अयोध्या के डीएम रहे अनुज झा के पिता ने भी ख़रीदी थी ज़मीन- प्रेस रिव्यू

अनुज झा

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इमेज कैप्शन, अनुज झा अयोध्या के डीएम 21 फ़रवरी 2020 से इस साल 23 अक्टूबर तक थे

9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने के पक्ष में जब फ़ैसला दिया तो कैसे वहाँ ज़मीन की ख़रीद में नौकरशाह से लेकर नेता तक जोड़-तोड़ करने में लग गए, इस पर अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की है.

पहली रिपोर्ट बुधवार को आई थी और आज यानी गुरुवार को उसकी दूसरी कड़ी आई है. आज की रिपोर्ट में बताया गया है कि अयोध्या के तत्कालीन डीएम अनुज झा के पिता के नाम से मंदिर से एक किलोमीटर दूर ज़मीन ख़रीदी गई.

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट ने 21 बीघा ज़मीन की जो अवैध ख़रीदारी की थी, उसमें एक दलित की भी ज़मीन है और उसने इसे लेकर शिकायत की है. अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, झा उन 15 अधिकारियों में से एक हैं, जिनके रिश्तेदारों ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अयोध्या में ज़मीन ख़रीदी थी.

अख़बार के अनुसार, रिकॉर्ड में यह बात सामने आई है कि 28 मई 2020 को अयोध्या में मंदिर से लगभग एक किलोमीटर दूर मुग़लपुरा में 320.631 वर्ग मीटर का प्लॉट अनुज झा के पिता बदरी झा के नाम पर रजिस्टर्ड हुआ. इस ज़मीन की क़ीमत 23.40 लाख थी. अनुज झा अयोध्या के डीएम 21 फ़रवरी 2020 से इस साल 23 अक्टूबर तक थे. अभी अनुज झा राज्य सरकार के पंचायती राज्य में निदेशक हैं और लखनऊ में रहते हैं.

अख़बार ने जब अनुज झा से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, ''अयोध्या धार्मिक स्थान है और मेरे पिता बुज़ुर्ग हैं. अगर वे जीवन के आख़िरी सालों में वहीं रहना चाहते हैं तो इसमें क्या ग़लत है. क्या वे यहाँ ज़मीन नहीं ख़रीद सकते हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.''

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्ड में लिखा है कि बदरी झा ने आवासीय ज़मीन तुलसीनगर के मंशाराम सिंह से ख़रीदी है. रजिस्ट्री में बदरी झा का पता बिहार के मधुबनी ज़िले के एक गाँव का है.''

अखिलेश यादव

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अखिलेश और जयंत की जोड़ी क्या खेल बदलने वाली साबित होगी?

किसान आंदोलन के कारण पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह से बदली हुई दिख रही है. कहा जा रहा है कि इस आंदोलन का सबसे ज़्यादा फ़ायदा राष्ट्रीय लोकदल को होने जा रहा है. आरएलडी और समाजवादी पार्टी के साथ आने से पश्चिम उत्तर प्रदेश का चुनावी तापमान और बढ़ गया है.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने किसान आंदोलन और पश्चिम उत्तर प्रदेश में चुनाव पर होने वाले असर को लेकर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की है.

द हिन्दू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''राष्ट्रीय लोकदल को किसान आंदोलन के कारण सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता दिख रहा है. चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी के साथ आरएलडी का गठबंधन सत्ताधारी बीजेपी पर भारी पड़ने जा रहा है. 23 दिसबंर को आरएलडी और समाजवादी पार्टी की अलीगढ़ के इगलास में दूसरी संयुक्त रैली है. पर्यवेक्षकों का मानना है आरएलडी अध्यक्ष जयंत सिंह ने किसान आंदोलन के दौरान अपनी पार्टी को मज़बूत करने के मौक़े का बख़ूबी इस्तेमाल किया. पश्चिमी उत्तर प्रदेश मुस्लिम और जाट बहुल इलाक़ा है.''

जयंत सिंह ने महामारी के दौरान दर्जनों रैलियां की थीं और लोगों से बीजेपी को वोट की चोट देने की अपील की थी. जयंत सिंह ने चुनाव में काफ़ी आक्रामक कैंपेन चला रखा है. अखिलेश यादव के साथ पहली संयुक्त रैली में भारी भीड़ जुटी थी. इस भीड़ को देखने के बाद अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि वोटों का स्थानांतरण कोई समस्या नहीं है.

जयंत सिंह

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दोनों पार्टियां जाटों और मुसलमानों को एकजुट करने की कोशिश कर रही हैं. साथ ही बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठा रही हैं. हालांकि सीटों की साझेदारी पर अभी बात पक्की नहीं हो पाई है लेकिन कहा जा रहा है कि आरएलडी को क़रीब 40 सीटें मिल सकती हैं. लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हैं जिन्हें लेकर कहा जा रहा है कि सब कुछ बहुत आसान नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक़ ग़ाज़ीपुर में किसानों का जो प्रदर्शन था उसमें 80 फ़ीसदी जाट थे.

जाट किसके साथ?

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, जाटों के एक तबके का मानना है कि जयंत सिंह उनके साथ खड़े थे और उन्हें एक मौक़ा देना चाहिए. वहीं दूसरा तबका अखिलेश यादव से गठबंधन को लेकर चिंतित है और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के दिनों की याद दिला रहा है.

लेकिन कई जाट ऐसे भी हैं जिनका कहना है कि अतीत को भूला जा सकता है. इनके लिए पहली पसंद आरएलडी है लेकिन दूसरी पसंद अब भी बीजेपी ही है. किसानों का एक तीसरा तबका है जो भारतीय किसान यूनियन से जुड़ा है और उनके मन में योगी आदित्यनाथ के प्रति सॉफ़्ट कॉर्नर है. बीजेपी ने कृषि क़ानूनों को रद्द करने के बाद काशी-मथुरा-औरंगज़ेब का मुद्दा उछाल दिया है और इस राजनीति से लड़ना इतना आसान नहीं होगा.

अखिलेश यादव

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हालांकि अख़बार से आरएलडी के विचारक सोमपाल शास्त्री ने कहा कि पार्टी बीजेपी के सांप्रदायिक एजेंडों का डटकर सामना करेगी. शास्त्री कहते हैं कि 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के बाद जाट और मुसलमान ख़ुद ही साथ आए हैं और गुर्जर बीजेपी के ख़िलाफ़ हो चुके हैं. यादव तो पहले से ही इस मोर्चे के साथ हैं. जातियां तो साथ हैं ही और अल्पसंख्यक भी साथ हैं. शास्त्री ने कहा कि यह एक मज़बूत गठबंधन है.

राकेश टिकैत के समर्थन को भी अहम माना जा रहा है, लेकिन उन्होंने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है. टिकैत ने कहा है कि वह सभी पार्टियों का पहले घोषणापत्र देखेंगे कि उसमें किसानों के लिए क्या है. अभी टिकैत ने सभी पार्टियों से कहा है कि उनकी तस्वीर का कोई इस्तेमाल ना करे.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि टिकैत जल्दबाज़ी में कुछ नहीं करना चाहते हैं और चुनाव की तारीख़ों की घोषणा का इंतज़ार कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि भारतीय किसान यूनियन में एक तबका है जो बीजेपी के राष्ट्रवादी एजेंडे का समर्थन करता है.

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म्यांमार को भारत ने कोविड-19 वैक्सीन की 10 लाख डोज़ सौंपी

भारत ने बुधवार को कोविड-19 वैक्सीन की 10 लाख डोज़ म्यांमार को दी है. म्यांमार इस साल के फ़रवरी महीने से ही सैन्य तख़्तापलट के कारण अशांति और भारी-विरोध प्रदर्शनों से जूझ रहा है.

भारत की ओर से वैक्सीन देने की ख़बर द हिन्दू के अलावा डीएनए में भी प्रकाशित हुई है. डीएनए ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''मंगलवार को भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला म्यांमार पहुँचे हैं. फ़रवरी में तख़्तापलट के बाद पहली बार भारत से कोई उच्चस्तरीय दौरा हुआ है. वैक्सीन की ये डोज़ श्रृंगला ने म्यांमार को सौंपी है.''

म्यांमार में भारतीय दूतावास ने कहा, ''विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने भारत में बनी दस लाख वैक्सीन की डोज़ म्यांमार रेड क्रॉस सोसाइटी के हवाले किया.'' बांग्लादेश, भूटान, नेपाल के अलावा म्यांमार भी उन देशों में शामिल था जिन्हें भारत ने जनवरी में वैक्सीन की आपूर्ति की थी. दो फ़रवरी को म्यांमार में आंग सान सू ची की चुनी हुई सरकार को सैन्य नेतृत्व ने सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.''

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संसद का शीतकालीन सत्र एक दिन पहले ही ख़त्म

संसद का शीतकालीन सत्र एक दिन पहले ही ख़त्म होने की ख़बर आज के तमाम अख़बारों में पहले पन्ने पर है. दैनिक जागरण ने लिखा है कि लखीमपुर खीरी और विपक्षी सांसदों के निलंबन पर सियासी गतिरोध के बीच संसद का शीतकालीन सत्र बुधवार को तय समय से एक दिन पहले ही ख़त्म हो गया.

विपक्षी दलों ने आख़िरी दिन भी इन दोनों मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाया. इस बीच दोनों सदनों को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया. सांसदों के निलंबन के कारण गतिरोध में उलझी राज्यसभा में मात्र 45 प्रतिशत ही कामकाज हुआ. लोकसभा में 82 फ़ीसदी काम हुआ और कुल 12 बिल पास हुए.

शीतकालीन सत्र के पहले दिन 29 नवंबर को कृषि क़ानूनों को वापस लेने वाला बिल पास हुआ था. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही ठीक से नहीं चल पाने के कारण चिंता जताई है. जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार, ओम बिरला ने कहा कि संसद में किसी भी विषय पर सहमति या असहमति हो सकती है लेकिन योजनाबद्ध तरीक़े से व्यवधान पैदा करना उचित नहीं है.

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