जनरल बिपिन रावत और पत्नी मधुलिका रावत पंचतत्व में विलीन

जनरल बिपिन रावत

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देश के पहले चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ जनरल बिपिन रावत और उनकी पत्नी मधुलिका रावत का शुक्रवार को अंतिम संस्कार कर दिया गया. दिल्ली कैंट के बरार स्क्वायर पर उनकी दोनों बेटियों कृतिका और तारिणी रावत ने उन्हें मुखाग्नि दी.

जनरल बिपिन रावत

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अंतिम संस्कार पूरे सैनिक सम्मान के साथ किया गया. देश की तीनों सेनाओं के संयुक्त दस्ते ने 17 तोपों की सलामी देकर अपने पहले सीडीएस को अंतिम विदाई दी.

उनका अंतिम संस्कार दिल्ली कैंट के बरार स्क्वैयर में किया गया. इस दौरान बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी वहां मौजूद थे.

जनरल बिपिन रावत

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इससे पहले सीडीएस बिपिन रावत का पार्थिव शरीर उनके सरकारी आवास पर रखा गया, जहाँ बड़ी संख्या में राजनेताओं, सैनिक अधिकारियों और अन्य लोगों ने श्रद्धांजलि दी.

जनरल बिपिन रावत

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आठ दिसंबर को तमिलनाडु के कुन्नूर में हुई हेलिकॉप्टर दुर्घटना में बिपिन रावत समेत 13 लोगों की मौत हो गई थी. इस हादसे में उनकी पत्नी मधुलिका रावत की भी मौत हो गई थी.

इस हादसे में ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह बच गए थे, जिनका इलाज चल रहा है. उनकी स्थिति गंभीर लेकिन स्थिर बताई जा रही है.

अमित शाह

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जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि देने के लिए शुक्रवार सुबह से ही उनके सरकारी आवास पर लोगों की भीड़ लगी रही.

जनरल बिपिन रावत

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इमेज कैप्शन, जनरल बिपिन रावत के परिवार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी
राहुल गांधी

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कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी भी जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि देने पहुंचे.

जनरल बिपिन रावत

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उन्हें श्रद्धांजलि देने वाले गणमाण्य लोगों में तीनों सेनाओं के प्रमुख, भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी, मनसुख मांडविया, सर्बानंद सोनोवाल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और किसान नेता राकेश टिकैत शामिल रहे.

पीएम मोदी

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इससे पहले गुरुवार को जब जनरल रावत और अन्य सैनिकों के पार्थिव शरीर को दिल्ली लाया गया था तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, एनएसए अजित डोभाल और सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों ने पालम एयरपोर्ट जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.

पीएम मोदी

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जनरल बिपिन रावत को 31 दिसंबर 2019 को भारत का पहला सीडीएस नियुक्त किया गया था और इसके अगले दिन उन्होंने कार्यभार संभाला. बतौर सीडीएस जनरल रावत की ज़िम्मेदारियों में भारतीय सेना के विभन्न अंगों में तालमेल और सैन्य आधुनिकीकरण जैसी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां शामिल थीं.

जनरल बिपिन रावत

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जनरल रावत इससे पहले भारतीय सेना के प्रमुख रह चुके थे. वे 31 दिसंबर 2016 से 1 जनवरी 2017 तक भारत के 26 वें थल सेना प्रमुख रहे.

जनरल रावत का जन्म 16 मार्च 1958 को उत्तराखंड के पौड़ी ज़िले में एक सैन्य परिवार में हुआ. उनके पिता सेना में लेफ़्टिनेंट जनरल थे. जनरल रावत 1978 में सेना में शामिल हुए थे.

जनरल बिपिन रावत

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चार दशक से लंबे सैन्य जीवन में जनरल रावत को सेना में बहादुरी और योगदान के लिए परम विशिष्ट सेवा मेडल, उत्तम युद्ध सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल, युद्ध सेवा मेडल, सेना मेडल और विशिष्ट सेवा मेडल के अलावा और कई प्रशस्तियों से सम्मानित किया गया.

अपने करियर के दौरान जनरल रावत ने ब्रिगेड कमांडर, जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग चीफ़, दक्षिणी कमांड, मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट में जनरल स्टाफ़ ऑफ़िसर ग्रेड जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काम किया.

जनरल बिपिन रावत अपने पिता के साथ

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इमेज कैप्शन, जनरल बिपिन रावत अपने पिता के साथ

उत्तर-पूर्व में चरमपंथ में कमी के लिए उनके योगदान की सराहना की गई. रिपोर्टों के मुताबिक साल 2015 में म्यामार में घुसकर एनएससीएन-के चरमपंथियों के खिलाफ़ भारतीय सेना की कार्रवाई के लिए भी उन्हें सराहा गया. 2018 के बालाकोट हमले में भी उनकी भूमिका बताई गई. उन्होंने भारत के पूर्व में चीन के साथ लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल या एलएसी पर तैनात एक इन्फ़ैंट्री बटालियन के अलावा कश्मीर घाटी में एक राष्ट्रीय राइफल्स सेक्टर की कमान संभाली.

इसके अलावा रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में उन्होंने विभिन्न देशों के सैनिकों की एक ब्रिगेड की भी कमान संभाली. जनरल रावत भारत के उत्तर-पूर्व में कोर कमांडर भी रहे.

जनरल बिपिन रावत

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जनरल रावत डिफ़ेंस सर्विसेज़ स्टाफ़ कॉलेज (वेलिंगटन, तमिलनाडु) और कमांड एंड जनरल स्टाफ़ कोर्स फ़ोर्ट लीवनवर्थ (अमरीका) के ग्रैजुएट थे. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और मिलिट्री लीडरशिप पर कई लेख लिखे. उनके पास मैनेजमेंट और कंप्यूटर स्टडीज़ के डिप्लोमा थे. मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ने उन्हें मिलिट्री मीडिया स्ट्रैटजिक स्टडीज़ में उनके शोध के लिए उन्हें डॉक्टर ऑफ फ़िलॉसफ़ी की उपाधि दी गई.

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