You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: 'कब्र में पहुंचे बेधड़क प्यार का क़ातिल-377'
- Author, हरीश अय्यर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मैं आज़ाद भारत की खुली हवा में पैदा हुआ. लेकिन अगर मैं गे हूं तो मेरे लिए आज़ादी की परिभाषा बदल जाती है. तब मैं आज़ाद नहीं हूं. सरकार को लगता है कि मुझ पर पैनी निगाह रखने की ज़रूरत है.
ये घूरती आंखें उन जगहों पर भी मेरा पीछा करती हैं, जो मेरे लिए बेहद निजी हैं. कुछ लोगों को ये लगता है कि मेरे बारे में अभद्र बातें करना का उनके पास हक है. वो ये मान लेते हैं कि मेरे निजी सेक्स लाइफ पर तानाशाही दिखाना उनका अधिकार है.
दौर ये है कि आपका बेडरूम भी सुरक्षित नहीं है. कभी भी कोई आपके बिस्तर की बातों में अपनी टांग अड़ा सकता है. कोई भी प्यार करने के तरीकों पर आपको फरमान सुना सकता है. मैं एक ऐसे देश का आज़ाद और उदार समलैंगिक भारतीय हूं, जहां अब भी अंगरेज़ों के जमाने के वो कानून चल रहे हैं जो अब ब्रिटेन में भी मान्य नहीं हैं.
विविधताओं वाला भारत का इतिहास रहा है कि यहां सभी धर्म और जेंडर के लोगों को स्वीकार किया गया. हालांकि जब इंग्लैंड ने भारत पर शासन किया तो हमारा दिमाग भी उनका गुलाम हो गया. आज हम सब इसी औपनिवेशिक मानसिकता से आज़ाद होने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
कामसूत्र के देश में धारा 377
होमोफोबिया की वजह से लोगों को बांटने और बिस्तर में क्या हो रहा है, इस आधार पर लोगों को अपराधी करार दिया जा रहा है. भारत कामसूत्र वाला देश है, जहां प्यार पर बात करना कभी भी टैबू नहीं रहा है.
मान्यताओं, प्यार और समानता को लेकर भारत की सोच और इतिहास को तोड़ने का काम धारा 377 बखूबी करता है. एक भारतीय होने के नाते मैं इस बात पर शर्मिंदा हूं कि एक दूसरे आदमी से प्यार करने का मुझे बचाव करना पड़ रहा है.
ये उस देश का हाल है, जहां कामसूत्र में प्यार करने के तरीकों को प्रतिबंध मानने की बजाय खुलकर इज़हार किया गया. बेहिचक प्यार और बेधड़क प्यार हमारी परंपरा रही है.
लेकिन धारा 377 की वजह से यही बेझिझक, बेधड़क और बेपरहवाह प्यार को अंगरेज़ों के ज़माने की नैतिकता के तराजू में तोला जा रहा है. अगर आप आज के लंदन की बात करें तो वहां न सिर्फ इस धारा 377 से पीछा छुड़ा लिया गया है बल्कि सेम सेक्स में की जाने वाली शादियों को कानूनी मान्यता देने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं.
ये मेरी समझ से बाहर है कि हम क्यों एक कठोर, प्राचीन और बेतुके कानून के चंगुल में फंसे हुए हैं.
इस कानून से नुकसान क्या है?
धमकियों और प्रताड़ित किए जाने के मामलों में इजाफा हुआ है. जबरन शादी कराई जाने लगी हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि एलजीबीटी समुदाय के लोगों के बीच खुदकुशी का ख्याल आना बेहद कॉमन बात है. इस कानून की वजह से समाज बेहतर नहीं, बदतर हुआ है.
धारा 377 की वजह से पैदा हुए होमोफोबिया का सबसे ज़्यादा शिकार महिलाएं रही हैं. घरेलू हिंसा के ऐसे कई मामले दर्ज हुए हैं, जहां समलैंगिक आदमी को एक औरत से शादी करने के लिए दबाव डाला जाता है. इस तरह की हिंसा को आप किसी भी तरह जायज़ नहीं ठहरा सकते.
लेकिन यहां ये समझने की ज़रूरत है कि एक समलैंगिक को औरत से शादी करने के लिए धकेलना निहायती गलत बात है. किसी ऐसे आदमी की जबरन शादी करवाकर हम एक महिला की सेक्स लाइफ को बर्बाद नहीं कर सकते. इससे दो ज़िंदगियां और शादी दोनों ही बिगड़ेंगी.
अगर एक लेस्बियन महिला है और उसकी किसी आदमी के साथ शादी करवा दी जाती है तो वो भी एक ऐसे बंधन में फंस जाती है, जहां शायद उसे रोज़ बिना मर्ज़ी के सेक्स करने के लिए मजबूर किया जा सकता है. ऐसे में धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट का फ़िर से विचार करने की बात कहना उम्मीद भरा है, जिससे लोगों की ज़िंदगी बेहतर ही होगी.
हमारी उम्मीद है कि धारा 377 का जल्द ख़ात्मा होगा. किसी दूसरे कानून के ख़त्म होने का हमने कभी इस कदर इंतज़ार नहीं किया. हमारी उम्मीद भरी निगाहें इस क़ानूने के कब्र में पहुंचने की राह देख रहे हैं ताकि बेझिझिक, बेधड़क प्यार आज़ाद भारत की खुली हवा में सांस ले सके और ज़िंदगियां मुस्कुरा सके.
VIDEO: आसान भाषा में समझिए LGBTIQ का मतलब
(हरीश अय्यर मुंबई में रहते हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)