उस वक़्त ये फैसला आना बहुत ही मायने रखता है हमारे लिए. में सुप्रीम कोर्ट और स्वास्थ्य मंत्रालय का तहे दिल से धन्यवाद देना चाहूंगा. हम उम्मीद करते हैं कि नीट पीजी काउंसलिंग का शेडूल जल्द से जल्द आएगा और हमारे जूनियर डॉक्टर्स जल्द से जल्द सारे अस्पतालों में ज्वॉइन करेंगे."

क्या कहते हैं याचिकाकर्ता?

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की वकील तन्वी दुबे ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले से भ्रम की स्थिति ख़त्म हुई है लेकिन किस हद तक ईडब्ल्यूएस का कोटा हो इस बारे में बहस मार्च में होनी बाकी है.

उन्होंने कहा, "ईडब्ल्यूएस कोटा की सीमा के बारे में जो हमारा मुक़दमा है वो अभी जारी है और मार्च में हमें उस पर बात करने के मौका मिलेगा. उसके फैसले का असर अगले साल के दाखिलों पर पड़ेगा."

बीबीसी ने तन्वी दुबे से पूछा कि क्या वो अदालत के आज के आदेश के खिलाफ अपील करेंगी? उन्होंने कहा, "अभी तक हमें ऑर्डर की कॉपी नहीं मिली है. उसका अध्ययन करने के बाद हम अपील करने के बारे में फैसला लेंगे. लेकिन हम जो भी फैसला लेंगे वो ये ध्यान में रख कर ही लेंगे कि काउंसलिंग में कोई देरी न हो. अगर आज के फैसले पर हम अपील करते हैं तो वो इस साल की काउंसलिंग पर असर डालेगा. हम भी पहले दिन से नहीं चाहते थे कि काउंसलिंग में कोई भी रुकावट आये."

तन्वी दुबे ने ये साफ़ किया कि उनका पक्ष नहीं चाहता है कि कोरोना वायरस की तीसरी लहर के समय में डॉक्टर हड़ताल पर जाएं. उन्होंने कहा, "अपील के बारे में हम जो भी फैसला करेंगे वो काउंसलिंग के रास्ते में नहीं आएगा क्यूंकि हम भी नहीं चाहते कि काउंसलिंग में कोई देरी हो."

क्या है पूरा मामला?

ये पूरा मामला नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट (नीट) में दाखिले को लेकर केंद्र सरकार की ओर से जुलाई 2021 में जारी अधिसूचना से जुड़ा है.

पिछले साल 29 जुलाई को केंद्र सरकार ने नीट परीक्षा में आरक्षण को लेकर एक अहम फ़ैसला लिया जिसमें कहा गया गया कि अंडर ग्रैजुएट और पोस्ट ग्रैजुएट के सभी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में अखिल भारतीय कोटा योजना के तहत ओबीसी वर्ग के 27% और ईडब्ल्यूएस वर्ग के 10% छात्रों को आरक्षण मिलेगा.

केंद्र सरकार का कहना था कि ईडब्ल्यूएस के तहत आरक्षण का लाभ वही छात्र उठा सकते हैं जिनके परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपए से कम है.

केंद्र सरकार का कहना था कि नीट में आरक्षण के फ़ैसले से एमबीबीएस में लगभग 1,500 और पोस्ट ग्रैजुएट में 2,500 ओबीसी छात्रों को हर साल इसका लाभ मिलेगा. वहीं ईडब्ल्यूएस वर्ग के लगभग 550 छात्रों को एमबीबीएस में जबकि 1,000 छात्रों को पोस्ट ग्रैजुएट की पढ़ाई में लाभ होने की बात भी कही गई थी.

इस फैसले के बाद नीट पोस्ट ग्रैजुएट एग्ज़ाम में बैठने की तैयारी करने वाले तकरीबन 45 छात्र दो समूहों में सुप्रीम कोर्ट पहुँचे और सरकार के इस फ़ैसले को पीजी एग्ज़ाम में इस साल लागू करने से रोकने की माँग की.

पिछले साल 25 अक्टूबर को मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि जब तक कोर्ट इस पर फैसला नहीं ले लेता, तब तक पीजी मेडिकल कोर्स की काउंसलिंग शुरू नहीं होगी.

25 नवम्बर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वो ईडब्ल्यूएस आरक्षण के निर्धारण के मानदंडों पर फिर से विचार करने का प्रस्ताव कर रही है. इसके बाद केंद्र सरकार ने मामले पर विचार करने के लिए एक एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया.

इस पूरे घटनाक्रम का नतीजा ये हुआ कि नीट पीजी पाठ्यक्रमों के लिए चल रही काउंसलिंग प्रक्रिया को रोक दिया गया.

केंद्र सरकार ने इसी साल 1 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया जिसमें कहा कि उसने नीट पीजी के सम्बन्ध में ईडब्ल्यूएस आरक्षण को तय करने के आठ लाख रुपए की वार्षिक आय सीमा के मौजूदा मानदंड पर कायम रहने का फैसला किया है.

साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को ये भी बताया कि मानदंडों पर दोबारा विचार करने के लिए सरकार ने जो विशेषज्ञ समिति बनाई है उसने सुझाव दिया है कि मौजूदा मानदंडों को इस बार की एडमिशन प्रक्रिया के लिए जारी रखा जा सकता है और समिति ने जिन संशोधित मानदंडों का प्रस्ताव दिया है उन्हें अगले प्रवेश चक्र से अपनाया जा सकता है.

क्या था सरकार का तर्क?

नीट पीजी एडमिशन में 27 प्रतिशत ओबीसी और 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण की घोषणा करते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि ये फैसला पिछड़े और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के छात्रों के लिए उचित आरक्षण प्रदान करने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

इस फैसले की घोषणा करते वक़्त केंद्र सरकार ने ये भी कहा था कि साल 2014 और 2020 के बीच देश में एमबीबीएस सीटों की संख्या में 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी और ये सीटें 54,348 से बढ़कर 84,649 हो गई थी. साथ ही केंद्र सरकार का कहना था कि पीजी सीटों की संख्या 2014 में 30,191 सीटों से बढ़कर 2020 में 54,275 सीटों तक पहुंच गई है. केंद्र सरकार ने ये भी कहा था कि इसी अवधि के दौरान देश में 179 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित किए गए हैं और कुल 558 मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें से 289 सरकारी और 269 प्राइवेट हैं.

क्यों हुआ विरोध?

केंद्र सरकार के इस फैसले के विरोध में जो याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे उनका कहना ये है कि ईडब्ल्यूएस और ओबीसी वर्ग को ये ताज़ा आरक्षण देने के बाद कुल आरक्षण 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हो जाएगा जो सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फ़ैसले के ख़िलाफ़ है.

याचिकर्ताओं ने ये सवाल भी उठाया कि ईडब्ल्यूएस की पात्रता किस आधार पर निर्धारित की गई है और उसके निर्धारण की प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई. साथ ही उनका कहना था कि पोस्ट ग्रैजुएशन में कितनी सीटें बढ़ाई गई हैं, इसके बारे में छात्रों के साथ जानकारी साझा नहीं की गई है.

इन याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर किए गए संविधान संशोधन का मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को पहले ही रेफेर किया जा चूका है.

सुप्रीम कोर्ट ने उठाये थे सवाल

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा था कि कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण के लिए पात्रता निर्धारित करने के लिए 'आठ लाख रुपए की सालाना आय' को आधार क्यों और कैसे बनाया गया. कोर्ट ने केंद्र सरकार से ये भी पूछा था कि क्या आठ लाख रूपए की सीमा तो तय करते वक़्त ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के अंतर को ध्यान में रखा गया?

ये सवाल उठाते समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा तहत कि ईडब्ल्यूएस मानदंड तय करना एक नीतिगत फैसला है लेकिन इसकी संवैधानिकता निर्धारित करने के लिए इसके पीछे के वजहें जानने का कोर्ट को हक़ है.

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