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NEET परीक्षा में ओबीसी आरक्षण न मिलने का पूरा सच - फ़ैक्ट चेक
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश में नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट यानी नीट परीक्षा की तारीख़ का एलान हो चुका है. इस साल 12 सितंबर को देशभर में मेडिकल में दाखिला के लिए नीट की परीक्षा होनी है. लेकिन उससे पहले ही इस परीक्षा में ओबीसी आरक्षण न दिए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
बुधवार को आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने एक डेटा शेयर करते हुए ट्वीट किया, " मोदी सरकार क्यों नहीं चाहती कि पिछड़े वर्गों के छात्र डॉक्टर बने? आख़िर भाजपा को देश के 60 फ़ीसदी से अधिक आबादी वाले पिछड़े और अति पिछड़े से नफ़रत क्यों है? नीतीश कुमार जैसे बीजेपी के सहयोगी #NEET परीक्षा में पिछड़ों का आरक्षण ख़त्म करवाने पर क्यों तुले है? मोदी जी ओबीसी से घृणा क्यों?''
दावा है कि 2017 से लेकर 2021 तक 11 हज़ार ओबीसी छात्रों को आरक्षण का फ़ायदा नहीं मिल सका है और ये सीटें सामान्य वर्ग के छात्रों को मिलीं.
राजनीतिक पार्टियां केंद्र सरकार पर ये आरोप लगा रही हैं कि जब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण दिया जा रहा है तो अन्य पिछड़ा वर्ग को ये आरक्षण क्यों नहीं मिल रहा है?
बीबीसी ने इस मामले को विस्तार से समझने की कोशिश की. क्या सच में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को मिलने वाला 27 फ़ीसदी आरक्षण नीट परीक्षा में छात्रों को नहीं दिया जा रहा है? और यदि ऐसा हो रहा है तो इसके पीछे वजह क्या है?
'ऑल इंडिया कोटा' क्या है?
इसे समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे ले चलते हैं. देश के सभी राज्यों के मेडिकल संस्थानों में साल 1984 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 'ऑल इंडिया कोटा' (AIQ) लागू किया गया.
ये ऑल इंडिया कोटा राज्य के अधीन आने वाले मेडिकल कॉलेज में सीटों का वो हिस्सा है जो राज्य के कॉलेज, केंद्र सरकार को देते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा था कि सभी राज्य अपने मेडिकल कॉलेज की 15 फ़ीसदी अंडर ग्रेजुएट सीटें और 50 फ़ीसद पोस्ट ग्रेजुएट सीटें केंद्र सरकार को देंगी.
केंद्र सरकार के हिस्से में आने वाली इन सीटों को 'ऑल इंडिया कोटा' का नाम दिया गया. इन सीटों पर देश के किसी भी राज्य के छात्र दाखिला ले सकते हैं. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि ज़्यादातर राज्य के कॉलेज में स्थानीय छात्रों को तरजीह दी जाती है.
ऑल इंडिया कोटा की सीटें बांटने और काउंसलिंग का काम केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) करता है. इसके इतर जो सीटें राज्य के हिस्से में होती हैं उन पर राज्य सरकार के अधिकारी काउंसलिंग करते हैं. ये सीटें ज़्यादातर राज्य के छात्रों को ही आवंटित की जाती हैं. साल 1985 से 2007 तक ऑल इंडिया कोटा की सीटों पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था.
2007 से जारी है AIQ में ओबीसी आरक्षण की लड़ाई
साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया कोटा में आरक्षण लागू किया और राज्य सरकार की तरह ही केंद्र सरकार के हिस्से की सीटों पर भी आरक्षण लागू करने के निर्देश दिए.
इसमें 7.5 फ़ीसदी आरक्षण अनुसूचित जनजातियों के लिए और 15 फ़ीसदी आरक्षण अनुसूचित जाति के लिए दिया गया. यहाँ ओबीसी को दिए जाने वाले आरक्षण का ज़िक्र नहीं किया गया.
इसके बाद साल 2010 में मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया नीट परीक्षा का रेगुलेशन लेकर आई और नीट को देशभर में पूरी तरह लागू साल 2017 में किया गया. अब किसी भी छात्र को मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के लिए नीट की परीक्षा देनी पड़ती है और इसके कटऑफ़ से ही ऑल इंडिया कोटा के तहत दाखिला मिलता है.
लेकिन अगर कोई ओबीसी छात्र राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेज में ऑल इंडिया कोटा के तहत दाखिला लेता है जो उसे 27 फ़ीसदी आरक्षण का फ़ायदा नहीं मिलता है.
'चार सालों में 11,000 से ज्यादा बच्चों के हक़ मारे गए'
देश भर में केंद्र सरकार और पीएसयू में काम कर रहे लगभग 40 से ज्यादा अन्य पिछड़ा वर्ग के संगठनों के समूह 'ऑल इंडिया ओबीसी फेडरेशन' ने केंद्र सरकार पर ओबीसी छात्रों को उनके अधिकार से वंचित रखने का आरोप लगाया है.
इस फेडरेशन का दावा है कि 27 फ़ीसदी ओबीसी आरक्षण साल 2017 से साल 2020 तक छात्रों को न मिलने के कारण 11 हज़ार से ज़्यादा ओबीसी समुदाय से आने वाले छात्रों को नुक़सान हुआ है. इस नुक़सान का फ़ायदा सामान्य वर्ग के लोगों को हुआ है.
साल 2017 से लेकर 2020 के दौरान इन सीटों पर ओबीसी आरक्षण ना मिलने से
• पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम (मेडिकल-एमडी, एमएस) में 7,307
• अंडर-ग्रेजुएट प्रोग्राम (मेडिकल-एमडी, एमएस) में 3,207
• पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम (डेंटल) में 262 और
• अंडर-ग्रेजुएट प्रोग्राम में 251 छात्रों का नुक़सान हुआ है.
अपने ट्वीट में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इन्हीं आँकड़ों का ज़िक्र किया है.
फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी जी. करुणानिधि ने बीबीसी को बताया, "साल 2020 में मद्रास हाईकोर्ट ने इंडियन मेडिकल काउंसिल से इस बारे में पूछा था कि जब केंद्र सरकार के मेडिकल संस्थानों में ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण मिल रहा है तो ऑल इंडिया कोटा में क्यों नहीं मिल रहा है?"
मद्रास हाईकोर्ट का निर्देश
मद्रास हाईकोर्ट के सवाल पर मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने अपना पक्ष भी रखा था.
मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कहा, "ऑल इंडिया कोटा में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति को ही आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है, इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण नहीं दिया जा सकता. ये नियम सुप्रीम कोर्ट के साल 2007 के आदेश के आधार पर बनाए गए थे. जब तक सुप्रीम कोर्ट इस वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव नहीं करता है ये प्रक्रिया ऐसे ही चलती रहनी चाहिए.''
हालांकि हाईकोर्ट ने मेडिकल काउंसिल की दलीलों के खारिज कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि ये कोई संवैधानिक या क़ानूनी रुकावट नहीं है जिस वजह से ऑल इंडिया कोटा में ओबीसी आरक्षण रोका जाए.
इसके साथ ही मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र को पांच सदस्यीय एक कमेटी का गठन कर ओबीसी आरक्षण ऑल इंडिया कोटा में कैसे लागू करना है इसे तय करने को कहा था.
ऑल इंडिया ओबीसी फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी जी करुणानिधि केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हैं कि "मद्रास हाई कोर्ट के निर्देश के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने कमेटी तो बनाई पर उसके सुझाव का क्या हुआ हमें कुछ पता नहीं. हमने इस बारे में साल 2020 के नवंबर में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को चिट्ठी लिखी थी. लेकिन कुछ नहीं हुआ. ये सरकार चाहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा फायदा सामान्य वर्ग के लोगों को मिले. यही कारण है कि लगातार ओबीसी लोगों के हक की सीटों पर भी सामान्य वर्ग को जगह दिया जा रहा है."
इस साल भी ऑल इंडिया कोटा में ओबीसी छात्रों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है.
यहां सबसे अहम बात ये है कि केंद्र सरकार के मेडिकल कॉलेजों में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी, अनुसूचित जाति को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फीसदी आरक्षण मिलता है.
सुप्रीम कोर्ट में याचिका और 2021 की नीट परीक्षा
नीट परीक्षा के साल 2021 के नोटिफ़िकेशन में केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले पर अपना रुख़ साफ़ करते हुए कहा है कि पांच सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी गई है और इसे सुप्रीम कोर्ट को सौंपने का फ़ैसला लिया गया है.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में 2015 के एक दूसरे मामले में सुनवाई चल रही है. ये मामला सलोनी कुमारी बनाम केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) का है, जिसमें ऑल इंडिया कोटा में ओबीसी आरक्षण न मिलने को लेकर ही सवाल उठाया गया है.
केंद्र सरकार का मानना है कि इस वजह से ऑल इंडिया कोटा में ओबीसी आरक्षण पर कोई निर्णय तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक सलोनी कुमारी केस में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ना आ जाए.
फ़ैक्ट : ये कहना कि नीट परीक्षा में ओबीसी को मिलने वाला आरक्षण ख़त्म किया गया है पूरी तरह सही नहीं है. ये पूरा विवाद सिर्फ़ ऑल इंडिया कोटा से जुड़ा हुआ है. और ये विवाद इसलिए है क्योंकि इससे जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है और केंद्र सरकार को कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार है.
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