मोदी सरकार के मंत्री अजय मिश्रा टेनी को लेकर क्या दबाव में है बीजेपी?

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

संसद के दोनों सदनों में गुरुवार को गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हंगामा हुआ.

गुरुवार को लोकसभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अजय मिश्रा टेनी के इस्तीफ़े की मांग की.

उन्होंने कहा, "लखीमपुर खीरी में जो हत्या हुई है उसमें मंत्री जी को इस्तीफ़ा देना चाहिए. वे क्रिमिनल हैं."

राहुल ने कहा, "ये कहा गया कि लखीमपुर खीरी मामला एक साजिश है. बिल्कुल है. हर कोई जानता है कि इसमें किनका बेटा शामिल है. हम चाहते हैं मंत्री इस्तीफ़ा दें. हम संसद में बहस चाहते हैं लेकिन पीएम मोदी ने मना कर दिया. वे बहाने बना रहे हैं."

वहीं, राज्यसभा में सभापति वेंकैया नायडू ने कहा कि वो इस वजह से सदन के काम काज को ठप नहीं होने देंगे और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को उन्होंने बोलने से रोक दिया.

अजय मिश्रा टेनी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में गृह राज्य मंत्री हैं. बीते तीन अक्तूबर को यूपी के लखीमपुर खीरी में किसानों को कार के एक काफ़िले ने रौंद डाला था. उस घटना में चार किसानों की मौत हो गई थी. इसके बाद भड़की हिंसा में चार अन्य लोग भी मारे गए थे और मरने वालों का कुल संख्या बढ़ कर आठ पहुंच गई थी.

बाद में किसानों को कार से रौंदने के मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा गिरफ़्तार किए गए थे.

अगले महीने 2 जनवरी (2022) को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा की घटना के सिलसिले में गिरफ़्तार किए गए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्र को हिरासत में 90 दिन पूरे हो जाएंगे.

उत्तर प्रदेश की पुलिस को इस मामले से संबंधित आरोप पत्र इन्हीं 90 दिनों के भीतर दायर करना है.

आरोप पत्र में क्या कुछ होगा ये तो कहना मुश्किल है लेकिन घटना को लेकर जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के ज़रिए बनाई गयी 'स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम' (एसआईटी) ने अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी है जिसमें कहा गया है कि ये घटना 'एक सुनियोजित साज़िश' थी.

इसी रिपोर्ट के आधार पर विपक्ष ने बुधवार और गुरुवार को संसद के दोनों सदनों में जमकर हंगामा किया और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्त करने की अपनी मांग पर अड़े रहे.

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को कार्यस्थगन प्रस्ताव भी पेश किया था. विपक्ष के सदस्यों का कहना था कि जब सरकार के गठित विशेष जांच दल ने लखीमपुर की घटना को ही 'साज़िश' बताया है तो 'ये भी स्पष्ट होना चाहिए कि इसमें मंत्री की क्या भूमिका थी.'

टेनी के इस्तीफ़े को लेकर दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार दूसरे दिन हंगामे की भेंट चढ़ गई.

हालांकि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का कहना था कि चूंकि मामला अदालत में लंबित है इसलिए संसद में इसे लेकर चर्चा नहीं की जा सकती.

वहीं भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बीबीसी से कहा कि, "जब तक पुलिस अदालत में आरोप पत्र दायर नहीं करती है तब तक अजय मिश्रा टेनी पर आरोप लगाना और उन पर कोई कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं होगा.

उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि वो अगले सप्ताह तक आरोप पत्र दायर कर सकती है.

सरकार क्यों नहीं कर रही कार्रवाई?

वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर कहते हैं कि विपक्ष संसद में जितना चाहे हंगामा कर ले और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर ले, लेकिन सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान तो अजय मिश्रा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने में जल्दबाज़ी नहीं करना चाहेगी.

वे कहते हैं कि इसलिए सरकार जल्दबाज़ी नहीं करना चाहेगी क्योंकि अगर वो ऐसा करती है तो संदेश साफ़ जाएगा कि सरकार दबाव में आ गई है.

वे ये भी कहते हैं कि उतर प्रदेश में ऐसी धारणा बनाई जाने लगी कि ब्राह्मण, मौजूदा राज्य सरकार से नाराज़ हैं. विपक्षी पार्टियां धारणा को और अलग से अधिवेशन भी आहूत करने लगे.

दिवाकर कहते हैं, "लेकिन ये बहस का मुद्दा है. इसपर अलग अलग राय भी है. राजनीतिक दल अपने अपने दृष्टिकोण से इसकी व्याख्या कर रहे हैं."

दिवाकर कहते हैं, "जब विकास दुबे को मुठभेड़ में मारा गया था तब भी यही कहा जा रहा था. लेकिन उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण समाज को न तो अजय मिश्रा के मुद्दे से और न ही विकास दुबे के मामले से कोई मतलब है. उनकी नाराज़गी का कारण है उदासीनता- राजनीति और प्रशासन में."

जानकार कहते हैं कि यही वजह है कि कुछ ही दिनों पहले इन समीकरणों को 'बैलेंस' करने के लिए मिश्रा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था.

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी का आरोप है कि भाजपा की सरकार में ब्राह्मण समाज को राज्य में वो प्रतिनिधित्व नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी.

एमजे अकबर का उदाहरण

दूसरी तरफ़, उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पीयूष राय एमजे अकबर का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "जब अकबर पर आरोप लगे थे तो विपक्ष ने इसी तरह सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया था. लेकिन भाजपा टस से मस नहीं हुई और दबाव में झुकी नहीं. फिर अकबर ने अपने हिसाब से ख़ुद ही इस्तीफ़ा दिया था."

राय के अनुसार अजय मिश्रा टेनी का जो थोड़ा बहुत प्रभाव रहा है वो सिर्फ़ लखीमपुर और उसके आस पास के क्षेत्र तक ही सीमित है. जबकि प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में इनका न तो कोई प्रभाव है और न ही कोई उन्हें जानता है.

वे कहते हैं, "उत्तर प्रदेश के लोग पहले उनके नाम से रूबरू तब हुए जब उन्हें गृह मंत्रालय में बतौर एक राज्य मंत्री रखा गया. और दूसरी बार उनका नाम तब चर्चित हुआ जब लखीमपुर की घटना घटी."

सरकार को झुकना ही पड़ेगाः विश्लेषक

कुछ अन्य विश्लेषक अलग राय भी रखते हैं और किसान आंदोलन की मिसाल भी देते हैं.

वो बताते हैं कि जब किसान आंदोलन शुरू हुआ था तब भी यही कहा जा रहा था कि सरकार दबाव में नहीं है.

लेकिन, वो कहते हैं कि सरकार को आखिरकार झुकना ही पड़ा.

वैसे ही उनका मानना है की अजय मिश्रा का मामला भी इसी तरह का है और सरकार को झुकना ही पड़ेगा.

बहरहाल संसद के हंगामे और खींचातानी के बीच अजय मिश्रा टेनी अपने मंत्रालय भी पहुंचे जिससे अटकलें लगाई जाने लगीं कि वो इस्तीफ़ा दे सकते हैं.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बीबीसी से चर्चा के दौरान कहा कि जब तक आरोप पत्र अदालत में दायर नहीं होता है, तब तक मुश्किल ही है कि उनसे औपचारिक रूप से इस्तीफ़ा मांगा जाए. अलबत्ता, ये ज़रूर टेनी की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो क्या करते हैं.

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