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भारत में प्यार और शादी को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े
प्यार और शादी को लेकर भारतीय क्या सोचते हैं? पत्रकार रुक्मिणी एस. ने विवाह और प्रेम संबंधों को आधार बनाने वाली सामाजिक राजनीतिक वास्तविकताओं की तस्वीर को आकंड़ों के ज़रिए समझने की कोशिश की है.
22 साल के नितिन कांबले मुंबई से महीने में दो बार पूरी रात की बस यात्रा करके अपने गांव जाते हैं, जहां उनका परिवार रहता है. कांबले मुंबई में काम करते हैं. जब वे गांव जाते हैं दो बैग भरते हैं- एक बैग में वे अपना सामान ले जाते हैं और दूसरे बैग में वह सामान होता है जिसे नहीं ले जा सकते, इस सामान को वे किराए के अपने एक कमरे में बेड के नीचे रख देते हैं.
नितिन अब मासांहारी खाना खाने लगे हैं और कभी कभार बीयर भी पी लेते हैं लेकिन मुंबई में जो बैग वे छोड़कर जाते हैं, उसमें उनका सबसे गहरा राज छुपा है- उनकी गर्लफ्रेंड जो दूसरी जाति की है.
नितिन को मालूम है कि ये बात ना तो उनके माता-पिता को स्वीकार होगी और गर्लफ्रेंड की माता-पिता को तो किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं होगी.
आपको ये कहानी सुनी-सुनाई लग रही होगी लेकिन अगर आप आंकड़ों को देखेंगे तो मालूम होगा कि नितिन एकदम बाहरी दुनिया के शख़्स हैं.
भारत के कई बड़े सवालों के जवाब आंकड़ों से मिल जाते हैं, जैसे कि भारतीय कैसे कमाते हैं और कमाए हुए पैसों को कैसे ख़र्च करते हैं. क्या काम करते हैं, कैसे वोट देते हैं, किन वजहों से मरते हैं. कई बार आंकड़े जीवन के खालीपन को भरते हैं, जब वे केवल जीवन बिता रहे होते हैं तो क्या सोचते हैं- मसलन वे प्यार के बारे में क्या सोचते हैं?
आंकड़ों के ख़जाने से, मैं भारत में प्रेम और उसके लेकर चल रहे प्रयोगों के समृद्ध दृष्टिकोण को एकसाथ रख रहा हूं.
भारतीय फ़िल्में देखने से ऐसा लगता है कि युवा भारतीयों के लिए रोमांस और प्रेम के सिवा कोई दूसरा काम नहीं है. ये सच भी हो सकता है लेकिन अभी भी अधिकांश भारतीयों ने अरेंज मैरिज ही की हैं.
2018 के सर्वे के मुताबिक] एक लाख 60 हज़ार से ज़्यादा भारतीय परिवारों में 93 प्रतिशत से ज़्यादा शादीशुदा लोगों ने कहा कि उनकी शादी अरेंज मैरिज है. महज तीन प्रतिशत लोगों ने अपने विवाह को प्रेम विवाह बताया जबकि केवल दो प्रतिशत लोगों ने अपनी शादी को लव कम अरेंज मैरिज बताया. इससे ज़ाहिर है कि भारत में शादियां परिवार के लोग शादियां तय करते हैं.
समय के साथ इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है- अस्सी साल से अधिक उम्र के लोगों में 94 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनकी शादी अरैंज मैरिज थी जबकि 20 साल से अधिक उम्र के युवाओं में यह अरैंज मैरिज के मामले 90 प्रतिशत से ज़्यादा हैं.
मनीषा मंडल हमेशा प्रेम विवाह करने के बारे में सोचती थीं. भिलाई में ऑफिस अस्सिटेंट का काम करने वालीं मनीषा बताती हैं, "मैं अपने माता-पिता से लड़ा करती थीं. अपने घर से थोड़ी दूर स्थित कॉलेज जाने के लिए भी मुझे झगड़ा करना पड़ा था. तब मैंने सोचा था कि अब अगली लड़ाई प्रेम विवाह करने के लिए होगी."
कॉलेज में शुरुआती दिनों में ही कुछ लड़कों ने मनीषा से बात करने की कोशिश की. इसके बाद कॉलेज की पुरानी छात्राओं ने मनीषा को बाथरूम में ले जाकर कहा कि लड़कों से बात करने पर उसकी इज़्ज़त ख़त्म हो जाएगी.
मनीषा पर नज़र रखने के लिए उनके बड़े भाई भी कॉलेज परिसर का चक्कर लगाते थे ताकि वह लड़कों से बात नहीं कर सके. मनीषा के लिए प्यार करने का जोख़िम लेने से ज़्यादा महत्वपूर्ण कॉलेज की पढ़ाई पूरी करना बन गया क्योंकि उन्हें पढ़ाई पूरी करने के बाद काम करना था.
जब मनीषा कॉलेज के अंतिम साल में पहुंची तो उनकी शादी अपनी ही जाति में पिता के दोस्त के बेटे से तय हो गई. 24 साल की मनीषा ने व्हाट्सऐप कॉल पर बताया, "मैं अपने माता पिता को देख रही हूं. उनकी आपस में कभी लड़ाई नहीं हुई. इसलिए मुझे भी लगा कि यह मेरे लिए भी कारगर रहेगा."
भारत में शादियों की सबसे आवश्यक गुण अपनी जाति में ही शादी है. 2014 के एक सर्वे में शहरी भारत के 70 हज़ार लोगों में 10 प्रतिशत से भी कम लोगों ने माना कि उनके अपने परिवार में जाति से अलग से कोई शादी हुई है.
अंतरधार्मिक शादियां तो और भी कम होती हैं- शहरी भारत में महज पांच प्रतिशत लोगों ने माना है कि उनके परिवार में किसी ने धर्म से बाहर जाकर शादी की है.
भारत में युवा अमूमन जाति के बंधन को तोड़कर शादी करने की इच्छा जताते हैं, लेकिन सर्वे से यह भी ज़ाहिर हुआ था कि इच्छा जताने और वास्तविकता में उसे करने में काफ़ी अंतर है.
2015 में रिसर्चरों ने मेट्रीमोनियल वेबसाइट के ज़रिए एक हज़ार संभावित दुल्हनों से संपर्क किया है, इनमें से आधी दुल्हनों ने जाति से अलग भी शादी करने की इच्छा जताई लेकिन शत प्रतिशत दुल्हनों ने अपनी जाति के ही पुरुषों में दिलचस्पी दिखाई.
संभावित वर अगर दलित हो तो उससे संपर्क करने की संभावना नगण्य है, चाहे दूसरे तमाम मापदंडों, शिक्षा, वेतन, गोरा रंग इत्यादि सब एकसमान क्यों ना हो.
इस परंपरागत पृष्ठभूमि में, अपनी पसंद का चुनाव विद्रोह बन जाता है और इसके अपने ख़तरे भी होते हैं.
2014 में मैंने दिल्ली के सात ज़िला अदालतों में 2013 के बलात्कार के सभी मामलों के फ़ैसले को देखा- क़रीब 600 मामले थे. इसमें 460 मामलों की अदालत में पूरी तरह से सुनवाई हुई थी, इसमें 40 प्रतिशत मामले या तो आपसी सहमति या फिर कथित तौर पर सहमति से बने संबंधों के थे.
इनमें से अधिकांश जोड़े घर से भाग कर शादी करने वाले प्रतीत हो रहे थे, जिसमें बाद में माता-पिता, आम तौर पर महिला के माता-पिता की ओर से अपहरण और बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे. इनमें से कई अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक संबंध थे.
युवा जोड़ों के बीच शारीरिक संबंध, इन परिवारों को अपनी मान्यता और ढांचे के लिए इतने ख़तरनाक लगे कि इन परिवारों ने बलात्कार का कलंक स्वीकार करना बेहतर समझा.
स्थिति और बिगड़ सकती है. पिछले एक दशक में, भारत में कट्टरपंथी हिंदू समूहों ने 'लव जिहाद' का हौवा खड़ा किया है, इसका इस्तेमाल वे मुस्लिम पुरुषों पर आरोप मढने के लिए करते हैं कि हिंदु महिलाओं से शादी करके उन्हें मुसलमान बना रहे हैं.
भारत के कई राज्यों में ही नहीं बल्कि केंद्र में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, इन सरकारों ने उन परुषों के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बनाया है जो महिलाओं को विवाह के बाद ज़बरन धर्मांतरण के लिए दबाव डालते हैं.
इन सरकारों ने सहमति से अंतरधार्मिक शादी करने वालों पर भी प्रतिबंध बढ़ाया है, इसे एक तरह से प्रेम पर पुलिस के पहरे को वैधता प्रदान की है.
प्रेम करने वालों पर सख़्ती से भारत में अंतरधार्मिक शादियां और भी कम होंगी. इतना ही नहीं प्रेम और शादी को लेकर आंकड़े जुटाने में भी मुश्किल होगी और वे कम विश्वसनीय होंगे.
एक अंतरधार्मिक जोड़े ने मुझे बताया कि महिला के परिवार से उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इस जोड़े ने विवाह का पंजीयन केवल इसलिए नहीं कराया क्योंकि पंजीयन कार्यालय ऐसे जोड़ों के नाम सार्वजनिक करते हैं.
एक तरह से दोहरा जीवन बिता रहे नितिन ने संक्षेप में कहा, "आपके आंकड़े बता रहे हैं कि अंतर जातीय, अंतर धार्मिक विवाह बहुत कम हैं, लेकिन यह आपको प्यार के बारे में नहीं बताता."
यह वह परिदृश्य हो सकता है जहां भारत के युवा वीरता से लड़ रहे हैं लेकिन अंतत वे यह युद्ध हार रहे हैं.
(कुछ लोगों की पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं. )
लेखिका रुक्मिणी एस की नई किताब 'होल नंबर्स एंड हॉफ ट्रूथ्स- व्हाट डेटा कैन एंड कांट टेल अस अबाउट मॉर्डन इंडिया' अमेज़न वेस्टलैंड से प्रकाशित है.
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