2021: कोविड-19 ने भारत के लोगों को क्या सिखा दिया?

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- Author, डॉ. चंद्रकांत लहारिया
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
वर्ष 2021 की शुरुआत में भारत में कोविड-19 के रोज़ाना के नए मामले कम हो गए थे. अगस्त और सितंबर 2020 में आई पहली लहर को लोग लगभग भूलने लगे थे.
2021 के पहले दो महीनों में केंद्र और राज्य सरकारें अपनी पीठ थपथपा रहीं थी कि किस तरह से उन्होंने कोरोना के खिलाफ जंग जीत ली है.
16 जनवरी को देश में कोविड टीकाकरण शुरू हो गया था लेकिन टीके लगवाने में उत्साह कम ही था. 31 मार्च 2021 तक भारत में जितने टीके लगे थे उससे अधिक टीके 'वैक्सीन मैत्री' के तहत देश से बाहर भेजे गए.
मार्च 2021 आते-आते कोविड-19 के नए मामले बढ़ने लगे थे और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ देश में कोविड-19 की दूसरी लहर के बारे में चेता रहे थे. इस बीच 24 मार्च के आते आते भारत में कोरोना का एक नया रूप- जिसे उस समय 'डबल और ट्रिपल म्युटेंट' (बाद में डेल्टा वैरिएंट के रूप में नाम से जाना गया ) मिलने की ख़बर को सार्वजनिक किया गया.

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कितने सजग रहे लोग?
लेकिन इस सब को नज़रअंदाज़ करते हुए राज्यों में बड़ी चुनावी रैलियां होती रही और हरिद्वार में महाकुंभ चलता रहा. अप्रैल के पहले सप्ताह में देश में दैनिक नए मामले पहली लहर की पीक से अधिक हो गए थे. लेकिन न तो राजनीतिक रैलियां और न ही धार्मिक सम्मलेन रूके.
12 अप्रैल को महाकुंभ के शाही स्नान में लाखों लोगों ने सामूहिक रूप से गंगा में डुबकी लगाई और वो फिर लौटकर देश के विभिन्न हिस्सों में चले गए.
अप्रैल के चौथे सप्ताह में जब राजनीतिक दलों की रैलियां बंद हुई और महाकुंभके आखिर शाही स्नान पर रोक लगायी गयी तब तक स्थिति काबू से बाहर जा चुकी थी. जो हुआ उसे लोगों के लिए आजीवन भूल पाना मुश्किल होगा.
डेल्टा ने ढाया कहर
बीमार परिजनों को लेकर लोग अस्पतालों में बिस्तरों की तलाश में भटकते नज़र आए, ऑक्सीजन के लिए सिलिंडर की कतारों खड़े लोगों की तस्वीर आने लगी और ब्लैक मार्केट से दवाइयां खरीदी जा रही थीं.

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शमशान घाटों पर जगह और जलाने के लिए लकड़ी दोनों की कमी की तस्वीरें भी आने लगी थीं. अंतिम संस्कार के लिए घंटो का इंतज़ार करना पड़ा और पार्किंग लॉट्स को चिताओं को जलने लिए इस्तेमाल किया गया. शहरों के साथ देश में शायद ही कोई गांव या क़स्बा हो जिसने अप्रैल मई 2021 के महीनों में सामान्य से अधिक मृत्यु न रिपोर्ट की हो.
जब जुलाई 2021 के मध्य में चौथे राष्ट्रीय सीरो सर्वे के नतीजे आए तो पाया गया की भारत में 67.8 फीसदी लोगों में एंटीबाडीज पाईं गई और इनमें से अधिकतर को कोविड संक्रमण हो चुका था.
इससे पहले किए गए तीसरे सिरो-सर्वे में क़रीब 24 फ़ीसदी लोगों में एंटीबाडी मिले थे. भारत की करीब 44 फ़ीसदी यानी करीब 60 करोड़ लोग 2021 के पहले छह महीनों में कोविड से संक्रिमत हुए और अधिकतर लोग अप्रैल और मई में संक्रमित हुए. कुछ राज्यों में तो 70 से 80 फ़ीसदी आबादी संक्रमित हो गयी थी.
आधिकारिक रूप से कोरोना से हुई मौत का आंकडा करीब 471000 बताया गया लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान हैं कि वास्तविकता में 20 से 50 लाख लोगों की मृत्यु इस महामारी से हुई होगी.

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लाशों का ढेर
आंकड़े और सांख्यिकी, बीमारियों, महामारी और उनके मानवीय पहलुओं को व्यक्त करने में अक्सर विफल रहते हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों में गंगा में तैरती लाशें, प्रयागराज में रेत दफ़न कर दिए गए शव, दूसरी लहर की भयावह वास्तविकता का एक उदाहरण है. कोविड-19 की दूसरी लहर में भारत का प्रत्येक नागरिक - प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुआ. हर परिवार या रिश्तेदारी में कम से कम एक संक्रमित था और किसी न किसी परिचित की मृत्यु हुई.
खैर, साल का आखिर महीना आते आते देश में नए मामले कम हो गए थे. कोविड-19 टीकाकरण ने भी रफ़्तार पकड़ ली . व्यस्क आबादी में करीब 10 फ़ीसदी को कम से कम एक टीका लग चुका है. कोविड -19 के देश में एंडेमिक हो जाने की चर्चाएं होने लगी थीं लेकिन कोविड-19 के नए वैरिएंट ओमिक्रोन ने स्थिति पलट दी है.
भारत में राष्ट्रीय स्तर पर फ़िलहाल कोविड के दैनिक नए मामले लगभग स्थिर हैं, लेकिन चुनिंदा शहरों जैसे कि मुंबई और दिल्ली में नए केस बढ़ रहे हैं.
सरकार ने कुछ नए निर्णय लिए हैं जिसमें पाबंदिया जैसे कि रात्रि कर्फ्यू लगाना शामिल है. तीन जनवरी, साल 2022 में कोविड-19 का टीकाकरण साल 15-18 साल के बच्चों के लिए खोल दिया जाएगा साथ ही 10 जनवरी से स्वास्थ्य कर्मियों और 60 साल से अधिक के लोग जिन्हें अन्य बीमारियां भी हैं उन्हें कोविड का तीसरा टीका लगना शुरू हो जाएगा लेकिन सवाल उठता हैं कि क्या भारत 2022 में कोविड -19 महामारी से लड़ने से तैयार है?

ओमिक्रॉन का ख़तरा और कदम
पहली बात, ओमिक्रॉन तेज़ी से फैलता है लेकिन यह कहना मुश्किल है की ओमिक्रोन की वजह से देश में तीसरी राष्ट्र व्यापी लहर आ सकती हैं या नहीं? हाँ किसी भी परिस्थिति से निबटने के लिए हमें बेहतर तैयारी करनी होगी. खासतौर से चूंकि ओमिक्रोन कम लक्षणों वाली बीमारी होती हैं, इसलिए अस्पतालों में बिस्तरों और ICU के साथ -साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मज़बूत करने की ज्यादा जरूरत है साथ ही याद रखना होगा कि डेल्टा वैरिएंट भारत में अभी भी कोरोना का प्रमुख रूप है.
दूसरी बात, इस महामारी से लड़ने के लिए जरूरी है कि सरकारें, जन स्वास्थ्य और चिकित्सा विषेशज्ञ और आमजन मिलकर काम करें और अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाएं. सरकारों को स्वास्थ्य सेवाओं को हर स्तर पर सुदृढ़ करना होगा.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों को महामारी विज्ञान और सबूतों पर आधारित सुझाव और सलाह देनी होगी. आमलोगों को नियमित रूप से और जब तक कोविड महामारी हैं तब तक कोविड अनुकूल व्यवहारों का पालन करते रहना होगा. महामारी से निबटने के लिए तीनों को अपनी -अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.
तीसरी बात, 2021 में महामारी के दौरान कई अफवाहें फैली, जिन्होंने उतना ही नुक्सान किया जितना कोरोना ने. अक्सर जनता को सही जानकारी समय पर नहीं मिली और उससे चुनौतियाँ बड़ी. नए साल में विज्ञान कम्युनिकेशन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी.

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चौथी, ये चुनौतियाँ उभर कर आयी हैं और हमें महामारी के साथ उनसे भी निबटने के लिए तैयार होना होगा और वो ये हैं कि देश में पोस्ट कोविड और लॉन्ग कोविड के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों को उपलब्ध कराने की जरूरत है. जरूरी है कि ये सेवाएं देश के हर ज़िले और गांव-देहातों में पहुंचे.
साथ ही, महामारी में बच्चों के स्कूल एक लंब समय तक बंद रहे इससे उनकी पढ़ाई के नुक्सान के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ है. 2022 में सभी राज्य सरकारों को बच्चों की शिक्षा के नुकसान की भरपाई के लिए विशेष प्रावधान और स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु करने की जरूरत है.
देश भविष्य की स्वास्थ्य चुनौतियों और महामारियों से लड़ने के लिए तैयार हो यह सब तब संभव हो पाएगा जब सरकारें सीखने को तैयार होंगी. हमें भारत में केंद्र और राज्य सरकारों को महामारी के लिए किए गए प्रयासों का एक स्वतंत्र आंकलन करवाने की जरूरत है और उससे सीख लेकर पूरा स्वास्थ्य तन्त्र मज़बूत करना होगा.
एक बात निश्चित है कि यह महामारी ख़त्म हो जाएगी. महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इस महामारी के दौरान आई चुनौतियों से सीख लेकर भविष्य की किसी भी स्वास्थ्य चुनौती के लिए बेहतर रूप से तैयार हैं? महामारी के इस दौर से सीख लेकर भारत के स्वास्थ्य तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए क्या कदम उठाएंगे? नया साल इन सब बातों पर विचार करने का सही समय है।
(डॉ चंद्रकांत लहारिया पेशे से चिकित्सक हैं, और लोक नीति तथा जन-स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हैं)
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