जम्मू-कश्मीर: ग़ुलाम नबी आज़ाद क्या कांग्रेस छोड़ बनाएंगे अपनी अलग पार्टी?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी के लिए
बीते कई दिनों से जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस में एक तरह की उथल-पुथल मची हुई है. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी में अपने पदों से इस्तीफ़ा देकर पार्टी के मौजूदा प्रदेश नेतृत्व के ख़िलाफ़ खुलकर बग़ावत कर दी है.
जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के जिन नेताओं ने हाल में अपने पदों से इस्तीफ़ा दिया, उन सभी को पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद का करीबी समझा जाता है.
नेताओं के इस्तीफ़ों के बाद राज्य में कांग्रेस और ग़ुलाम नबी आज़ाद को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि, आज़ाद ने बीबीसी के साथ बातचीत में इन अटकलों को ख़ारिज किया है.

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'जो ऐसा सोचते हैं, उनकी सोच छोटी है.
ग़ुलाम नबी आज़ाद ने एक सवाल के जवाब में बीबीसी को बताया, "मेरी गतिविधियां कुछ ख़ास नहीं चल रही हैं. बीते ढाई सालों से कोविड के साथ आर्टिकल 370 ख़त्म करने और राज्य के दो हिस्से करने के बाद से लोगों से मेरा राब्ता कट गया था. एक साल तक तो नेताओं के घरों से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई थी और उनसे कहा गया था कि वे कहीं न जाएं. वो पाबंदी अभी ख़त्म भी नहीं हुई थी कि कोविड शुरू हो गया. तो लोगों और नेताओं का संपर्क टूटे ढाई साल हो गए."
आज़ाद ने आगे बताया, "बीते दो महीनों में हमें एक मौक़ा मिला तो जहां-जहां हो सका, हम वहां-वहां जाकर लोगों से मिले. अब लोग मेरे इन दौरों को लेकर कई तरह के क़यास लगा रहे हैं. लेकिन मैं दोबारा राब्ता बहाल कर रहा हूं."
ग़ुलाम नबी आज़ाद ने इस बात को साफ़ तौर पर ख़ारिज किया कि वो अपनी कोई पार्टी बना रहे हैं. उनका कहना था कि इस बात में कोई सच्चाई नहीं है. उनका कहना था कि वो कोई नई पार्टी नहीं बनाने जा रहे हैं, बल्कि अपनी ही पार्टी को और मज़बूत बनाएंगे.
ये जिक्र करने पर कि जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति से कई सीनियर नेताओं ने पार्टी के अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया तो उनका कहना था कि ये उन नेताओं की अपनी मर्ज़ी है.
उन्होंने कहा, "आप किसी को ज़बरदस्ती ओहदे पर तो रख नहीं सकते. कोई रहना चाहे तो रह सकता है, लेकिन किसी को पकड़कर तो नहीं रख सकते."
कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस आलाकमान को दबाव में लाने के लिए ग़ुलाम नबी आज़ाद ने अपनी सक्रियता तेज़ कर दी है.
बीबीसी ने जब आज़ाद से पूछा कि क्या आप कांग्रेस के आलाकमान को दबाव में लाना चाहते हैं. तो जवाब में उन्होंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है कि वो पार्टी आलाकमान को दबाव में लाएं. उनका ये भी कहना था जो जिस ज़िम्मेदारी को समझ रहा है, वो उस ज़िम्मेदारी को निभा रहा है.
ये पूछने पर कि कुछ हलकों में ये भी कहा जा रहा है कि बीजेपी के समर्थन से ग़ुलाम नबी आज़ाद अपनी अलग पार्टी बनाने जा रहे हैं, तो उनका जवाब था, "जो ऐसा सोचते हैं, उनकी सियासी सोच छोटी है."

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'नाराज़गी मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष से'
बीते दिनों जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस समिति के कई नेताओं ने अपने पदों से इस्तीफ़े दे दिए. इनमें पूर्व मंत्री जीएम सोरोरी, विकार रसूल वानी, डॉ. मनोहर लाल शर्मा, जुगल किशोर शर्मा, ग़ुलाम नबी मोंगा, नरेश गुप्ता, अमीन बट, सुभाष गुप्ता प्रमुख हैं.
इस्तीफ़ा देने वाले ये सभी नेता विधायक रह चुके हैं. इन नेताओं के अलावा पार्टी के दूसरे लोगों ने भी अपने इस्तीफ़े दिए हैं. इन सभी इस्तीफ़ों को पार्टी आलाकमान को भेज दिया गया है.
बनिहाल (रामबन) क्षेत्र के दो बार विधायक रह चुके विकार रसूल वानी ने बीबीसी को बताया कि ये इस्तीफ़े जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मौजूदा लीडरशिप को बदलने की मांग को लेकर दिए गए हैं.
रसूल का कहना था कि जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के चलते बीते वर्षों में जो नुक़सान हो चुका है, उस नुक़सान की भरपाई के लिए वो किसी ऐसे चेहरे को सामने लाना चाहते हैं, जो लोकप्रिय हो.
उनका कहना था, "आने वाले दिनों में यदि चुनाव होते हैं, तो हमारा मुक़ाबला नेशनल कॉन्फ़्रेंस, बीजेपी, पीडीपी, जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी और जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ़्रेंस से होगा. जब हमारे पास पार्टी अध्यक्ष का वो चेहरा होगा, जो लोगों को क़ुबूल नहीं है तो हम लोगों के सामने क्या लेकर जाएंगे?"

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रसूल वानी ने कहा, "इसलिए हमने ग़ुलाम नबी आज़ाद से विनती की कि बीते ढाई वर्षों से राज्य में कोई भी सियासी सरगर्मी नहीं है, तो कृपया आप सामने आएं. उन्होंने हमारे कहने पर जनसभाएं की. हमारे कहने पर उन्होंने मेरे बनिहाल क्षेत्र में अपना पहला जलसा भी किया. हम ऐसी लीडरशिप चाहते हैं, जो सामने आए तो लोग उसे क़ुबूल करें."
वो कहते हैं, "आप मुझे एक बात बताएं कि फ़ारुख़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के मुक़ाबले के लिए यदि हम कोई छोटा चेहरा सामने लेकर जाएंगे तो हम क्या उनका मुक़ाबला कर सकते हैं? जम्मू-कश्मीर में लोगों को दिखाने के लिए हमें कोई बड़ा चेहरा ही चाहिए."
उनके अनुसार, "यह राज्य देश के बाक़ी हिस्सों से अलग है. यहां मुद्दा चरमपंथ का है और सांति का है. यहां मुसलमान, हिंदू, गुर्जर और दूसरे लोग रहते हैं. इन सबके सामने रखने के लिए हमारे पास केवल एक ही चेहरा है और वो हैं ग़ुलाम नबी आज़ाद. प्रदेश कांग्रेस समिति के मौजूदा अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर क्या कर सकते हैं?"
वक़ार रसूल वानी कहते हैं कि उनकी पार्टी आलाकमान से ये विनती है कि वे सभी ज़िम्मेदारियों को ग़ुलाम नबी आज़ाद को सौंपें. रसूल के अलावा बाक़ी नेताओं ने अपने इस्तीफ़े पार्टी आलाकमान को भेज दिए हैं, लेकिन उनके इस्तीफ़े अभी तक क़ुबूल नहीं हुए हैं.

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क्या कहना है प्रदेश अध्यक्ष मीर का?
इस बारे में प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष ग़ुलाम अहमद मीर कहते हैं कि जिन लोगों ने अपने इस्तीफ़े पार्टी आलाकमान को भेजे हैं, उन्हें मेरे साथ आकर बात करनी चाहिए.
मीर कहते हैं कि जिन लोगों ने अपने इस्तीफ़े दिए, उनमें से केवल दो के पास पार्टी के पद थे और वे दोनों बीते चार सालों से पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में शरीक़ नहीं हो रहे थे.
ये पूछने पर कि जिन नेताओं ने अपने इस्तीफ़े दिए उन्होंने खुलकर कहा है कि वो आपके नेतृत्व से ख़ुश नहीं हैं, ग़ुलाम अहमद मीर ने कहा, "ये बात उन्होंने किसी अख़बार या कहीं और कही है. लेकिन उन्हें जहां कहना चाहिए था वहां उन्होंने अपनी बात नहीं कही. जब चुनाव का बिगुल बजेगा तो कांग्रेस के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता आपको एक प्लेटफ़ॉर्म पर नज़र आएंगे."

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क्या मानते हैं राजनीति के जानकार?
वहीं राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रदेश कांग्रेस समिति में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. उनका मानना है कि प्रदेश कांग्रेस दो ख़ेमों में बंट चुकी है.
चट्टान अख़बार के संपादक ताहिर मोईउद्दीन कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस दो ख़ेमों में बंट गई है. एक ख़ेमा, ग़ुलाम अहमद मीर और दूसरा ख़ेमा, ग़ुलाम नबी आज़ाद की नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है. मेरा अंदाज़ा है कि आगे चलकर आज़ाद का पलड़ा भारी पड़ सकता है."
लेकिन वो कहते हैं कि मुश्किल ये है कि कांग्रेस आलाकमान का झुकाव आज़ाद की तरफ़ नहीं बल्कि दूसरी तरफ़ जा रहा है. इसके चलते आने वाले दिनों में पार्टी की ये दरार और भी बढ़ सकती है."
ताहिर मोईउद्दीन ये भी कहते हैं कि ग़ुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस के सीनियर नेता हैं और उनका कांग्रेस से अलग होना मुश्किल है. वो कहते हैं कि कुछ अटकलें ये भी हैं कि आज़ाद अपनी अलग पार्टी बनाएंगे. हालांकि उनका मानना है कि ये फ़ैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी आलाकमान का रुख़ क्या रहता है. यदि आज़ाद को मनाने की कोशिश की गई तो हालात बदल भी सकते हैं.
आख़िर में वो कहते हैं, "यदि ग़ुलाम नबी आज़ाद को मनाने के बजाए धकियाने की कोशिश हुई तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज़ाद अपनी अलग पार्टी बना लें."
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