बुल्ली बाई मामले में गिरफ़्तारियां और तीन महिलाओं की आपबीती

- Author, सुशीला सिंह और बुशरा शेख़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बुल्ली बाई ऐप मामले में चार गिरफ़्तारियां हो चुकी है. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अधिकारियों ने गुरुवार को असम से 21 साल के नीरज बिश्नोई को गिरफ़्तार किया है.
पुलिस के मुताबिक़ नीरज बिश्नोई इस मामले का 'मुख्य साज़िशकर्ता' है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस ऐप को इसी व्यक्ति ने डिज़ाइन किया था.
इससे पहले मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नागराले ने बुधवार तक तीन लोगों को गिरफ़्तार किए जाने की जानकारी दी थी.
हेमंत नागराले ने बताया, "ये एक संवेदनशील मामला है, जिसमें कुछ लोगों ने एक समुदाय की महिलाओं की मानहानि की और उनकी भावनाओं को आहत किया गया है."
मुंबई पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, "इन लोगों ने ऐप अपलोड किया और इसी नाम से ट्विटर हैंडल भी बनाया. इस मामले में शिक़ायत दर्ज़ कराए जाने के साथ ही पुलिस ने तुरंत जांच शुरू कर दी."
उन्होंने आगे बताया, ''इस मामले में तीन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. दो लोग उत्तराखंड से है जिसमें एक महिला है और तीसरा व्यक्ति मैंगलोर से है. ये इंजीनियरिंग का छात्र है और इसका नाम विशाल झा है.''
एक जनवरी को 'बुल्ली बाई' ऐप पर कई मुसलमान महिलाओं की ऑनलाइन बोली लगाने का मामला सामने आया था. इसमें से एक नाम सायमा रहमान का भी था.
सायमा रहमान, रेडियो जॉकी

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सायमा रहमान रेडियो जॉकी हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने अभियुक्तों की गिरफ़्तारी पर ख़ुशी ज़ाहिर की. उन्होंने कहा, "इस कार्रवाई से हमें एक उम्मीद बंधी हैं."
वे कहतीं है कि उन्होंने इस मामले में कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं कराई थी लेकिन जांच में एक औरत का नाम आना और उनकी गिरफ़्तारी उन्हें हैरान करती है.
सायमा कहती हैं, ''मैं पिछले चार-पांच साल से साइबर बुली की शिकार रही हूं. मेरी तस्वीरों को मॉर्फ करके ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल किया गया. 'सुल्ली' एक अपमानजनक शब्द है, जो मुसलमान लड़कियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पिछले साल जुलाई में जब ये मामला आया था, तब भी हमने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी, लेकिन कई लड़कियां अभी भी ऐसी है जिनके पास आवाज़ नहीं है. इसलिए इसे रोकना हमारी ज़िम्मेदारी है.''
जुलाई 2021 में मुसलमान महिलाओं की सोशल मीडिया तस्वीरों के साथ एक ऐप बनाया गया था- 'सुल्ली फॉर सेल'. ये एक ओपन सोर्स ऐप था, जिसमें क़रीब 80 से ज़्यादा महिलाओं की तस्वीर, उनके नाम और ट्विटर हैंडल दिए गए थे.
इस ऐप में सबसे ऊपर पर लिखा था- 'फाइंड योर सुल्ली डील'
'इन महिलाओं पर गर्व करें...'
सायमा आगे कहती हैं, ''हमारा समाज दकियानूस है और जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो एक लड़की पर ही सारे आरोप मढ़ दिए जाते हैं और पाबंदियां लगा दी जाती हैं. महिलाओं को कहा जाता है ज़्यादा मत बोलो, अपनी तस्वीर अपलोड मत करो. बल्कि माता-पिता को इन लड़कियों पर गर्व करना चाहिए और समाज को नाज़ होना चाहिए, क्योंकि ये वो लड़कियां हैं जिनसे गुंडे भी डरते हैं.''
वो कहती हैं, "हम लड़कियां बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रही हैं लेकिन इस मामले को ईंशा अल्लाह आख़िरी अंजाम तक ज़रूर लेकर जाएंगे ताकि आगे किसी के लिए परेशानी न बढ़े. अगर इस संस्कृति को यहीं नहीं रोका तो ये गुंडे हर लड़की के घर के बाहर नज़र आएंगे."
सायमा रहमान ऐसी घटनाओं को जीवन में आने वाली ऐसी बाधा के तौर पर देखती हैं जिसका रास्ता केवल आगे की ओर लेकर जाता है और पीछे सिर्फ़ खाई होती है.

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'महिलाओं को चुप कराने की कोशिश'
वे कहती हैं, "मुझे अपने परिवार के लिए डर लगता है क्योंकि वो मेरी सुरक्षा के लिए परेशान होते हैं. वे नहीं चाहते कि मेरे साथ कुछ बुरा हो इसलिए वो चाहते हैं कि मैं इतना ना बोलूं, इस तरह का स्टैंड ना लूं. तो ऐसे में मेरे लिए रास्ता यही होता कि कभी मैं घरवालों के लिए चुप हो जाती हूं लेकिन कभी ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए बोलना पड़ता है."
बुल्ली बाई ऐप पर 100 से ज़्यादा मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें शेयर की जा रही थीं और ये कहा जा रहा था कि वे 'बिक' सकती हैं. इनमें कई प्रमुख महिला पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की भी तस्वीरें शामिल थीं.
इस ऐप पर सायमा कहती हैं , '' ये सूची लड़िकयों के ख़िलाफ़ है, इस्लामोफोबिक और सांप्रदायिक तौर पर निशाना साधती है. और इस कृत्य में शामिल लोगों की कोशिश उन मुसलमान औरतों को चुप करवाने की है, जो उनके मुताबिक़ ट्विटर पर शोर मचा रही है, बुलंद होकर अपनी आवाज़ रख रही हैं.''
वे भारत में बन रहे माहौल पर कहती हैं, ''पता नहीं कब से हमारे देश में खुलेआम एक समुदाय विशेष के लोगों को गाली देना उस समुदाय के लोगों को नीलाम करना एक आम सी बात हो गई और सरकार चुप रहती है.''
कैसा महौल बनाया जा रहा है?
वे आगे कहती हैं, ''जिस तरह के भाषण दिए जाते हैं, वीडियो सामने आते हैं कि इस देश के मुसलमानों के साथ क्या करना चाहिए. उनके ख़िलाफ़ हथियार उठा लो. ये कैसा माहौल है? और ये बातें किसी से छिपी नहीं हैं. लेकिन इन मुद्दों पर सरकार में लोग कब जागेंगे, वो चुप क्यों है? और कब संज्ञान लेंगे?''
इस मामले में सबसे पहले गिरफ़्तार किए गए इंजीनियरिंग छात्र विशाल झा को लेकर सायमा कहती है कि इस लड़के को अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए, जबकि वो ऐप पर काम कर रहा है तो ऐसे में हिंदुस्तान कैसे आगे बढ़ेगा? ये आम हिंदुस्तानी क्यों नहीं सोचता?

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सायमा क्रिकेटर विराट कोहली की बेटी के ख़िलाफ़ हुए मामले का ज़िक्र करती हैं और कहती हैं कि इस मामले में शामिल व्यक्ति को तो मुंबई पुलिस ने चौबीस घंटे में पकड़ लिया था. मतलब ये है कि पुलिस तुरंत कार्रवाई कर सकती है लेकिन पिछले साल जुलाई में सुल्ली डील्स वाली बात सामने आई लेकिन क्या हुआ? दिल्ली पुलिस ने गंभीरता से कार्रवाई क्यों नहीं की?
मुंबई पुलिस के अनुसार टी20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत की हार के बाद विराट कोहली की बेटी का रेप करने की धमकी दी गई थी.
जिसके बाद क्रिकेटर विराट कोहली और फ़िल्म स्टार अनुष्का शर्मा की बेटी को धमकियां देने वाले शख़्स को मुंबई पुलिस के साइबर सेल ने गिरफ़्तार कर लिया था
वे कहती है कि इस मामले में ''मुझे प्रधानमंत्री और महिला और बाल विकास मंत्रालय से सुनना है कि ये काम ग़लत हो रहे हैं. ये एक नेशनल स्कैंडल है. पूरी देश की पुलिस क्यों नहीं काम कर रही है?''
हना मोहसिन ख़ान, कमर्शियल पायलट

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हना मोहसिन पेशे से एक कमर्शियल पायलट हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा कि बुल्ली बाई मामले में उनका नाम सूची में नहीं है लेकिन जब उन्होंने ऐप खोला तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आया. उन्होंने ख़ुद काफ़ी पीड़ा और ख़ुद को असहाय महसूस किया.
वे कहती हैं, ''मैं जब अपना फोन स्क्रॉल कर रही थी और नाम सामने आ रहे थे , ये मुझे बहुत दर्दनाक लगा. मुझे लगा कि ये दोबारा शुरू हो गया. नया साल आया था, सुकून मिला था. लेकिन सब बदल गया.''
हालांकि इस मामले में हुईं गिरफ़्तारियों पर हना मोहसिन ख़ुशी ज़ाहिर करती हैं.
वे कहती हैं,'' पिछले साल आए सुल्ली डील्स मामले में उन्होंने एफ़आईआर दर्ज कराई थी लेकिन मायूसी ही हाथ लगी थी. साथ ही इससे पहले उनकी सहेलियों को मई महीने में ईद के मौके पर ऐसे ही ऐप के ज़रिए नीलाम किया गया था और उस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी.''
पिछले साल सुल्ली डील्स का ज़िक्र करते हुए वो भावुक हो जाती हैं.
''टारगेट इसलिए बनी क्योंकि मुसलमान थी''
उनके अनुसार, ''जब मेरा नाम सुल्ली डील्स में सामने आया तो मैं शॉक में आ गई थी, क्योंकि मैं ना ही राजनीति पर बोलती हूं, ना मुझे कभी ट्रोल किया गया और मुझे केवल इसलिए टारगेट किया गया, क्योंकि मैं एक मुसलमान महिला थी. इसका असर मेरी सेहत पर भी पड़ा.''

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वे दुख जाहिर करती हैं और कहती हैं,'' मुझे लग रहा था कि अब हर अवसर पर मुझे अपना फ़ोन देखना होगा कि मैं यहां नीलाम हो रही हूं, मेरी फोटो के साथ कहां क्या होगा. कहीं ये शरीरिक नुक़सान में तो तब्दील नहीं हो जाएगा. मुझे किस तरह से अपना ध्यान रखना होगा.''
उनके अनुसार, "अगर ईद के मौके पर पुलिस ये कदम उठाती तो शायद अब जो हो रहा है वो नहीं होता.''
वो आगे कहती हैं कि जब ऐसी घटनाएं होती है तो परिवार में उनके भाई-बहन तो समझ जाते है लेकिन उनकी कोशिश यही रहती है कि वो अपने अम्मी-अब्बा को इन ख़बरों से दूर रखें और उन्हें सुरक्षित रखें.
वो कहती हैं,'' जो भी ऐसा कर रहे है वो हमें डरा नहीं पा रहे बल्कि मज़बूत ही कर रहे हैं.''
फ़ातिमा ख़ान, पत्रकार

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पेशे से पत्रकार फ़ातिमा ख़ान के ज़हन में पिछली साल जुलाई महीने में हुई घटना अभी भी तरोताज़ा है.
वो बीबीसी से कहती हैं कि पिछले साल सुल्ली डील्स में उनका नाम सामने आया था उस दौरान वो रिपोर्टिंग के लिए फील्ड में निकली हुई थी. और अब बुल्ली बाई में भी उनका नाम आया है.
वे बताती है, '' ऐसा उनके साथ दूसरी बार हुआ है और जब ये ट्वीट होने लगा तो जिस अकाउंट से ये हुआ था उसने मुझे टैग भी किया और ये 31 दिसंबर की रात थी.''
उनके अनुसार, ''मैंने पिछले साल इस घटना को छह महीने तक सहा. मैं वही दर्द अब नहीं झेल सकती. क्योंकि ये मुझे समझ आ गया था कि कैसी प्रतिक्रियाएं आएंगी, कौन सपोर्ट करेगा, कौन चुप रहेगा, इस पर बहस होगी. किसके लिए ये बड़ी डील है और किसके लिए नहीं है ये समझ आ गया गया.''
वे कहती हैं कि पिछली बार इस ख़बर को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ज्यादा गंभीरता से लिया था लेकिन इस बार लोग जागरुक दिख रहे हैं.
''ये काफी डरावना''
वे मानती है '' ये काफी डरावना होता है क्योंकि लिस्ट बनाना, फोटो डालना, आप ये सोचते हैं कि अब शोषण के लिए ये कौन-कौन से तरीके अपना सकते हैं.''
फ़ातिमा इसे 'प्रतीकवाद' बताती है और उनसे अनुसार ऐसा करके इस सूची में शामिल मुसलमान औरतों और जो सूची में नहीं हैं, उन्हें ये बताया जा रहा है कि 'तुम्हारी जगह ये है. तुम सिर्फ बेची जा सकती हो, तुम अपनी राय मत रखो, तुम अपना काम मत करो और घर में रहो.'
फ़ातिमा जेंडर मामलों पर रिपोर्टिंग भी करती हैं और इस मामले पर अपनी राय रखते हुए कहती हैं, ''पारंपरिक तौर पर भारत और मीडिया ने भी मुसलमान महिलाओं की स्टीरियोटाइप बना दिया है कि वो चुप रहती हैं, उनकी आवाज़ नहीं होती, वो दबी हुई होती हैं, अपने घरों में उनकी सुनी नहीं जाती, उनके पति, पिता भाई ख्याल नहीं रखते हैं और इस बीच एक नैरेटिव यही दिया गया है कि हमें इन्हें बचाना है.''
लेकिन 'मुसलमान औरतें हर क्षेत्र में आगे आईं हैं और जब ये औरतें ट्विटर या इंस्टाग्राम का इस्तेमाल एक तरह की बाते करने के लिए करती हैं कि ये ग़लत हो रहा है या नाइंसाफ़ी हो रही है तो एक सशक्त महिला की छवि ऐसे लोगों के बनाए गए नैरेटिव की उपेक्षा करती नज़र आती है और ये अत्याचार सहती मुसलमान औरत की तस्वीर के ख़िलाफ़ दिखाई देती है जो वो नहीं चाहते ऐसा हो और इसलिए ऐसी लिस्ट बनाई जाती है.'
उनके अनुसार साथ ही ऐसे ऐप के ज़रिए ये संदेश हमें ही नहीं बल्कि हर मुसलमान औरत को देने की कोशिश होती है कि 'तुम लोग अपनी जगह पर रहो नहीं तो तुम्हारे साथ यही होगा.'
सुल्ली डील्स में नाम आने पर वो कहती है कि उसका असर उनके दिलोदिमाग पर लंबे समय तक छाया रहा था.
उन्होंने बताया, ''सुली डील्स का मामला आया था तो मैं बीमार पड़ गई थी, मुझे उल्टियां होने लगी थी. शरीर पर असर हुआ.''
लोगों का रवैया

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लेकिन वे बताती है कि उनके लिए सबसे हैरानी वाली बात लोगों का रवैया था.
वे कहती है,'' लोगों की प्रतिक्रिया काफी दर्दनाक थी जिसमें कहा गया, अरे ये बस ऑनलाइन नीलामी है. ऐसा थोड़ी ना है कि तुम्हें सही में बेच दिया गया. क्या इसका मतलब ये हुआ कि जब ये सही में होगा तो हम इसका विरोध करेंगे. जो काफी दुख देने वाला था.''
"वो ये नहीं समझते कि ऐसी चीज़ों क्या प्रभाव पड़ता है? ये बुरा लगता है. और आधे से ज्यादा भावनाएं यहीं समझाने में चली जाती हैं. जो हमें समझाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए. और ये हमें भावनात्मक तौर पर तोड़ देता है."
वे मानती हैं कि जिस तरह से 'लिंचिग को नार्मल बना दिया गया' है आगे जा कर इसे भी कर दिया जाएगा जो बुरी बात होगी. लेकिन लोगों को इस पर लागातार बात करते रहना होगा ताकि इसे नार्मल ना बनने दिया जाए और इस पर विरोध दर्ज कराते रहना चाहिए.
फ़ातिमा इन घटनाओं को 'एंटी मुस्लिम हेट क्राइम यानी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफरत भरा अपराध' बताती हैं
वे इसे पितृसत्ताकमक सोच का हिस्सा मानने से इंकार करती है और कहती हैं, ''मुसलमान महिलाओं के ख़िलाफ़ है और ये इस्लामोफोबिक है. जहां एक समुदाय को संदेश देने की कोशिश है कि अपनी महिलाओं को संभाल कर रखो.''
तो क्या इसका एक उपाय सोशल मीडिया से खुद को दूर रखना हो सकता है?
इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ''कहीं ना कहीं हम ये सोचने लगते हैं कि इसके लिए हम ज़िम्मेदार है इसलिए कि हमें अपलोड नहीं करना चाहिए लेकिन कई ऐसे नाम है जैसे नजीब की मां का नाम आना. उसमें आप क्या कहेंगे.''
फ़ातिमा क़ानूनी कार्रवाई की ढ़िलाई पर सवाल उठाते हुए कहती हैं कि चलो ताज़ा मामले में पुलिस ने कार्रवाई तुरंत कर ली है लेकिन अगर पिछली बार सख़्त कार्रवाई होती तो एक मजबूत संदेश जाता कि ये एक वाहियात हरकत थी जिसकी सज़ा दी गई.
ऐसे में इस तरह के कारनामे करने वालों के मन में ये भाव भी आता कि वो कुछ भी करके बच नहीं निकल सकते.
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